संघ की देन हैं बुखारी

सलीम अख्तर सिद्दीकी
सलीम अख्तर सिद्दीकी
अहमद बुखारी अपने वालिद अब्दुल्ला बुखारी से चार कदम आगे निकल गए। पिछले सप्ताह उर्दू अखबार के एक सहाफी (पत्रकार) ने उनसे एक सवाल क्या कर लिया, वे न सिर्फ आग बबूला हो गए बल्कि सहाफी को ‘अपने अंदाज’ में सबक भी सिखाया। एक सहाफी को सरेआम पीटा गया, पर कहीं कोई खास हलचल नहीं हुई। होती भी क्यों।

पिटने वाला पत्रकार किसी बड़े अखबार या चैनल का नुमाईन्दा न होकर एक अनजान से उर्दू अखबार का नुमाईन्दा जो था। जरा कल्पना किजिए कि यदि पिटने वाला किसी रसूखदार मीडिया हाउस का नुमाईन्दा होता तो क्या होता ? पूरी पत्रकारिता खतरे में नजर आने लगती। प्रेस की आजादी पर हमला माना जाता। एक सवाल यह भी है कि क्या अहमद बुखारी से सवाल पूछने वाला पत्रकार किसी बड़े अखबार का नुमाईन्दा होता तो क्या अहमद बुखारी इसी तरह अपना ‘आपा’ खोने की जुर्रत कर सकते थे ? शायद नहीं। अहमद बुखारी जैसे लोगों का चाबुक छोटे लोगों पर ही चलता है। वह बड़े लोगों पर हाथ नहीं डालते। क्योंकि बड़े लोगों से कुछ मिलने की आशा रहती है।

दरअसल, अब्दुल्ला बुखारी तो एक मस्जिद के पेश इमाम मात्र थे। जिसका काम मस्जिद में पांच वक्त की नमाज पढ़ाना होता है। उनकी खासियत यह हो सकती है कि वह एक ऐतिहासिक मस्जिद के पेश इमाम थे। आज वही हैसियत उनके बेटे अहमद बुखारी की होनी चाहिए थी। लेकिन बाप-बेटे ने ऐतिहासिक जामा मस्जिद को अपनी ‘जागीर’ तो नेताओं ने दोनों को पेश इमाम के स्थान पर भारतीय मुसलमानों का रहनुमा बना डाला। मजेदार बात यह है कि अब्दुल्ला बुखारी कभी नमाज नहीं पढ़ाते थे और न आज अहमद बुखारी नमाज पढ़ाने का का फर्ज पूरा करते हैं। अब्दुल्ला बुखारी को मुसलमानों का रहनुमा बनाने में आरएसएस की खास भूमिका रही है। मुझे याद आता है आपातकाल के बाद का 1977 का लोकसभा का चुनाव। तब मैं बहुत छोटा था। उस वक्त आरएसएस के लोग नारा लगाते फिरते थे- ‘अब्दुल्ला बुखारी करे पुकार, बदलो-बदलों यह सरकार।’  उस वक्त देश की जनता में आपातकाल में हुईं ज्यादतियों को लेकर कांग्रेस के प्रति जबरदस्ती रोष था।

खासकर मुसलमान जबरन नसबंदी को लेकर बहुत ज्यादा नाराज थे। ऐसे में यदि अब्दुल्ला बुखारी कांग्रेस को वोट देने की अपील भी करते तो मुसलमान उनकी अपील को खारिज ही करते। उस समय की जनसंघ और आज की भाजपा का विलय जनता पार्टी में हो गया था। 1977 के लोकसभा और विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की जबरदस्त शिकस्त के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी। जनसंघ का जनता पार्टी में विलय होने के बाद भी जनसंघ के नेताओं ने आरएसएस से नाता नहीं तोड़ा। इसी दोहरी सदस्यता तथा जनता पार्टी के अन्य नेताओं के बीच सिर फुटव्वल के चलते 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव हुए। इस चुनाव में अब्दुल्ला बुखारी ने यह देखकर कि जनता पार्टी की कलह के चलते और आपातकाल की ज्यादतियों की जांच करने के लिए गठित शाह जांच आयोग द्वारा इंदिरा गांधी से घंटों पूछताछ करने और पूछताछ को दूरदर्शन पर प्रसारित करने से इंदिरा गांधी के प्रति देश की जनता में हमदर्दी पैदा हो रही है, मुसलमानों से कांग्रेस को वोट देने की अपील कर दी। स्वाभाविक तौर पर देश की जनता ने जनता पार्टी को ठुकरा कर फिर से कांग्रेस का दामन थाम लिया।

