यह दलित विरोधी पत्रकारिता है

हमारी पत्रकारिता का हिन्दूवादी, ब्राह्णवादी चेहरा अक्सर हमें दिख जाता है। सामान्य स्थितियों में तो यह आधुनिक, प्रगतिशील, निष्पक्ष, लोकतांत्रिक होने का स्वाँग करता हुआ हमें दिखता है। लेकिन जब भी इसके अन्तर्मन पर चोट पड़ती है या जब भी इसके अन्दर बैठे किसी ब्राह्मण या सवर्ण पर प्रहार होता है तब यह तिलमिला उठता है। ऐसे में इसकी सारी बड़ी बड़ी बातें धरी की धरी रह जाती हैं। लखनऊ में हुए दलित नाट्य महोत्सव में हमें पत्रकारिता का ऐसा ही चेहरा देखने को मिला।

उकताहट और तीन औरतें

संगम पांडेय: रंगमंच : सौरभ शुक्ला की यह 18 साल बाद थिएटर में वापसी है। 1987 में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति पर एक नाटक ‘तांडव’ लिखा और निर्देशित किया था। फिर वे श्रीराम सेंटर और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल होते हुए बरास्ते ‘बैंडिट क्वीन’ सिनेमा की ओर चले गए। अब कमानी ऑडिटोरियम में ‘रेड हॉट’ नाम की अपनी नई प्रस्तुति में वे बतौर लेखक, निर्देशक, अभिनेता एक बार फिर रंगमंच पर उपस्थित हुए हैं।