हाई कोर्ट ने ईडी से मांगी जानकारी, कैसे पैसे को सफेद करता है सहारा

: सहारा को नहीं मिली कोई राहत : शिमला : हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने सहारा इंडिया परिवार को फिलहाल कोई राहत देने से मना कर दिया है। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि जब तक सहारा इंडिया परिवार के खिलाफ दायर याचिका पर कोई जवाब दायर नहीं किया जाता है, तब तक यह आदेश प्रभावी रहेंगे। इसके अलावा हालांकि न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय को यह भी आदेश जारी किए हैं कि कंपनी द्वारा पैसे को सफेद धन में तब्‍दील करने के बारे में मौजूदा वास्तविक स्थिति क्या है, इसकी जानकारी दी जाए।

न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से हिमाचल में जो धन कंपनी द्वारा इकट्ठा किया है उसका जवाब देने का दायित्व पूर्णतया कंपनी पर है। न्यायालय ने फिर से प्रवर्तन निदेशालय व रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को आदेश दिए कि सहारा इंडिया परिवार की कंपनी के खिलाफ जो भी आरोप याचिका में लगाए हैं, उसकी जांच करने के लिए वह स्वतंत्र है।

गौर रहे कि न्यायालय के पिछले आदेश के अनुसार सहारा कंपनी पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया व भारतीय प्रतिभूति व विनियम बोर्ड (सेबी) की इजाजत के बगैर किसी भी बैंक के साथ पैसे के हस्तांतरण पर रोक लगा दी थी। इसके मुताबिक प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से हिमाचल में लेन-देन की रोक थी। साथ ही उच्च न्यायालय ने पिछले अंतरिम आदेश से रोक हटाने से भी फिलहाल मना कर दिया है। याचिका में आरोप लगाया है कि सहारा कंपनी विभिन्न तरह की स्कीमों के माध्यम से आम जनता से पैसा इकट्ठा करने के बाद उसे विदेशों में होटल खरीदने में लगा रही है। उपभोक्ताओं को उनका पैसा कैसे मिलेगा, इसके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी ही नहीं है। अब इस मामले पर आगामी सुनवाई 17 अप्रैल को निर्धारित की गई है। (जागरण)

झूठे दावों के बीच ग्राहकों से ठगी कर रहा है सहारा समूह!

सहारा ग्रुप और सेबी के बीच विवाद तीन करोड़ से अधिक निवेशकों के 24,000 करोड़ रुपये को लौटाने को लेकर है। साधारण शब्दों में कहें तो सहारा कुछ लोगों से पैसे इस शर्त पर लेता है कि वह कुछ सालों में 'आकर्षक' रिटर्न के साथ वापस करेगा। जब कुछ निवेशक तय समय के बाद पैसे वापस लेने जाता है तो कंपनी उसे देने में आनाकानी करती है। मामला कोर्ट में पहुंचता है।

सेबी का दखल : अगस्त, 2010 में सेबी सहारा समूह की दोनों कंपनियों (रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन) के धन जुटाने के मामले की जांच के आदेश देती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आदेश पर रोक लगाने के बाद सेबी सुप्रीम कोर्ट पहुंचती है। 31 अगस्त 2012 को सुप्रीम कोर्ट, सहारा की दोनों कंपनियों को निवेशकों से जुटाए गए रकम 15 फीसदी ब्याज के साथ तीन किस्तों में तीन महीने के अंदर लौटाने को कहती है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख : कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट सेबी को आदेश देती है कि यदि सहारा ग्रुप पैसे वापस नहीं कर पा रही है तो उसकी संपत्ति जब्त क्यों नहीं की जाती? अदालत की कड़ी टिप्पणी के बाद सेबी, सहारा समूह की दो कंपनियों और समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय व अन्य तीन निदेशकों के बैंक खाते और डिमैट खाते फ्रीज करती है। अटैच होने वाली संपत्तियों में सुब्रत राय और तीनों निदेशकों की चल व अचल संपत्ति भी शामिल है।

सहारा का पक्ष : सहारा का कहना है कि उसके कुल निवेशकों की संख्या 3.07 करोड़ हैं जिनमें से करीब 90 फीसदी निवेशकों का पैसा लौटा दिया गया है। 5,120 करोड़ रुपए की पहली किस्त के बारे में सहारा का कहना है कि इसमें से सिर्फ 2620 करोड़ रुपये दिए जाने शेष हैं और वो पहले ही बॉन्डधारकों को 19,400 करोड़ रुपए अदा कर चुका है।

सेबी का तर्क : हाल ही में सेबी प्रमुख यूके सिन्हा ने सहारा का नाम लिए बिना कहा था कि उसके 20,000 करोड़ रुपये लौटाने के दावे पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सेबी प्रमुख यूके सिन्हा ने कहा कि इसी तरह कुछ कंपनियां बड़े रिटर्न (कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम) के दावे के साथ पैसे जुटा रही है, जिसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