इस तरह से देश की जनता में यह संदेश चला गया कि देश का मुसलमान अब्दुल्ला बुखारी की अपील (हालांकि इसे फतवा कहा गया। जबकि अब्दुल्ला बुखारी फतवा जारी करने की योग्यता नहीं रखते थे। अहमद बुखारी भी नहीं रखते) पर ही मतदान करते हैं। जबकि हकीकत यह थी कि देश का मुसलमान भी अन्य नागरिकों की तरह मुद्दों पर ही मतदान करता था। इसका उदहारण 1989 कर चुनाव भी है। इस चुनाव में राजीव गांधी की सरकार बौफोर्स तोप दलाली को लेकर कठघरे में थी तो राम मंदिर आंदोलन के चलते उत्तर प्रदेश के शहर साम्प्रदायिक दंगों की आग में जल रहे थे। दंगों में उत्तर प्रदेश सरकार एक तरह से पार्टी बन गई थी।

पुलिस और पीएसी ने मलियाना और हाशिमपुरा में जबरदस्त ज्यादती की थी। परिणाम स्वरुप मुसलमान वीपी सिंह के पीछे लामबंद हो गए थे। ऐसे में कोई कांग्रेस को वोट देने की अपील करता तो मुंह की ही खाता। यहां भी अब्दुल्ला बुखारी ने हवा का रुख देख कर जनता दल को समर्थन देने की अपील की थी। बदले में उन्होंने जनता दल सरकार से जमकर पैसा वसूला और मीम अफजल जैसे अपने चेलों को जनता दल के टिकट पर राज्य सभा की सीट दिलवाई। जनता दल सरकार के कार्यकाल में दिल्ली की जामा मस्जिद को जनता दल सरकार ने पचास लाख का अनुदान दिया था। उन पचास लाख का अब्दुल्ला बुखारी परिवार ने क्या किया, यह पूछने की हिम्मत ने तो किसी की हुई और न हो सकती थी। पूछने की जुर्रत करेगा तो उसका वही हश्र होगा, जो लखनउ के पत्रकार का हुआ है।

ऐसा वक्त भी आया कि अब्दुल्ला बुखारी ने हवा के विपरीत मुसलमानों से किसी दल को समर्थन देने की अपील की और मुंह की खाई। एक बार तो भाजपा और आरएसएस को पानी पी-पी कर कोसने वाले अहमद बुखारी दिल्ली विधान सभा चुनाव में मुसलमानों से भाजपा को समर्थन देने की अपील कर चुके हैं। आज हालत यह हो गयी है कि अहमद बुखारी पुरानी दिल्ली से अपने समर्थन से एक पार्षद को जिताने की हैसियत भी खो चुके हैं।

एक घटना का जिक्र जरुर करना चाहूंगा। जब मई 1987 में मलियाना और हाशिमपुरा कांड हुए थे तो उनकी गूंज पूरी दुनिया मे हुई थी अब्दुल्ला बुखारी ने दोनों कांड के विरोध में जामा मस्जिद को काले झंडे और बैनरों से पाट दिया था। 1989 में जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार वजूद में आयी तो मैं अपने दोस्त मरहूम तारिक अरशद के साथ यह सोचकर अब्दुल्ला बुखारी से मिलने गए थे कि उनके दिल में मलियाना और हाशिमपुरा के लोगों के लिए हमदर्दी है इसलिए उनसे जाकर यह कहा जाए कि आप वीपी सिंह और मुलायम सिंह यादव से कहें कि मलियाना जांच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करें और दोषियों को सजा दिलाएं।

