अजीज बर्नी ने कहा संघ से उन्‍होंने नहीं मांगी माफी, उपेंद्र राय ने लिखा था माफीनामा

: जस्टिस काटजू की उपस्थिति में भिड़े उर्दू के दिग्‍गज पत्रकार : रविवार को नेशनल काउन्सिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू ने मीडिया में मुसलमानों की इमेज के बारे एक संगोष्ठी का आयोजन किया था. इसकी अध्यक्षता प्रेस क्‍लब ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मारकंडेय काटजू कर रहे थे. संगोष्ठी में उस समय बवाल हो गया जब डेली जदीद मेल के संपादक ज़फर आगा ने सभा में उपस्थित उर्दू सहारा के संपादक अज़ीज़ बर्नी की इस बात के लिए प्रशंसा करना शुरू कर दी कि वह मुस्लिमों के लिए अपने अखबार के द्वारा बहुत कुछ कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि मुस्लिमों का अपना अखबार न होने के कारण सारी कठिनाई है. उन्होंने सहाराश्री की तारीफ़ करते हुए मिड डे ग्रुप के मालिकों पर हमला कर दिया और कहा कि उन्होंने मुसलमानों के एक बड़े अखबार को जागरण समूह के हाथ बेच कर बड़ा ग़लत काम किया. इस पर वहां उपस्थित दैनिक इन्‍कलाब के संपादक शकील शम्सी भड़क गए और उन्होंने ज़फर आगा को बीच में ही टोक दिया. उन्होंने कहा कि आगा इस प्रकार की बात दुर्भावना और व्यक्तिगत स्‍वार्थों के लिए कर रहे हैं. इस पर आयोजकों को हस्‍तक्षेप करना पड़ा और उन्हों ने ज़फर आगा से कहा कि वह इस प्रकार की बात न करें.

इसी मामले पर बोलते हुए उर्दू दैनिक हमारा समाज के संपादक खालिद अनवर ने कहा कि ज़फर आगा किस मुंह से सहारा ग्रुप की तारीफ कर रहे हैं. इसी सहारा ग्रुप ने श्री बर्नी को इस बात के लिए मजबूर किया था कि वह संघ से माफ़ी मांगें. इस प्रकार सहारा ने उर्दू के इतने बड़े संपादक को ज़लील किया था. इस पर श्री बर्नी ने कहा कि उन्हों ने कभी माफ़ी नहीं मांगी और सहारा के प्रथम पृष्‍ठ पर जो माफ़ीनामा छपा उस को शकील शम्सी ने उस समय लिखा था, जब वह सहारा उर्दू में कार्य करते थे. इस पर श्री शम्सी ने कहा कि अब वह सहारा में नहीं हैं इस लिए कुछ बोलना उचित नहीं है, लेकिन यहाँ पर इतने पत्रकार मौजूद हैं इसलिए मैं बताना चाहूँगा कि जिस समय श्री बर्नी को श्री उपेन्द्र राय ने फ़ोर्स लीव पर भेज कर उन्हें उर्दू सहारा का चार्ज दिया था, तब उपेन्द्र राय के कार्यालय से ही वह माफ़ीनामा इस निर्देश के साथ उर्दू विभाग भेजा गया था कि इस को बिना किसी परिवर्तन के पहले पेज पर छापा जाये.

श्री शम्सी ने कहा कि उन्होंने फ़ोन पर यह माफ़ीनामा श्री बर्नी को पढ़ कर सुनाया था और श्री बर्नी ने उसे सुन कर एक छोटा सा परिवर्तन बताया था, जिसे उपेन्द्र राय ने नामंज़ूर कर दिया और चूँकि उपेन्द्र राय श्री बर्नी से बड़े अधिकारी थे इस लिए उन का फैसला आखिरी और सर्वमान्य था. इस लिए माफ़ीनामा उसी रूप में छापा गया जिस रूप में वह प्राप्त हुआ था. श्री बर्नी द्वारा उपेन्द्र राय के सहारा में किनारे कर दिए जाने के बाद इस प्रकार का बयान दिए जाने से लग रहा है कि सहारा परिवार ने अब सारी कवायद का ठीकरा उपेन्द्र राय के सिर पर फोड़ना शुरू कर  दिया है. उधर उर्दू अख़बार पढ़ने वाले लोग पूछ रहे हैं कि यदि श्री बर्नी का माफ़ीनामा गलत था तो वह अपने अखबार में उस का खंडन क्यों नहीं कर रहे हैं? लोगों का मानना है कि श्री बर्नी उर्दू पाठकों में फिर से लोक प्रिय होने के लिए अब संघ के सामने पेश किये गए माफ़ीनामे से इनकार कर रहे हैं. अब जवाब स्‍वतंत्र मिश्र को देना है कि वह माफ़ीनामा झूठा था या सहारा परिवार की मंज़ूरी उस को प्राप्त थी?

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