निवेशक परेशान : जब अमर उजाला ने इस विवाद में जब कुछ निवेशकों से बात की तो उन्होंने खुद को ठगा महसूस किया। बिहार के मधुबनी के रहने वाले ललन कुमार ने बताया कि उन्होंने भी सहारा की एक स्कीम में 2009 में 25,000 रुपये जमा किए। उन्हें बताया गया कि 10 साल बाद (2019) तिगुना यानी 75,000 रुपये मिलेंगे। अचानक दिसंबर, 2012 में कंपनी कहती है कि वे अपना पैसा सहारा क्यू शॉप (रिटेल चेन) में शिफ्ट करवा लें। आपका पैसा मैच्यूरिटी पूरा होने पर ही मिलेगा। बस एक फॉर्म पर अपनी सहमति को लेकर दस्तखत कर दीजिए। यह कंपनी की इस दलील से बिल्कुल उलट है जिसमें उसने 90 फीसदी निवेशकों को सूद सहित पैसे लौटाने की बात कही है।

मामला : सहारा समूह की अपने दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ने रियल एस्टेट में निवेश करने के नाम पर वर्ष 2008 से 2011 के बीच परिवर्तनीय डिबेंचर के जरिए करीब 2.30 करोड़ छोटे निवेशकों से 17,400 करोड़ जुटाए थे। सितंबर, 2009 में सहारा प्राइम सिटी ने आईपीओ लाने के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के समक्ष दस्तावेज जमा किए जिसके बाद सेबी ने अगस्त, 2010 में दोनों कंपनियों के जांच करने के आदेश दिए।

टाइमलाइन : नवंबर, 2010 : सहारा प्राइम सिटी का आईपीओ लटका, सेबी ने दोनों कंपनियों द्वारा निवेशकों से धन जुटाने के मामले की जांच का अंतरिम आदेश दिया। इसके बाद सहारा इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली।

दिसंबर, 2010 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेबी के आदेश पर रोक लगा दी।

जनवरी, 2011 : सेबी ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली। सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को इस बात की इजाजत दी कि वह ओएफसीडी में निवेश करने वाले लोगों के नाम के साथ जांच के लिए जरूरी जो भी जानकारी चाहें, मांग सकता है।

अप्रैल, 2011 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारा ग्रुप मामले में पहले लगे स्टे को हटा दिया, साथ ही अदालत ने कंपनी के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि वह धन जुटाने की अपनी कवायद में शामिल सभी निवेशकों के बारे में पूरा विवरण सेबी को दे।

जून, 2011 : सेबी ने दोनों कंपनियों को निवेशकों का धन वापस करने का आदेश दिया।

जुलाई, 2011 : सेबी के आदेश के खिलाफ सहारा ने सैट की शरण ली।

अक्तूबर, 2011 : सैट ने सेबी के आदेश को पुष्ट किया और उसे बरकरार रखा।

जनवरी, 2012 : सुप्रीम कोर्ट ने सैट के आदेश पर रोक लगाई, सहारा की अपील स्वीकार की।

31 अगस्त 2012 : सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की दोनों कंपनियों को निवेशकों से जुटाए गए रकम 15 फीसदी ब्याज के साथ तीन किस्तों में तीन महीने के अंदर लौटाने का आदेश दिया। इनमें 5,120 करोड़ रुपये का तत्काल भुगतान करना था।

26 सितंबर, 2013 : सेबी ने सहारा समूह पर न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर आरोप लगाया कि सहारा की जिन कंपनियों को निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया गया था वह मांगे गए सारे दस्तावेज उसे उपलब्ध नहीं करा रही हैं।

5 अक्तूबर, 2012 : सहारा समूह ने सुप्रीम कोर्ट के 31 अगस्त के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए याचिका दायर की। सर्वोच्च अदालत ने सहारा को जमाकर्ताओं के 17400 करोड़ रुपये 15 फीसदी ब्याज की दर से लौटाने का आदेश दिया था।

सहारा के दोनों कंपनियों द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका में न्यायालय के आदेश के अनुसार निवेशकों के धन को लौटाने के लिए प्रतिबद्धता जताई साथ ही कहा कि इस आदेश से जनता के साथ-साथ देशी एवं विदेशी बाजारों में उसकी छवि को धक्का पहुंचेगा।

19 नवंबर, 2012 : सहारा समूह की कंपनी सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन और सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन ने निवेशकों को धन लौटाने के लिए समय-सीमा बढ़ाने को याचिका दाखिल की साथ ही सैट के रजिस्ट्रार के पास धन जमा करने की अनुमति देने का अनुरोध करते हुए एक दूसरी अपील की।

हालांकि, न्यायाधिकरण द्वारा दूसरा अपील 29 नवंबर को खारिज कर दी गई। इसके बाद, दोनों कंपनियों ने सैट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

5 दिसंबर, 2012 : कंपनियों की अपील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों कंपनियों को बकाया भुगतान निवेशकों को 15 प्रतिशत ब्याज के साथ नौ सप्ताह में कई चरणों में लौटाने का निर्देश दिए।

साथ ही सहारा समूह को निवेशकों से संबद्ध दस्तावेज 15 दिनों के भीतर सेबी को सौंपने का भी निर्देश दिया और चेतावनी दी कि धन के भुगतान पर उसके निर्देश का पालन करने में विफल रहने पर सेबी उसकी संपत्तियों को कुर्क कर देगी।

20 दिसंबर, 2012 : सैट ने सहारा समूह की पैसा लौटाने के मामले में सेबी को निवेशकों से संबंधित दस्तावेज सौंपने की समय सीमा बढ़ाने संबंधी सहारा की याचिका खारिज कर दी।

