वैचारिक चोरी या टेलीपैथी!

ऐसा दुर्लभ संयोग कभी देखने को नहीं मिला कि दो पत्रकारों के विचार एकदम शब्दशः एक जैसे हों. लेकिन दिल्ली और भोपाल के बीच सात सौ किलोमीटर की दूरी पर बैठे दो वरिष्ठ पत्रकारों को एक समय में एक ही आइडिया आया. दोनों ने अपनी कलम चलाई, नतीजा ऐसा निकला कि पूरा पत्रकार जगत हैरान हो सकता है. इन दोनों पत्रकारों ने जो लेख लिखे वे शब्द-दर-शब्द एक जैसे हैं.

सहारा वाले नहीं जानते डाक्टर-शिक्षक में अंतर

मीडिया के कथित धुरंधरों के बारे में मैंने कल ही अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं, मगर लगता है कि इस पर कोई ग्रन्थ तैयार करना होगा. सहारा समूह की समयलाइव वेबसाइट पर आज एक खबर डाली गई है, जिसका शीर्षक है- हरियाणा में भर्ती होंगे टीचर, इस खबर के साथ एक फ़ाइल फोटो भी चस्पा किया गया है जिसमें एक क्लास रूम दिखाया गया है, मगर अंदर खबर डाक्टरों की भर्ती से जुड़ी बताई गई है.

‘दिवास’ और ‘देवास’ : पत्रकारिता का सत्‍यानाश

यशवंत जी, आज से लगभग तीन-चार दशक पहले हर बेरोजगार की तमन्ना मास्टर बनने की होती थी, बाद के समय में यह आकांक्षा पत्रकार बनने तक सीमित हो चली. इसका असर यह हुआ कि गली नुक्कड़ों पर पत्रकार पैदा करने की दुकानें खुल गईं. इसका खामियाजा यह हुआ कि ऐसे ‘पत्रकारों’ की पौध सामने आ रही है, जो पत्रकारिता को कलंकित कर रही है. पत्रकारिता पहले मिशन हुआ करती थी, बाद में यह प्रोफेशन हुई और अब सेंसेशन बन गई है. बहरहाल एक बड़ी एजेंसी की एक खबर इसका उदाहरण हो सकती है.