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‘बंगाल पुलिस और आदमी को जिंदा फूंकना’

लेखक विष्णु राजगढ़िया का लेख B4M में देखा. बंगाल पुलिस के बारे में जो उन्होंने लिखा है, वो बिलकुल ही सत्य है. हरियाणा में आने से पहले मैं बंगाल में ही था. वहां प्रभात खबर में शिल्पांचल संस्करण का इन्चार्ज था. पुलिस के बारे में एक घटना का जिक्र करना चाह रहा हूं. प्रमाण के रूप में मैं उस घटना की लाइव तस्वीर भी भेज रहा हूं, जो उस समय की है. आसनसोल के पास धेमोमेन की घटना है, पिछले साल की. एक आदमी को पुलिस के सामने जिन्दा जला दिया गया और पुलिस ने इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं किया. मीडिया में जब मामला काफी उछाला गया तब जाकर बंगाल की सरकार ने मृत व्यक्ति की पत्नी को कोलकाता बुलाकर कुछ पैसे दिए. चूंकि अभी मैं वहां नहीं हूं इसलिए इस मामले में क्या प्रगति हुई है, नहीं बता सकता. लेकिन पुलिस का खेल बता रहा हूं.

लेखक विष्णु राजगढ़िया का लेख B4M में देखा. बंगाल पुलिस के बारे में जो उन्होंने लिखा है, वो बिलकुल ही सत्य है. हरियाणा में आने से पहले मैं बंगाल में ही था. वहां प्रभात खबर में शिल्पांचल संस्करण का इन्चार्ज था. पुलिस के बारे में एक घटना का जिक्र करना चाह रहा हूं. प्रमाण के रूप में मैं उस घटना की लाइव तस्वीर भी भेज रहा हूं, जो उस समय की है. आसनसोल के पास धेमोमेन की घटना है, पिछले साल की. एक आदमी को पुलिस के सामने जिन्दा जला दिया गया और पुलिस ने इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं किया. मीडिया में जब मामला काफी उछाला गया तब जाकर बंगाल की सरकार ने मृत व्यक्ति की पत्नी को कोलकाता बुलाकर कुछ पैसे दिए. चूंकि अभी मैं वहां नहीं हूं इसलिए इस मामले में क्या प्रगति हुई है, नहीं बता सकता. लेकिन पुलिस का खेल बता रहा हूं.

जिस छायाकार ने ये तस्वीर ली थी, उसके पास ये एक्सक्लूसिव थी. पर वहां की पुलिस को जब पता चला कि किसी ने घटना की फोटोग्राफी कर ली है, तो पुलिस ने एक अफवाह उड़ा दिया. वह यह कि जिसने भी ये तस्वीर ली है, पुलिस उसको भी गवाह बना रही है. बेचारा छायाकार कोर्ट-कचहरी के चक्कर में काम क्या करेगा? मैं बंगाल सरकार की पुलिस को अच्छी तरह से जनता हूं. आसनसोल में कोयला माफिया से सांठ-गांठ वहां की पुलिस का कर्त्तव्य लगता है. इसके भी कई उदहारण हैं. पर यहां मैं इस बारे में कहना नहीं चाहता हूं. बस ये कह रहा हूं कि घटना को रोकने या फिर उस पर कार्रवाई करने से ज्यादा वहां की पुलिस जिन्दा जलाने के मामले को दबाने का प्रयास कर रही थी. मेरे भी ऑफिस में इस पुलिस के सामने एक आदमी को जिंदा जलाने की घटना की तस्वीरेंघटना को ज्यादा तूल नहीं देने का फ़ोन आया था, पर मैंने एक ना सुनी. हालांकि हर जगह विभीषण रहते हैं और हमारे ऑफिस में भी थे. उसने ये बात और लोगों को बता दी की कल प्रभात खबर इस मामले को जोरदार तरीके से उठा रहा है. इसलिए बाकी सभी अखबारों को छापना मजबूरी बन गयी थी.

हां, वहां जो भी हिंदी अखबार हैं, उनको मैं शाबासी देना चाहता हूं कि उन्होंने भी इस मामले को जोरदार तरीके से रखा. लेकिन जिन्दा जला देने की घटना में पुलिस की जो भूमिका रही, वो काफी निंदनीय है. इसके बाद जब दबाव बढ़ा तो वहां के गांव वालों को पुलिस ने परेशान करना शुरू कर दिया. वहां के लोगों का आरोप था कि पुलिस अपना काम नहीं कर रही, किसी नेता के इशारे पर उन लोगों को परेशान कर रही है जो सत्तासीन सरकार को वोट नहीं देते थे. मतलब सीपीएम को नही बल्कि टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) को वोट देती थी. पुलिस ने जमकर उत्पात मचाया. एक समय तो मुझे लगा कि बंगाल में पुलिस नहीं, पार्टी के समर्थक पुलिस के रूप में कार्य कर रहे है.

लेखक विष्णु राजगढ़िया ने सही कहा कि वहां की पुलिस बहुरुपिया है. आप खुद कभी वहां जाइये, देर रात को जब जीटी रोड में अवैध रूप से कोयले का आवागमन आप देखेंगे तो दंग रह जायेंगे. ये सब पूरी तरह से पुलिस की शह पर होता है. नहीं तो सवाल ही नहीं उठता है कि ट्रक से भरा अवैध कोयला आप किसी भी थाने के इलाके से ले जायें और वहां के थाना प्रभारी को पता ना चले.

उदय शंकर खवारे

न्यूज़ एडिटर

डेली अभी अभी

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