10 जनवरी, 2013 : सुप्रीम कोर्ट ने निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपये लौटाने के फैसले पर सहारा समूह की पुनर्विचार याचिका खारिज की।

14 फरवरी, 2013 : सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों के खिलाफ निवेशकों का पैसा लौटाने के मामले में सख्त कदम उठाते हुए इन कंपनियों और समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय समेत कुछ शीर्ष अधिकारियों के खातों पर रोक लगाने तथा अचल संपत्ति की कुर्की के आदेश दिए।

25 फरवरी, 2013 : सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को और समय देने से इनकार करते हुए फरवरी के प्रथम सप्ताह तक निवेशकों का धन लौटाने की न्यायिक आदेश का पालन नहीं करने के लिए उसे आड़े हाथों लिया।

न्यायाधीशों ने सख्त लहजे में कहा कि यदि आपने हमारे आदेशानुसार धन नहीं लौटाया है तो आपको न्यायालय में आने का कोई हक नहीं बनता है। यह समय सिर्फ इसलिए बढ़ाया गया था ताकि निवेशकों को उनका धन वापस मिल सके।

15 मार्च, 2013 : सेबी ने सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय की गिरफ्तारी और उन्हें देश छोड़कर बाहर जाने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दायर की।

सहारा समूह की दो कंपनियों द्वारा निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपया लौटाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किए जाने पर सेबी ने यह अर्जी दायर की।

26 मार्च, 2013 : सेबी ने सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय और अन्य तीन शीर्ष कार्यकारियों को 8 अप्रैल तक अपनी परिसंपत्तियों, बैंक खातों और कर रिटर्न का ब्यौरा जमा कराने और 10 अप्रैल को व्यक्तिगत तौर पर पेश होने को कहा।

अमर उजाला में प्रकाशित कृष्‍ण कुमार सिंह की रिपोर्ट.

क्‍या इसके बाद खुद सहारा श्री गंदगी साफ करने मैदान में उतरेंगे?

पिछले साल 15 अगस्त को सहारा समूह के चेयरमैन सुब्रत राय नोयडा कैंपस आए थे। वहां से जाने के बाद ही खबरें आने लगी थीं कि वह नोयडा में फैली अराजकता से काफी नाराज हैं। हालांकि इससे पहले उन्होंने समरीन जैदी को भेजकर भी इनपुट मंगाया था और नोयडा आने के बाद वह सब कुछ प्रैक्टिकल रूप में भी देख लिया था। उसके बाद से ही ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि नोयडा में कुछ लोगों पर गाज गिर सकती है।

ऐसा हुआ भी, और विजय राय सहित कुछ लोगों को यहां से हटाया भी गया। उसके कुछ महीनों बाद ही उपेंद्र राय के ऊपर संदीप वाधवा को बैठा दिया गया। उस वक्त भी सुब्रत राय की तरफ से जारी सर्कुलर में नोयडा कैंपस में फैली अराजकता, खास तौर से यहां फैली गुटबाजी और साजिशी माहौल पर सख्त टिप्पणी की गई थी। समझा गया था कि संदीप वाधवा इसे दुरुस्त करेंगे, लेकिन कई महीने गुजरने के बाद भी यहां के हालात नहीं बदले।

फरवरी में हुए इंडक्शन प्रोग्राम में भाषण देते हुए भी सुब्रत राय ने इस बारे में काफी सख्त टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, “निकम्मे, कामचोर और साजिश करने वालों को बाहर जाना होगा। वह माहौल खराब करते हैं। अब उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।” उन्होंने इंडक्शन प्रोग्राम में वर्कर केयर को हेड कर रहीं समरीन जैदी को सहारियन फोरम का सर्वेसर्वा बनाते हुए कहा था, “सभी कर्तव्ययोगी माहौल बेहतर करने में योगदान दें और उनके साथ अगर सीनियर कुछ भी गलत कर रहे हैं तो वह तुरंत शिकायत भेजें, उन्हें इन्साफ मिलेगा। अगर नाम जाहिर न करना चाहें तो वह गुमनाम चिट्ठी भेजें।” सुब्रत राय ने उस वक्त ये भी कहा था कि अगर शिकायत करने के बाद किसी को परेशान करते हैं तो ऐसे सीनियर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

सुब्रत राय ने हर चैनल हेड और यूनिट हेड से दस निकम्मे और नाकारा लोगों की सूची भी 28 फरवरी तक मांगी थी, लेकिन ऐसी सूची कइयों ने नहीं दी और दी तो उसमें विरोधियों के नाम भेज दिए गए। इसके बाद सहारा में एक आन लाइन सर्वे भी कराया गया। जिसमें 90 प्रतिशत दो ही तरह के सवाल थे कि कंपनी कैसी है और सीनियरों का व्यवहार कैसा है। इतनी प्रैक्टिस के बाद भी माहौल में कोई खास फर्क नहीं आया। खास तौर से मीडिया हाउस में कोई सुधार नहीं आया। हालांकि सहारियन फोरम में ढेरों शिकायतें की गईं, लेकिन वहां से भी न तो किसी के खिलाफ जांच हुई और ना ही कार्रवाई। तमाम लोग करने भी लगे कि सहारा में कुछ भी नहीं बदलेगा। यहां सिर्फ बातें होती हैं, कार्रवाई नहीं।