जब हमने अब्दुल्ला बुखारी के सामने रखी तो उनका का जवाब था। ‘राजीव गांधी हों, वीपी सिंह हों या मुलायम सिंह यादव हों, कोई भी मुसलमानों का हमदर्द नहीं है।’ उनके इस सवाल पर मैंने उनसे सवाल किया था कि ‘जब कोई राजनैतिक दल मुसलमानों का हमदर्द ही नहीं है तो आप क्यों बार-बार किसी राजनैतिक दल को समर्थन देने की अपील मुसलमानों से करते हैं ?’ मेरे इस सवाल पर अब्दुल्ला बुखारी हत्थे से उखड़ गए थे और बोले, ‘मुझसे किसी की सवाल करने की हिम्मत नहीं होती, तुमने कैसे सवाल करने की जुर्रत की।’ उस दिन मुझे मालूम हुआ था कि हकीकत क्या है?

दरअसल, राममंदिर आंदोलन के ठंडा पड़ने के बाद इस आंदोलन के चलते वजूद में आए नेता हाशिए पर चले गए थे। अयोध्या फैसले के बाद ये नेता एक फिर मुख्य धारा में लौटने की कोशिश कर रहे हैं। संघ परिवार के साथ ही कुछ मुस्लिम नेता भी ऐसे हैं, जो अयोध्या फैसले को अपनी वापसी के रुप में देख रहे हैं। अहमद बुखारी भी उनमें से एक हैं। संवाददाता सम्मेलन में एक मुस्लिम पत्रकार के साथ बेहूदा हरकत इसी कोशिश का नतीजा थी।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी 170, मलियाना, मेरठ के वासी हैं, हिंदी ब्लागिंग के सक्रिय साथी हैं. सम-सामयिक मुद्दों पर बेबाक बयान देने के आदी हैं. उनके हिंदी ब्लाग का नाम ‘हक बात’ है. उनसे संपर्क 09837279840 पर फोन करके या फिर उनकी मेल आईडी saleem_iect@yahoo.co. पर मेल करके किया जा सकता है.

‘विधवा विलाप’ न करें : राहुल देव

: पसीना पोछता समाजवादी पत्रकार और एसी में जाते कारपोरेट जर्नलिस्ट : परिचर्चा ने बताया- फिलहाल बदलाव की गुंजाइश नहीं : जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा : कॉरपोरेट जगत अपनी मर्जी से मीडिया की दशा और दिशा तय करता रहेगा :

11 जुलाई को सुप्रसिद्ध पत्रकार स्वर्गीय उदयन शर्मा का जन्म दिन था। हर साल की तरह इस साल भी ‘संवाद 2010’ के तहत एक परिचर्चा ‘लॉबिंग, पेड न्यूज और समकालीन पत्रकारिता’ का आयोजन किया गया था। इस परिचर्चा में देश के कई जाने-पहचाने पत्रकार दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में जुटे और अपने विचार रखे। इस तरह से कार्यक्रमों की विशेषता यह होती है कि वक्ता और श्रोता किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़े लोग ही होते हैं। ऐसे अवसरों पर मीडिया के लोग अपने आप को कसौटी पर कसते हैं। लेकिन कभी भी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। दरअसल, जो पत्रकार ऐसे आयोजनों में शामिल होते हैं, वे ‘आजाद’ नहीं होते बल्कि मालिकों के ‘नौकर’ होते हैं। कल हुई परिचर्चा में यही बात उभर कर सामने आयी। और कल क्यों, जब भी कहीं पत्रकारिता के गिरते स्तर की बात होती है, यही बात सामने आती है।

‘सीएनईबी’ के राहुल देव ने कल कुछ भी नहीं छिपाया। उन्होंने साफ कहा कि ‘पत्रकारिता के स्तर की बात हो तो अखबारों और चैनलों के मालिकों की भी भागीदारी होनी चाहिए। और मालिक लोग कभी यहां पर आएंगे नहीं।” मतलब साफ था कि पत्रकार अखबार या चैनल को उसी तरह से चलाने के लिए मजबूर हैं, जैसा मालिक चाहते हैं। उन्होंने साफ कहा कि ‘विधवा विलाप’ करने का कोई फायदा नहीं है।

