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”संपादक और मालिक के घर जाकर राशि वसूल की”

चैतन्य भट्टसाहित्यकार अनंत विजय का आलेख भड़ास4मीडिया पर देखा। एक लेखक के बतौर उन्होंने जो दर्द बयां किया है, वह कोई नई बात नहीं है। हर प्रकाशन और प्रकाशक की निगाह में सबसे निम्न स्तर का व्यक्ति यदि कोई है, तो वो होता है ‘लेखक’। अनंत विजय ने तो खैर साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में बात कही है, पर एक लेखक होने के नाते मैं यह बात सीना तान कर कह सकता हूं कि भारत में कुछ प्रकाशनों को यदि छोड़ दिया जाये तो अधिकतर प्रकाशन और पत्रिकाएं लेखकों के पारिश्रमिक के बारे में जानबूझ कर उदासीनता बरतती हैं। रचना प्रकाशित होने के बाद उन्हें पत्रों के माध्यम से बार-बार याद दिलाना पड़ता है कि मेरी अमुक रचना प्रकाशित हो चुकी है पर उसका पारिश्रमिक अभी तक नहीं मिला है। ऐसा नहीं है कि पत्रिका के संपादक या मालिक लेखकों के मानदेय की बात याद नहीं रखते, पर उनकी कोशिश यही होती है कि यदि कोई लेखक अपने पारिश्रमिक के बारे में भूल जाए तो अच्छा है।

चैतन्य भट्टसाहित्यकार अनंत विजय का आलेख भड़ास4मीडिया पर देखा। एक लेखक के बतौर उन्होंने जो दर्द बयां किया है, वह कोई नई बात नहीं है। हर प्रकाशन और प्रकाशक की निगाह में सबसे निम्न स्तर का व्यक्ति यदि कोई है, तो वो होता है ‘लेखक’। अनंत विजय ने तो खैर साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में बात कही है, पर एक लेखक होने के नाते मैं यह बात सीना तान कर कह सकता हूं कि भारत में कुछ प्रकाशनों को यदि छोड़ दिया जाये तो अधिकतर प्रकाशन और पत्रिकाएं लेखकों के पारिश्रमिक के बारे में जानबूझ कर उदासीनता बरतती हैं। रचना प्रकाशित होने के बाद उन्हें पत्रों के माध्यम से बार-बार याद दिलाना पड़ता है कि मेरी अमुक रचना प्रकाशित हो चुकी है पर उसका पारिश्रमिक अभी तक नहीं मिला है। ऐसा नहीं है कि पत्रिका के संपादक या मालिक लेखकों के मानदेय की बात याद नहीं रखते, पर उनकी कोशिश यही होती है कि यदि कोई लेखक अपने पारिश्रमिक के बारे में भूल जाए तो अच्छा है।

मैने कई वर्षों तक अनेक पत्रिकाओं में लेखन किया है। कुछ प्रतिष्ठित कही जाने वाली पत्रिकाओं को छोड़कर, अधिकतर पत्रिकाएं लेखकों के पारिश्रमिक के बारे में यही कोशिश करती है कि उन्हें लेखकों का पैसा न देना पड़े। सबसे मजे की बात तो ये है कि आज से बीस साल पहले जो पारिश्रमिक मिला करता था, वह आज बढ़ने की बजाय कम हो गया है जबकि पत्रिकाओं की कीमतें दस गुणा बढ़ चुकी है। मुझे याद है कि अपराध से संबंधित एक पत्रिका दो साल पहले तक एक कहानी का 1200 सौ रुपये पारिश्रमिक दिया करती थी, पर अब उसका पारिश्रमिक 600 रुपये से 800 रुपये के बीच हो गया है। ऐसा नहीं है कि साहित्यिक और छोटी पत्रिकायें ही लेखकों का शोषण करती है, बड़े प्रकाशन भी इस रीति-नीति को अपनाते हैं।