दरअसल सुब्रत राय सकारात्मक बदलाव तो चाहते हैं, लेकिन उनके इर्द-गिर्द के लोग, जिनपर इस बदलाव के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है, वह सुब्रत राय को सहयोग नहीं करते हैं। मीडिया में संदीप वाधवा को लाने के बाद भी जब कोई सुधार नहीं हुआ तो अब सुब्रत राय अपने छोटे भाई जयव्रत राय को लेकर आए हैं। इस उम्मीद के साथ कि वह मीडिया से खास तौर से नोयडा आफिस से गंदगी साफ करेंगे, लेकिन उन्हें करीब से जानने वाले लोगों का मानना है कि वह ज्यादा कुछ हस्तक्षेप नहीं करेंगे। इससे एक दिन पहले समरीन जैदी का नोटिस भी आया है, जिसमें उन्होंने शिकायतें मांगी हैं। अलबत्ता पहले की गईं शिकायतों का क्या हुआ, इस बारें किसी को कुछ भी पता नहीं है। अहम सवाल ये है कि अगर जयव्रत राय भी मीडिया की गंदगी साफ नहीं कर सके तो क्या सुब्रत राय खुद मैदान में उतरेंगे?

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘सहारा समूह की कुर्की हो या ना हो’, 11 मार्च को तय करेगा सैट

मुंबई। प्रतिभूति एवं अपीलीय पंचाट (सैट) ने बाजार विनियामक सेबी की ओर से जारी कुर्की के आदेश खिलाफ सुब्रत राय की अपील पर सुनवाई के लिए 11 मार्च की तारीख तय की। सहारा समूह अपनी दो कंपनियों के बॉन्ड निर्गमों का पैसा निवेशकों को वापस किए जाने के मामले में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के साथ कानूनी लड़ाई में उलझा है। सैट ने आज सहारा समूह की अपील को सुनवाई के लिए स्वीकार की और 11 मार्च की तारीख मुकर्रर की है।

सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय ने सेबी के निर्देश के खिलाफ पंचाट में अपील की है। गौरतलब है सेबी ने समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉर्प लिमिटेड और सहारा हाउज़िंग इन्वेस्टमेंट कॉर्प लिमिटेड के कुछ और बड़े अधिकारियों के साथ साथ सुब्रत राय की व्यक्तिगत संपत्तियों को भी कुर्क किए जाने के आदेश दे रखे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी सहारा समूह से निवेशकों को कुल 24,000 करोड़ रुपए वापस करने को कहा है।

कोर्ट द्वारा इसके लिए तय समयसीमा पार होने के बाद सेबी ने पिछले महीने कहा कि कंपनियों ने आदेश का पालन नहीं किया है। साथ ही बाजार नियामक ने दोनों कंपनियों और राय तथा समूह के कुछ अन्य उच्चाधिकारियों के बैंक खाते और बाकी प्रॉपर्टी कुर्क करने का आदेश जारी किया। सेबी ने एक सार्वजनिक नोटिस भी जारी किया, जिसमें आम जनता और निवेशकों को सहारा की इन दो समूहों और उनके शीर्ष अधिकारियों की प्रॉपर्टी जब्त करने के आदेश के मद्देनजर उनके साथ लेन-देन का व्यवहार करने प्रति आगाह किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त 2012 को इस मामले में अपना पहला आदेश जारी किया था और सेबी को निवेशकों को धन वापस कराने में मदद करने का निर्देश दिया था। दिसंबर 2012 में समूह को तीन किस्तों में धन वापस करने के लिए कहा गया था। पहली 5,120 करोड़ रुपए की किस्त तुरंत अदा करने का निर्देश दिया गया था जिसके पास जनवरी के पहले सप्ताह और फरवरी के पहले सप्ताह में 10,000-10,000 करोड़ रुपए की किस्त अदा करने के लिए कहा गया था।

सहारा ने सेबी को 5,120 करोड़ रुपए का भुगतान किया और दावा किया कि यह राशि अपने आप में ही दोनों कंपनियों की देनदारी से अधिक है। सेबी ने अपने जब्ती आदेश में कहा कि कंपनी ने शेष दोनों किस्त अदा नहीं की है इसलिए वह हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक आवश्यक कदम उठा रही है। (भाषा)

मुंबई की झुग्‍गी बस्‍ती के निवेशक सहारा से नाराज

मध्य मुंबई स्थित झुग्गी बस्ती बैगनवाड़ी की एक संकरी गली में भारत के बहु-बिलियन-डॉलर वाले सहारा समूह का स्थानीय कार्यालय ढूंढना मुश्किल है। गौरतलब है कि इस कंपनी के न्यूयॉर्क और लंदन में होटल हैं और एक फॉर्मूला1 रेसिंग टीम भी है। बैगनवाड़ी में नगर निगम के कूड़ेदान से महज़ कुछ किलोमीटर दूर सहारा का एक कमरे वाला ऑफिस एक छोटे, रेडीमेड कपड़े के स्टोर के ऊपर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए, आगंतुक रस्सी थामे, संकरी लोहे की सीढ़ी पर चढ़ते हैं।