इस परिचर्चा में सीएनएन-आईबीएन के राजदीप सरदेसाई भी वक्ता के रूप में मौजूद थे। वह पत्रकार होने के साथ-साथ मालिक भी हैं। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट जगत को माइनस करके अखबार और चैनल नहीं चलाए जा सकते। उन्होंने एक उदहारण देकर कहा कि ‘उनके एक चैनल ने एक कॉरपोरेट घराने के खिलाफ कैम्पेन चलाई। इसके नतीजे में उस कॉरपोरेट ने हमारे सभी नेटवर्क के चैनलों से अपने विज्ञापन वापस ले लिए।’

मतलब साफ है कि मीडिया कॉरपोरेट जगत के खिलाफ जाएगा तो चैनलों और अखबारों पर ताले लटक जाएंगे। ऐसे में भला मीडिया उन सत्तर प्रतिशत लोगों की बात क्यों करे, जो रोजाना पन्द्रह से बीस रुपए रोज पर अपना गुजारा करने के लिए मजबूर हैं। मीडिया को कॉरपोरेट जगत के हितों की बात करनी ही होगी।

‘नई दुनिया’ के प्रधान सम्पादक आलोक मेहता ने कहा कि मीडिया पर हमेशा से दबाव रहा है। उन्होंने पटना की एक घटना का जिक्र करते हुआ बताया कि जब हमने ‘नवभारत टाइम्स’ में पशुपालन घोटाला की खबर छापी तो लालू यादव ने हमारे ऑफिस में आग लगवा दी थी। उन्होंने कहा कि हमारा काम खबर छापना है, हमें हर हाल में इस काम को जारी रखना होगा। उनका कहना था कि आज ही नहीं, पहले भी मीडिया पूंजीपतियों के हाथों में रहा है। उन्होंने बीसी वर्गीज और एचके दुआ का उदाहरण देकर कहा कि मालिकों से अलग हटकर चलने पर सम्पादकों को सड़कों पर ही बर्खास्त किया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि ‘अखबार का मालिक अखबार चलाने के लिए कहां से पैसा लाता है, सम्पादक को इससे कोई मतलब नहीं होता।’

आईबीनएन-7 के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष ने कहा कि पेड न्यूज सिर्फ वही नहीं, जो पैसे लेकर छापी जाती है। उन्होंने किसी विचारधारा के तहत लिखी गयी खबर को भी पेड न्यूज जितना ही गलत बताया। यहां यह बात बताना भी प्रांसगिक है कि जब भी किसी सेमिनार में आशुतोष मौजूद रहे हैं, अक्सर समाजवादी पत्रकारिता की बात करने वाले लोगों से उनकी बहस होती रही है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। लेकिन उन्होंने समाजवादी पत्रकारिता की बात करने वालों पर यह कहकर कटाक्ष किया कि समाजवाद की बात करने वाले पत्रकारों के दिल में भी क्या यह नहीं होता कि दिग्विजय सिंह कहीं कोई बंगला दिलवा दें?

‘दैनिक भास्कर’ समूह के श्रवण गर्ग का कहना था कि खराब अखबार निकालने का दोष मालिकों पर मढ़ना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिससे पाठकों में उसकी इमेज खराब हो। उन्होंने आलोचना को ज्यादा जगह देने की बात कही। उनके विचार से किसी भी कानून से ज्यादा जनता और पाठक की नजर हालात को सही करने में अपनी भूमिका निभा सकती है। उनका कहना था कि कानून बन जाएगा तो पेड न्यूज का सिलसिला दूसरे रास्तों से शुरू हो जाएगा।

पुण्य प्रसून बाजपेयी का कहना था कि पत्रकारिता अब खुलेआम बिक रही है. पत्रकारिता की बिक्री से निपट पाना बहुत मुश्किल हो गया है. पेड न्यूज के लिए और कोई नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत प्रमुख रूप से जिम्मेदार है. राजनीति और मीडिया, दोनों ही क्षेत्र इसके प्रभाव में हैं.

