एसपी ने कहा- डीजीपी साहब ढंग से बात करिए

संजय शर्मा पूरी जिंदगी अपनी बेबाकी और तेज-तर्रार जीवन शैली के लिए मशहूर रहे उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक कमरवीर सिंह ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भरी मीटिंग में कोई नौजवान पुलिस अफसर उन्हें इस हद तक खरी-खरी सुना सकता है। मगर अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले शायद यूपी में इन डीजीपी को यह शर्मनाक दिन भी देखना था।

सच साबित हुई वीकएंड टाइम्‍स की रिपोर्ट

वीकएंड टाइम्स ने अपने दो अप्रैल से आठ अप्रैल के अंक में एक बार फिर से धमाका कर दिया है। जब सारे अखबार कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं के एक दूसरे के खिलाफ बयान छाप रहे थे, तब वीकएंड टाइम्स ने अपने पहले पृष्‍ठ पर ही छापा था कि दोनों पार्टियों के बीच तालमेल की संभावना बन रही है और दोनों एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं। अखबार के बाजार में आने के बाद कई लोगों ने इस पर अपनी टिप्पणी करते हुए इसे हवा-हवाई खबर बताया था।

मैं उनका सौवां अंश भी नहीं बन पाया

मुझे किसी की भी मृत्यु ज्यादा दुःख नहीं पहुंचाती. पिछले पांच सालों का लेखाजोखा याद किया तो लगा कि इस दौरान कई लोगों की मृत्यु हुई. इनमें कुछ परिजन थे और कुछ दोस्त भी. मगर किसी की मौत मुझे आत्मा के स्तर पर दुखी कर गई हो ऐसा याद नहीं आता. कभी-कभी तो लगने लगता कि कहीं मैं बहुत संवेदनहीन तो नहीं हो गया? सोचता कि सुबह से लेकर देर रात तक लगातार काम करने के कारण संवेदनाएं कम होती जा रही हैं. फिर लगता कि मैंने ओशो की “मृत्यु एक उत्सव” सीडी इतनी बार सुनी है कि उसका प्रभाव कहीं गहरे उतर गया है. इसलिए मृत्यु पर ज्यादा असर नहीं पड़ता.

वीकएण्‍ड टाइम्‍स को किसी सरकार ने पसंद नहीं किया

संजय यह शीशे के सामने बैठकर खुद को निहारने जैसा था। एक वर्ष और बीत गया। वीकएण्ड टाइम्स ने अपना छह वर्ष का सफर पूरा कर लिया। जन्मदिन पर परेशानियों की याद ज्यादा नहीं आती। खुशी का एहसास होता है। उससे भी ज्यादा अपने बड़े और गंभीर होने का एहसास। लगता है लोग ज्यादा भरोसा करने लगे हैं आप पर। उस पर खरा उतरना भी एक जिम्मेदारी भरा काम होता है। किसी भी अन्य एहसास से ज्यादा महत्वपूर्ण। लगता है कि आप अब प्रतिदिन एक बड़े समाज का हिस्सा होते जा रहे हैं।

कोर्ट का यह फैसला सबक हो सकता है

संजय नीरा यादव को भ्रष्टाचार के आरोप में चार साल की सजा हो गई। यह देर से उठाया गया एक सही कदम है। यह नौकरशाहों के लिए एक सबक भी है। जिस ताकत का इस देश के नौकरशाह गलत इस्तेमाल करते रहे हैं, वही ताकत अब उनके लिए जी का जंजाल भी बनती जा रही है। यह देश के लिए बहुत शुभ सन्देश है। इस सिलसिले को लगातार आगे बढऩा भी चहिए। नौकरशाहों को समझ में आना ही चहिए कि वो लोगों की सेवा करने के लिए ही इस नौकरी में रखे गए हैं न कि हुकूमत करने के लिए। लोकतंत्र को जिन्दा रखने के लिए यह बेहद जरुरी है कि अफसर ईमानदारी से काम करें। दु:ख की बात यह है कि यह भावना लगातार कम होती जा रही है।

बेशर्म सरकारें, भ्रष्‍ट तंत्र, उदास जनता

संजयबड़ी मेहरबानी की ए राजा ने कि उन्होंने मंत्री पद खुद छोड़ दिया. अगर इतना हंगामा न मचता तो शान के साथ तैनात रहते कुछ और गुल खिलाने को. इससे बड़ा बेशर्मी का उदाहरण भला और क्या हो सकता है? घोटाला भी कोई मामूली नहीं. इतने रुपए से चार साल तक मनरेगा जैसी योजना चलाई जा सकती थी. दो साल तक गरीबों को पूरा राशन दिया जा सकता था. मगर राजा की अपनी जरूरतें इससे कहीं ज्यादा थी. इसे कहते हैं आम आदमी की सरकार. और दंड सिर्फ इतना कि मंत्री पद से हटा दिया. यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ राजा जैसे नेता और उन्हें संरक्षण देने वालों की कमी नहीं है. यह सिलसिला पहले भी चलता रहा है और शायद आगे भी चलता रहेगा.

नकारे जाने से बौखलाए हैं बुखारी जैसे लोग

कोई नेता पत्रकार पर हाथ तभी उठाता है जब उसकी हैसियत समाज में खत्म हो जाती है. अहमद बुखारी जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं उसे इस देश के मुसलमानों ने नकार दिया है. इसी के परिणामस्वरूप आज बुखारी मारपीट पर उतर आये. इसकी जितनी भी निंदा की जाये कम है. सभ्य समाज में इस तरह की हिंसा का कोई मतलब नहीं है. अहमद बुखारी मुसलमानों को किस तरह गुमराह करने की कोशिश करते रहे हैं, यह सबको पता चल चुका है. अब मुसलमान उन्हें घास नहीं डाल रहा . बौखलाए बुखारी अब खबरों में बने रहने के लिए इस तरह की बदतमीजियों पर उतर आये हैं. दरसल बुखारी की पीड़ा भी जायज है. अयोध्या के फैसले के बाद भी देश में अमन चैन का माहौल रहना बुखारी और तोगड़िया जैसों को दुःख पहुंचाता ही है. अगर इस तरह का प्यार का वातावरण रहेगा तो इन लोगों को कौन पूछेगा.

ये बच्चे गरीब के बच्चे हैं, इन्हें यूं ही मरने दो

[caption id="attachment_17931" align="alignleft" width="241"]दिमागी बुखार का शिकार एक बच्चादिमागी बुखार का शिकार एक बच्चा[/caption]: 1000 बच्चे दिमागी बुखार से मर गए, पर देश-प्रदेश में कोई हलचल नहीं : स्वाइन फ्लू से सौ लोग मरे तो पूरे देश में तहलका मच गया : दिमागी बुखार से गरीब मरते हैं और स्वाइन फ्लू से अमीर : बच्चे का शरीर गरम होते ही मां रोने लगती है यहां : नपुंसक नेतृत्व की संवेदनहीनता ऐसी जैसे बच्चे इंसानों के न होकर जानवरों के हों : राखी सावंती पत्रकारिता करने वाले मीडिया के भाइयों को गरीब बच्चों की यह मौत नहीं दिख रही :