साध्वी चिदर्पिता का कुबूलनामा- इसलिए मैंने विवाह का निर्णय लिया!

साध्वी चिदर्पिता गौतमबचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी. माँ के साथ लगभग रोज़ शाम को मंदिर जाती. बाद में अकेले भी जाना शुरू कर दिया. जल का लोटा लेकर सुबह स्कूल जाने के पहले मेरा मंदिर जाना आज भी कुछ को याद है. दक्षिणी दिल्ली के कुछ-कुछ अमेरिका जैसे माहौल में भी सोमवार के व्रत रखती. इसी बीच माँ की सहेली ने हरिद्वार में भागवत कथा का आयोजन किया.