परिचर्चा में बतौर मुख्य अतिथि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि कानून की दीवार बना देने से कुछ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज के लिए सिर्फ पत्रकार ही जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए राजनीति भी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि मुझसे खबर के बदले पैसों की डिमांड किसी अखबार या पत्रकार ने नहीं की।

कुल मिलाकर परिचर्चा में यह बात उभर सामने आयी कि फिलहाल बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं है। जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा। कॉरपोरेट जगत अपनी मर्जी से मीडिया की दशा और दिशा तय करता रहेगा। परिचर्चा में ‘जी न्यूज’ के सलाहकार सम्पादक पुण्य प्रसून वाजपेयी, जी न्यूज के सम्पादक सतीश के सिंह, ‘प्रथम प्रवक्ता’ के रामबहादुर राय, इमेज गुरु के दिलीप चेरियन ने भी अपने विचार रखे। संचालन ‘नई दुनिया’ के राजनीतिक सम्पादक विनोद अग्निहोत्री ने किया। इनके अलावा ‘न्यूज 24’ के अजीत अंजुम, एचके दुआ, ‘इंडिया न्यूज’ के कुरबान अली, उर्दू साप्ताहिक ‘नई दुनिया’ के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी, ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान सम्पादक संतोष भारतीय, सुमित अवस्थी, पारांजय गुहा ठाकुरता, अमिताभ सिन्हा, विनीत कुमार, अविनाश सहित कई लोग थे।

अंत में कॉरपोरेट मीडिया और समाजवादी मीडिया का अंतर भी समझ लीजिए। परिचर्चा के बाद जब मैं, मेरे साथ आए धर्मवीर कटोच और मदनलाल शर्मा कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन जाने के लिए बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर रहे थे, वहीं एक समाजवादी पत्रकार भी पसीना पोंछते हुए बस की इंतजार में थे। दूसरी ओर कॉरपोरेट मीडिया के लोग शानदार एसी कारों में बैठकर जा रहे थे। शायद इसीलिए आशुतोष समाजवादी पत्रकारिता से लगभग नफरत और कॉरपोरेट मीडिया से प्यार करते हैं। आशुतोष एसी न्यूज रूम में बैठकर नक्सवादियों को इसलिए कोस सकते हैं क्योंकि सलीम अख्तर सिद्दीकीउनको कोसने से विज्ञापन जाने का डर नहीं होता। लेकिन यदि वे आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हथियाने वाले पूंजीपतियों के खिलाफ कुछ कहेंगे तो उनके चैनल के विज्ञापन बंद हो जाएंगे। राजदीप सरदेसाई भी तो यही कह रहे थे। आशुतोष भला राजदीप सरदेसाई के खिलाफ कैसे जा सकते हैं? आखिर आशुतोष उनके चैनल में ही तो काम करते हैं।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीक़ी हिंदी के सक्रिय ब्लागर, सिटिजन जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उदयन शर्मा से बेहद प्रभावित सलीम मेरठ में निवास करते हैं. विभिन्न विषयों पर वे लगातार लेखन करते रहते हैं.

‘रण’ देख रोना आया, पैसे बर्बाद न करें

सलीम अख्तर सिद्दीकीदोस्तों के साथ तीन दिन पहले तय पाया गया था कि सभी काम छोड़कर ‘रण’ फिल्म का पहला शो देखा जाएगा। ऐसा ही किया भी। ‘रण देखकर लौटा हूं। फटाफट आपको फिल्म की कहानी बता देता हूं। विजय हर्षवर्धन मलिक एक न्यूज चैनल ‘इंडिया 24’ चलाते हैं। आदर्शवादी पत्रकार हैं। चैनल घाटे में चल रहा है। टीआरपी बढ़ाने के लिए मलिक का बेटा जय विपक्ष के एक नेता, जो बाहुबली है, के साथ मिलकर एक साजिश रचते हैं। उस साजिश में देश के प्रधानमंत्री हुड्डा को एक शहर में हुए बम ब्लॉस्ट का साजिशकर्ता करार देती सीडी बनाई जाती है। यानि खबर क्रिएट की जाती है। हर्षवर्धन मलिक को सीडी दिखाई जाती है। मलिक को लगता है कि देशहित में ये खबर अपने चैनल पर चलाना जरुरी है। इंडिया 24 पर खबर चलती है। चुनाव में हुड्डा हार जाते हैं और विपक्ष का नेता जीत जाता है।