इसी जगह से, ऑफिस मैनेजर मोहम्मद राशिद ने 3-4 एजेटों की एक टीम के ज़रिए बैगनवाड़ी के लोगों को हालिया वर्षों में 2.5 मिलियन रूपए (करीब 46,000 डॉलर) के सहारा बॉन्ड बेचे, ऐसा श्री राशिद का कहना है। अब, इनमें से कई लोग, जिनमें हाथों से रिक्शा खींचने वाले और 5000 रूपए (90 डॉलर) से कम मासिक आमदनी वाले फल विक्रेता भी शामिल हैं, धन-वापसी को लेकर चिंतित हैं। वो देशभर के उन 22 मिलियन से ज्यादा लोगों में हैं, जिन्होंने 2008-11 के बीच 3 बिलियन डॉलर से ज्यादा के सहारा बॉन्ड में पैसा लगाया। ये बॉन्ड अब कंपनी और देश के पूंजी बाज़ार नियामकों के बीच विवाद के केन्द्र में हैं।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) कहता है कि सहारा ने इनके निजी स्थापन का दावा करने के बावजूद सीधे लोगों को ये बॉन्ड बेचकर पूंजी बाज़ार के नियमों का उल्लघंन किया है। नियमों के मुताबिक, जब एक कंपनी 50 अथवा उससे ज्यादा लोगों को प्रतिभूति की पेशकश करती है, तो उसे सूचीबद्ध किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में दिए एक आदेश में सेबी के इस विचार को जायज़ ठहराया। कोर्ट ने सहारा को इस महीने तक सेबी में ब्याज़ समेत 3 बिलियन डॉलर जमा कराने के आदेश दिए। कोर्ट ने कहा कि नियामक बॉन्डधारकों को उनका पैसा वापस करेगा।

इस महीने की शुरुआत में, सेबी ने कहा कि सहारा ने पैसा जमा नहीं कराया, लिहाज़ा नियामक ने सहारा की बॉन्ड जारी करने वाली दो इकाईयों, सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉर्प और सहारा हाउजिंग इनवेस्टमेंट कॉर्प की सारी परिसंपदा को निरुद्ध कर दिया। सेबी ने सहारा के संस्थापक और देश के सर्वाधिक अमीर कारोबारियों में एक सुब्रत रॉय के बैंक खातों और परिसंपदा को भी निरुद्ध कर दिया। सहारा ने हाल ही में कई अखबारों में विज्ञापन जारी करके कहा कि उसने सारे बॉन्डधारकों को दोबारा पैसे दे दिए हैं। सहारा के एक प्रवक्ता ने सोमवार को इस मुद्दे पर टिप्पणी से इन्कार कर दिया।

बैगनवाड़ी ऑफिस के मैनेजर श्री राशिद ने पिछले हफ्ते एक साक्षात्कार में कहा कि कंपनी ने स्थानीय लोगों से उगाहे 2.5 मिलियन रूपयों में से करीब 60 फीसदी वापस कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि बाकी दूसरी प्रतिभूति में तब्दील कर दिए गए, जिससे धारक सहारा के क्यू-शॉप नामक खुदरा स्टोरों से किराना और बाकी उत्पाद खरीद सकेगें। गौरतलब है कि मुंबई में अब तक ये स्टोर नहीं खुला है। कई बॉन्डधारक कहते हैं कि वे गुस्सा हैं और उन पर इन नई प्रतिभूतियों में निवेश हेतु दबाव डाला गया।

“मैं अपना पैसा वापस चाहता हूं। मैं महंगे किराने का क्या करूंगा?” बैगनवाड़ी में जूतों के बकसुए बनाने वाले 28 वर्षीय सुरेन्द्र कुमार जायसवाल ने कहा। श्री जायसवाल ने कहा कि 2009-2010 में उन्होंने सहारा बॉन्ड में कुल 25,000 रूपए (करीब 460 डॉलर) निवेश किए। वे इस पैसे को अपनी बेटियों, पांच साल की लक्ष्मी और दो साल की वर्षा की पढ़ाई पर खर्च करना चाहते थे।

श्री जायसवाल ने कहा कि सेबी ने कंपनी को निवेशकों को पैसा लौटाने को कहा है, अखबार में ये खबर पढ़कर पिछले साल उन्होंने अपने सहारा सेल्स एजेंट से संपर्क साधा। एजेंट ने उनसे कहा कि उन्हें अपने मौजूदा बॉन्ड को क्यू-शॉप प्रतिभूति में तब्दील करा लेना चाहिए अथवा सेबी से पैसा मिलने के लिए 10 से 15 साल इंतज़ार करना चाहिए, श्री जायसवाल ने बताया।

बैगनवाड़ी की 45 वर्षीय शमीम बानू शेख ने कहा कि उन्हें तो ये भी नहीं बताया गया कि उनके बॉन्ड एक दूसरी प्रतिभूति में तब्दील किए जा रहे हैं। सुश्री शेख इलाके की कई विनिर्माण इकाइयों में फुटकर काम करती हैं और करीब 3,000 रूपया (करीब 55 डॉलर) मासिक कमा लेती हैं। वह कहती हैं कि उन्होंने सहारा बॉन्ड में करीब 24,000 रूपए (440 डॉलर) निवेश किए, लेकिन सितबंर में उन्हें इनकी एवज़ में क्यू-शॉप सर्टिफिकेट दे दिए गए।

