लाखों रुपये वाली एक राष्ट्रीय संगोष्ठी की कहानी

: मानवीय मूल्यों के अमानवीय कार्य पर मीडिया की मुहर : इस खबर को लिखने की कोई इच्छा नहीं थी. कारण भी साफ था. उदघाटन और समापन की औपचारिकताओं के अलावा इसमें कुछ दिखा नहीं. बफर का सुस्वादू भोजन करने के बाद संभागी और आयोजकों ने विश्राम किया. कुछ समूह चर्चा भी हुई जिसे समापन की जल्दबाजी में शीघ्रता से समाप्त कर दिया गया. दूसरे दिन के अखबारों में खबर भी छपी. लेकिन तीसरे दिन जब बाकायदा समापन का सचित्र समाचार पढा तो मन हुआ कि अब तो खबर लिखनी ही पडे़गी. दो दिन की ‘राष्ट्रीय गोष्ठी’ जो एक दिन में ही समाप्त हो गई को अखबारों ने दो दिन की बताकर मानवीय मूल्यों की चर्चा में मीडिया ने वास्तव में अमानवीय कार्य किया है, ऐसा मुझे तो लगता है.