इधर पूरब नाम का एक आदर्शवादी पत्रकार भी है, जो विजय हर्षवर्धन मलिक का जबरदस्त प्रशसंक है। उन्हीं के वैनल में नौकरी करता है। उसको लगता है कि खबर में कहीं कोई गड़बड़ है। वह अपनी तरह से इंवेस्टीगेशन करता है और पूरी सच्चाई की एक सीडी बना लेता है। फिल्म में एक और चैनल है, हैडलाइन टुडै नाम का। उसका मालिक कक्कड़ आदर्शवादी पत्रकार को देश हित के नाम इमोशनल ब्लैकमेल करता है। आदर्शवादी पत्रकार उसे सीडी सौंप देता है। लेकिन चैनल का मालिक कक्कड़ विपक्ष के नेता से सीडी का पांच सौ करोड़ में सौदा कर लेता है। सीडी के बिकने पर आदर्शवादी पत्रकार कक्कड़ के पास जाता है तो कक्क्ड़ उसे पैसे की अहमियत बयान करता है। यह भी कहता है कि विपक्ष के नेता और इंडिया 24 का पर्दाफाश करके 10-15 दिन की टीआरपी के अलावा क्या मिलने वाला है। आदर्शवादी पत्रकार उसकी भी सीडी बना लेता है। उसे पता चल जाता है कि विजय हर्षवर्धन मलिक वाकई ईमानदार पत्रकार हैं। वह उनके पास जाता है। सीडी उन्हें सौंप देता है। मलिक से पत्रकारिता छोड़ने की बात कहकर मलिक के पैर छूकर चला जाता है। मलिक अपने चैनल पर सीडी को उस वक्त चलाता है, जब विपक्ष का नेता प्रधानमंत्री की शपथ लेने की तैयारी कर रहा होता है। कैमरे के सामने एक लम्बा सा भाषण मीडिया को पिलाता है। दर्शकों से हमेशा के लिए नमस्कार कर लेता है। आदर्शवादी पत्रकार पूरब, इंडिया 24 का मालिक बना दिया जाता है। यह है ‘रण’ की कहानी।

फिल्म में गानों की गुंजायश ही नहीं थी। फिल्म के बीच-बीच में हिन्दु-मुस्लिम एकता का तड़का भी लगाया गया है। यदि मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए खबरें क्रिएट करता है तो फिल्म निर्माता सिनेमा हॉल तक लाने के लिए बेतुकी कहानियों को पर्दे पर उताकर लोगों का बेवकूफ बनाता है। रामगोपाल वर्मा जिस बात को कहना चाहते हैं, वह बात समय-समय पर मीडिया वाले ही बार-बार कह चुके हैं। स्व0 प्रभाष जोशी तो बाकायदा खबरों को बेचे जाने के खिलाफ एक अभियान चला चुके हैं। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे यह लगे कि आज के दौर के मीडिया, खासकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ बदलाव आ सकता है। हम लोग तो अभी-अभी पांच सौ रुपए का फटका खाकर आए हैं। फिल्म देखकर रोना आया। बाकी आपकी मर्जी। वैसे पहले शो में कुल बारह लोग थे। आखिर में एक सवाल अमिताभ बच्चन से। कल रात आईबीएन-7 पर बैठे हुए आप खबर क्रिएट नहीं कर रहे थे तो और क्या कर रहे थे ?

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ के वासी हैं, हिंदी ब्लागिंग के सक्रिय साथी हैं. उनसे संपर्क 09837279840 के जरिए किया जा सकता है.

मगर मोदी को शर्म क्यों नहीं आती?