उन्होंने कहा कि वे इसे विशिष्ट तौर पर इसलिए विश्वासघातक समझ रही हैं क्योंकि इन बॉन्ड को बेचने वाला एजेंट उन्हीं के इलाके का है। “ऐसा लगता है मानो आपके किसी अपने ने ही आपका गला काट दिया,” सुश्री शेख ने कहा।

श्री राशिद, जिनके एजेंट ने श्री जायसवाल और सुश्री शेख को बॉन्ड बेचे, किसी भी निवेशक को जबरन खुदरा सर्टिफिकेट देने से इन्कार करते हैं। “हमने किसी को भी क्यू-शॉप में निवेश के लिए बाध्य नहीं किया। जब हम पैसे का पुनर्भुगतान कर रहे थे, उन्होंने कहा कि हमें फिलहाल पैसा नहीं चाहिए, लिहाज़ा हमने उन्हें इस योजना में निवेश का सुझाव दिया,” उन्होंने कहा। श्री राशिद ने कहा कि सहारा 34 सालों से अस्तित्व में है और “हमने हमेशा कानून का पालन किया है।” (आईआरटी)

मनोज तोमर लखनऊ के संपादक, देवकी नंदन बनारस के यूनिट हेड बने

: स्‍नेह रंजन की सहारा में वापसी : प्रदीप सिन्‍हा पटना के यूनिट हेड बनाए गए : राष्‍ट्रीय सहारा में कई बदलाव किए गए हैं. इसके लिए लेटर जारी कर दिया गया है. नए बदलावों में लखनऊ, बनारस तथा पटना यूनिट प्रभावित हुए हैं. बनारस के स्‍थानीय संपादक मनोज तोमर का तबादला लखनऊ के लिए किया गया है. वे लखनऊ में अखबार के स्‍थानीय संपादक होंगे. यहां पर स्‍थानीय संपादक की भूमिका निभा रहे अनिल पांडेय को क्‍या प्रभार दिया जाएगा इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है, परन्‍तु खबर है कि वे सितम्‍बर के बाद एक्‍सटेंशन पर चल रहे हैं, लिहाजा वे रिटायर किए जा सकते हैं. हालांकि उनके रिटायरमेंट की पुष्टि नहीं हो पाई है.

बनारस यूनिट में स्‍नेह रंजन की एक बार फिर वापसी हो गई है. हालांकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि उन्‍हें उनके पुराने स्‍थानीय संपादक के पद पर लाया गया है या एडिटोरियल हेड बनाकर लाया गया है. पर मनोज तोमर के लखनऊ आने के बाद एडिटोरियल की जिम्‍मेदारी स्‍नेह रंजन ही संभालेंगे. स्‍नेह रंजन पूर्व में भी राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस के स्‍थानीय संपादक रह चुके हैं. अखबार में पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती को गाली छप जाने के बाद प्रबंधन ने उन्‍हें हटा दिया था.

तीसरी खबर पटना से है. पटना के यूनिट हेड देवकी नंदन मिश्रा का तबादला बनारस किया गया है. उन्‍हें बनारस का यूनिट हेड बना दिया गया है. इसके पहले मुमताज अहमद बनारस के यूनिट हेड थे, जिनको लखनऊ अटैच कर दिया गया था तथा यूनिट हेड की अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी मनोज तोमर को दे दी गई थी. मनोज तोमर के लखनऊ आने के बाद देवकी नंदन बनारस यूनिट के हेड होंगे. पटना में विज्ञापन मैनेजर प्रदीप सिन्‍हा को प्रमोट करके यूनिट का हेड बना दिया गया है. हालांकि अभी पता नहीं चल पाया है कि उन्‍हें यह जिम्‍मेदारी प्रभार के रूप में दी गई है या स्‍थाई तौर पर उनकी नियुक्ति की गई है.

बदायूं में भी सहारा के सामने मुश्किल, 8 मार्च को कोर्ट में मामले की सुनवाई

बदायूं में  धनवीर सक्सेना बनाम सहारा इंडिया वाद को लेकर बिसौली के न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय में सोमवार को बहुत सरगर्मी रही। सहारा लीगल सेल के अधिकारियों की नगर में उपस्थिति चर्चा का विषय रही। उल्‍लेखनीय है कि नगर के वरिष्ठ अधिवक्ता धनवीर सक्सेना ने 1978 में सहारा इंडिया की गोल्डन की स्कीम में कुछ धनराशि जमा की थी। सहारा इंडिया द्वारा इस स्कीम को बंद करने पर श्री सक्सेना ने 1979 में न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में वाद दायर कर दिया।

न्यायालय द्वारा 6 नवंबर 2011 को प्रतिवादी सहाराश्री सुव्रत राय और स्कीम प्रबंधक के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया। इसके बाद भी अदालत में उपस्थित न होने पर उन्हें भगोड़ा घोषित कर दिया गया। सोमवार को इस मुकदमा की तारीख थी। मुंसिफी परिसर में उपस्थित लोगों की निगाह इस वाद की सुनवाई पर लगी रही। देर शाम तक इंतजार के बाद भी प्रतिवादी पक्ष से कोई भी अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। बताते हैं कि सहारा लीगल सेल के अधिकारी नगर में दिखाई दिए। उनकी उपस्थिति को लेकर भी काफी चर्चा रही। अब इस वाद में 8 मार्च तय की गयी है।