कई बरस पहले इंडियन एक्सप्रेस ने ”आस-पास” नामक एक साप्ताहिक पत्र निकाला था। उसमें मेरी कई रचनाएं प्रकाशित हुई थी। बाद में वो अखबार बंद हो गया। जब मैने अपने पारिश्रमिक की मांग की तो कहा गया कि चूंकि अब अखबार बंद हो गया है इसलिए पैसा नहीं दिया जा सकेगा। पर मेरा तर्क था कि प्रकाशन तो इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप का था और वह ग्रुप आज भी चल रहा है तब पैसा क्यों नहीं दिया जाएगा? इस संबंध में मैने रामनाथ गोयनका जी तक से पत्र व्यवहार किया था, तब कहीं जाकर मुझे मेरा पारिश्रमिक मिल सका। ऐसा ही दूसरा उदाहरण मुंबई से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र ”नूतन सबेरा” का है। इन्होंने भी कई रिपोर्ट छापने के बाद जब पैसा नहीं दिया तब मैंने उन्हें वकील के मार्फत एक नोटिस भेजा। उसके बाद मुझे मेरा पारिश्रमिक मिल सका। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ”सच्ची घटनायें” के संपादक और मालिक के घर में जाकर मैने पारिश्रमिक की राशि वसूल की।

दरअसल जिन लेखकों के बल पर पत्र-पत्रिकायें चलती हैं, उन्हें ही पत्र-पत्रिकायें सबसे निचले दर्जे पर रखती हैं। लेखकों का शोषण कैसे होता है, इस बारे में मशहूर जासूसी उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा ने अपने एक उपन्यास में अपनी आपबीती बताते हुए लिखा था कि उन्होंने कई बरसों तक ‘फेक नेम’ से उपन्यास लिखे और इसके बदले में उन्हें बहुत कम पैसा प्रकाशकों द्वारा दिया जाता था। बाद में हारकर उन्होंने अपना खुद का प्रकाशन हाउस खोला, तब उन्हें पहचान मिल सकी वरना वो जिंदगी भर किसी दूसरे ‘फेक नेम’ से उपन्यास लिखते रहते। लेखकों के शोषण की यह परंपरा लगातार चलती आ रही है और इसमें लेखक खुद भी दोषी हैं।

आज से करीब तीस साल पहले जब मैं मनोहर कहानियां और सत्यकथाओं में कहानियां लिखा करता था, उस वक्त भारत में गिने चुने लेखक अपराध कथायें लिखते थे। मैने इन लेखकों को एक पत्र डाला कि यदि हम सारे लेखक एक पारिश्रमिक तय कर लें तो संभव है कि हमें उतना पारिश्रमिक देने के लिये प्रकाशन तैयार हो जायें क्योंकि हम कुछ लेखक ही थे जो इस तरह की कहानियां लिखते थे। पर मुझे आश्चर्य हुआ जब मेरे पत्र की फोटोकापी मनोहर कहानियां के संपादक और मालिक (अब स्वर्गीय) आलोक मित्र के पास पहुंचा दी गई। उन्होंने मुझसे कहा कि आप लेखकों को भड़का रहे हैं। यह बात अलग है कि उन्होंने इसे पूर्वाग्रह में न लेते हुये मेरी रचनाओं का प्रकाशन नियमित रखा। मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि लेखक खुद ही नहीं चाहते हैं कि उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य मिले। लेखकों की स्थिति कैसी है इसके लिए एक चुटकुला सुनाकर मैं अपनी बात खत्म करना चाहूंगा।

एक किताब की दुकान पर एक व्यक्ति किताब लेने गया। दुकानदार ने उसकी कीमत पांच सौ रुपये, दस पैसे बतलाई।

कीमत सुनकर ग्राहक आश्चर्य में पड़ गया और उसने पूछा – भाई साहब पांच सौ रुपये तो ठीक है पर ये दस पैसे किस बात के हैं?

भैया कुछ लेखक को भी तो देना पड़ता है, दुकानदार का उत्तर था।


लेखक चैतन्य भट्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों पीपुल्स समाचार, जबलपुर  के संपादक हैं। उनसे 09424959520 या फिर [email protected] के जरिए संपर्क कर सकते हैं। This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it


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0 Comments

  1. sushil Gangwar

    March 18, 2010 at 4:32 pm

    Ye aapne bikul theek farmaya . Lekhako apna paisa khud wa khud basul aaj bhi karna padta hai jaise aapne 30 baras pahle kiya tha. Mai aapke jajbaat ki kadar karta hu. kyo ki mai bhi ek lekhak hu.

    sushil Gangwar
    http://www.sakshatkar.com

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