सलीम अख्तर सिद्दीक़ीबी4एम पर उदय शंकर खवारे ने शेष नारायण सिंह के आलेख के जवाब में कहा है कि ‘सिंह साहब, शर्म तो आपको आनी चाहिए।‘ उदय शंकर जी, सिंह साहब को तो इस बात पर शर्म आती है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में नरेन्द्र मोदी नामक एक मुख्यमंत्री अपने मातृ संगठन आरएसएस के एजेंडे को परवान चढ़ाने के लिए गुजरात के हजारों मुसलमानों को ‘एक्शन का रिएक्शन’ बताकर मरवा देता है। बेकसूर नौजवानों को फर्जी एनकाउन्टर में मरवा डालता है और वह फिर भी मुख्यमंत्री बना रहता है। लेकिन दुनिया के धिक्कारने के बाद भी नरेन्द्र मोदी को शर्म नहीं आती। सही बात तो यह है कि नरेन्द्र मोदी को ‘मानवता के कत्ल’ के इल्जाम में जेल में डालना चाहिए। इशरत और उसके साथियों को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया, इसकी पुष्टि तमांग जांच रिपोर्ट करती है। लेकिन जैसा होता आया है, मुसलमानों के कत्लेआम की किसी रिपोर्ट को संघ परिवार हमेशा से नकारता आया है। मुंबई दंगों की जस्टिस श्रीकृष्णा आयोग की रिपोर्ट को भी महाराष्ट्र सरकार ने डस्टबिन के हवाले कर दिया था।

हैरत की बात यह है कि उदय शंकर साहब एक अखबार के समाचार सम्पादक हैं। जिस अखबार के समाचार सम्पादक ऐसे होंगे, उस अखबार की नीति को अच्छी तरह से समझा जा सकता है। उनका अखबार क्या जहर उगलता होगा, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल नहीं है। उदय शंकर की भाषा से एक संघी की बू आती है क्योंकि संघ परिवार की सुई हमेशा ही गोधरा, अफजल और कसाब के आसपास ही घूमती रहती है। इसमें शक नहीं कि गोधरा कांड जैसे भी हुआ, जिसने भी किया वह एक वीभत्स कृत्य था। लेकिन इससे भी ज्यादा वीभत्स वह था, जो नरेन्द्र मोदी की सरपरस्ती में हुआ। यहां यह बताना भी प्रासांगिक होगा कि अभी यह तय नहीं हो पाया है कि साबरमती एक्सप्रेस में आग कैसे लगी थी? हालांकि बनर्जी कमीशन की रिपोर्ट कहती है कि ट्रेन में आग बाहर से नहीं, अन्दर से लगी थी। गोधरा कांड के आरोपी जेल में हैं। क्या किसी ने यह मांग की है कि गोधरा के आरोपियों को रिहा किया जाए? यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि संघ परिवार भी हादसों को स्वयं जन्म देकर साम्प्रदायिक आग भड़काता रहा है। याद कीजिए। जब तक मालेगांव में धमाके करने वाले हिन्दू संगठनों के लोग पकड़े नहीं गए थे, तब तक सारा दोष इंडियन मुजाहीदीन और लश्करे तैयबा पर ही लगाता रहा। साध्वी प्रज्ञा सिंह और कर्नल पुरोहित के पकड़े जाने के बाद ही यह साफ हुआ कि इन लोगों ने मालेगांव में ही नहीं, कई अन्य शहरों में भी बम धमाके किए थे।

संसद हमले के आरोपी अफजल को फांसी न देने का विरोध कभी मुसलमानों की तरफ से नहीं हुआ है। अफजल को फांसी की सजा तो राजग सरकार के समय में ही सुना दी गयी थी। क्या वजह रही कि राजग सरकार अफजल को फांसी नहीं दे सकी थी ? कसाब से किसी को भी हमदर्दी नहीं है। यह भी याद किजिए कि कसाब के मारे गए साथियों को मुसलमानों ने भारत में दफनाने की इजाजत इसलिए नहीं दी थी कि क्योंकि वे लोग इंसानियत के कातिल थे। उदय शंकर जी, संघ की विचारधारा से एक बार बाहर निकलकर सोचें कि शर्म किसे आनी चाहिए, सिंह साहब को या नरेन्द्र मोदी को? 


सामयिक मुद्दों पर कलम के जरिए सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले सलीम अख्तर सिद्दीक़ी मेरठ के निवासी हैं। वे ब्लागर भी हैं और ‘हक बात‘ नाम के अपने हिंदी ब्लाग में लगातार लिखते रहते हैं। उनसे संपर्क 09837279840 या  saleem_iect@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है।