सहारा समूह के निदेशक वंदना भार्गव समेत पांच के विरुद्ध गैर जमानती वारंट

लखनऊ : रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज की ओर से सहारा इंडिया रियल इस्टेट के विरुद्ध दायर लगभग आधा दर्जन मामलों में विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने सहारा इंडिया की निदेशक वंदना भार्गव समेत पांच लोगों के विरुद्ध एक मार्च के लिए गैर जमानती वारंट जारी किया है। अदालत के समक्ष सभी सात परिवाद रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज की ओर से सहायक रजिस्ट्रार ने अधिवक्ता विनय कृष्ण पांडेय की तरफ से दायर किए गए हैं। श्री पांडेय ने कंपनीज एक्ट की धारा 56, 56, (3), 60बी, 62, 63, 67, 68 एवं 73 के अंतर्गत इस मामले को कोर्ट लेकर गए हैं। 

परिवादों में रेड हियरिंग प्रासपेक्ट्स में सही सूचना न देना, मेमोरंडम के माध्यम से जनता को सूचना न देना, छल कपट द्वारा जुर्माना लगाना एवं स्टॉफ एक्सचेंज की अनुमति के बिना सूचीबद्ध करने समेत कई अन्‍य आरोप हैं। सभी परिवादों में निदेशक वंदना भार्गव, अशोक राय चौधरी एवं रविशंकर दुबे के अलावा गुफरान अहमद सिद्दीकी तथा गोविंद तिवारी को पक्षकार बनाया गया है। इस मामले में सुनवाई करते हुए इसी अदालत ने एक अन्य मामले में विपक्षी निदेशकों के विरुद्ध बिना जमानती वारंट जारी किया है।

जमानती वारंट जारी होने के बाद सहारा में हड़कम्‍प मचा हुआ है। सहारा समूह लगातार परेशानियों से घिरता जा रहा है। पहले सेबी ने उसके कई खातों को सीज किया। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की समय बढ़ाने की मांग खारिज कर दी, उसके बाद इस मामले से सहारा समूह की परेशानियां और बढ़ गई हैं।

सहारा की आखिरी उम्‍मीद भी खत्‍म, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं बढ़ाया समय

नई दिल्ली : अपने निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपए लौटाने के लिए कुछ और मिलने की सहारा समूह की अंतिम उम्मीद उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को खत्म कर दी। प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सहारा समूह को और समय देने से इन्कार करते हुए फरवरी के प्रथम सप्ताह तक निवेशकों का धन लौटाने की न्यायिक आदेश का पालन नहीं करने के लिए उसे आड़े हाथों लिया।

इसी खंडपीठ ने सहारा समूह की दो कंपनियों को निवेशकों का धन लौटाने के लिये पूर्व में निर्धारित अवधि बढ़ाई थी। न्यायाधीशों ने सख्त लहजे में कहा,‘यदि आपने हमारे आदेशानुसार धन नहीं लौटाया है तो आपको न्यायालय में आने का कोई हक नहीं बनता है।’ उन्होंने कहा कि यह समय सिर्फ इसलिए बढ़ाया गया था ताकि निवेशकों को उनका धन वापस मिल सके।

सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय और इसकी दो कंपनियां सहारा इंडिया रियल इस्टेट कारपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेन्ट कारपोरेशन पहले से ही एक अन्य खंडपीठ के समक्ष न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही का सामना कर रही हैं। इस खंडपीठ ने निवेशकों का धन लौटाने के आदेश का पालन नहीं करने के कारण छह फरवरी को सेबी को सहारा समूह की दो कंपनियों के खाते जब्त करने और उसकी संपत्तियां कुर्क करने का आदेश दिया था।

सहारा समूह के मामले की आज सुनवाई शुरू होते ही उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एम कृष्णामूर्ति ने खड़े होकर प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा इसकी सुनवाई करने पर आपत्ति की। उनका कहना था कि इस पीठ को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि निवेशकों को धन लौटाने का आदेश दूसरी खंडपीठ ने दिया था।

कृष्णामणि ने कहा, ‘बार के नेता के रूप में मुझे यही कहना है कि इस अदालत की परंपरा का निर्वहन करते हुए इस खंडपीठ को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए और आदेश में सुधार के लिए इसे उसी पीठ के पास भेज देना चाहिए। इस मामले की सुनवाई करने की बजाय उचित यही होगा कि दूसरी खंडपीठ इसकी सुनवाई करे। नाना प्रकार की अफवाहें सुनकर मुझे तकलीफ हो रही है।’ प्रधान न्यायाधीश इस बात पर नाराज हो गये और उन्होंने कहा कि वह इस मामले के तथ्यों की जानकारी के बगैर ही बयान दे रहे हैं। उन्होंने कृष्णामणि को बैठ जाने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति कबीर ने कहा, ‘आपको कैसे पता कि इस मामले में क्या होने जा रहा है। यदि कुछ हो तब आप कहिये। कृपया अपना स्थान ग्रहण कीजिये।’ न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पिछले साल 31 अगस्त को सहारा समूह की दो कंपनियों को निवेशकों का करीब 24 हजार करोड़ रुपया तीन महीने के भीतर 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया था। आरोप है कि कंपनियों ने नियमों का उल्लंघन करके अपने निवेशकों से यह रकम जुटाई थी।

लेकिन बाद में प्रधान न्यायाधीश कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पांच दिसंबर को सहारा समूह को अपने करीब तीन करोड़ निवेशकों का धन लौटाने के लिए उसे नौ सप्ताह का वक्त दे दिया था। कंपनी को तत्काल 5120 करोड़ रुपए लौटाने थे। उस समय भी सेबी और निवेशकों के एक संगठन ने प्रधान न्यायाधीश से इस मामले को न्यायमूर्ति राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के पास भेजने का अनुरोध किया था लेकिन न्यायालय ने उनका यह आग्रह ठुकराते हुये निवेशकों के हितों ध्यान रखते हुये यह आदेश दिया था।

सहारा इंडिया रियल इस्टेट कापरेरेशन ने 31 मार्च, 2008 तक 19,400.87 करोड़ और सहारा हाउसिंग इंडिया कापरेरेशन ने 6380.50 करोड़ रुपए निवेशकों से जुटाये थे। लेकिन समय से पहले भुगतान के बाद 31 अगस्त को कुल शेष रकम 24029.73 करोड़ ही थी। सहारा समूह को इस समय करीब 38 हजार करोड़ रुपए का भुगतान करना पड़ सकता है जिसमें 24029.73 करोड़ मूलधन और करीब 14 हजार करोड़ रुपए ब्याज की राशि हो सकती है। सहारा समूह ने निवेशकों को धन नहीं लौटाने के अपना दृष्टिकोण सही बताते हुये कहा था कि न्यायालय के फैसले से पहले ही निवेशकों की अधिकांश रकम उन्हें लौटाई जा चुकी है। (एजेंसी)

सवाल सुब्रत रॉय के 73,000 करोड़ रुपये की सल्‍तनत का

हाल ही में एक घोषणा की वजह से दुनिया चौंक उठी. सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन लि. (एसआइ-एफसीएल) के जारी किए एक अखबारी विज्ञापन में कहा गया था कि कंपनी के पास जून, 2011 तक 73,000 करोड़ रु. की जमा इकट्ठी हो चुकी थीं. किसी गैरबैंकिंग संस्थान के लिए यह असामान्य रूप से बड़ी रकम है, जिससे पता चलता है कि कैसे सहारा सुप्रीमो सुब्रत रॉय बड़े अधिग्रहणों में पैसा लगाते आए हैं.

इनमें हाल ही में विजय माल्या के नियंत्रण वाली फार्मूला वन टीम पर 500 करोड़ रु. मूल्य का 42.5 प्रतिशत दांव लगाना शामिल है. पिछले साल के अंत में रॉय ने 3,250 करोड़ रु. लगाकर लंदन का नामी होटल ग्रॉसवेनर हाउस खरीद लिया था. रॉय का कहना है, ''पैसा कोई समस्या नहीं है. वह तो मैं कल सुबह 10 बजे दे सकता हूं. सहारा परिवार अंदर से मजबूत है. वह अपने रास्ते की सभी बाधाओं को पार कर लेगा.''

फौरी तौर पर दो 'बाधाएं' हैं. सहारा समूह ने भारतीय रिजर्व बैंक की निर्धारित 30 जून, 2015 की समयसीमा से चार साल पहले यानी 31 दिसंबर, 2011 तक 11,500 करोड़ रु. की अपनी देनदारियां चुकाने का वादा किया है. दूसरी एक और 'बाधा' है. 10 अक्तूबर को प्रतिभूति अपीली पंचाट ने अपने एक कड़े आदेश में रॉय की दो कंपनियों सहारा कमॉडिटी सर्विसेज कॉर्पोरव्शन लि. (एससीएससीएल, जिसका नाम पहले सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरव्शन लि. होता था) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन (एसएचआइसीएल) से कहा है कि उन्हें अगले छह हफ्ते के भीतर वैकल्पिक रूप से पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचरों (ओएफसीडी) के जरिए उगाहे गए 24,029 करोड़ रु. वापस करने होंगे.

इस तरह रॉय को 31 दिसंबर तक कुल 35,000 करोड़ रु. से ज्‍यादा की रकम वापस करनी होगी. लेकिन ऐसा तभी होगा, जब रॉय उक्त आदेश का पालन करेंगे. उन्होंने पंचाट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है, लेकिन रिजर्व बैंक के आदेश वाली रकम वापस करने के लिए वे वचनबद्ध हैं.

पंचाट का आदेश नवंबर, 2010 को वित्तीय बाजार की नियामक सेबी के फैसले के बाद आया, जिसने सहारा समूह की दो कंपनियों पर ओएफसीडीएस के जरिए लोगों से पैसा उगाहने का आरोप लगाया. उसमें कहा गया है कि पैसों यह उगाही निवेशकों की सुरक्षा के लिए बने नियमों का, जो इस तरह के सार्वजनिक मुद्दों को नियंत्रित करते हैं, खुलासा किए बिना की गई. रॉय इसके विरोध में कहते हैं, ''सहारा समूह के पास 30 जून, 2010 तक 1,09,224 करोड़ रु. की संपत्तियां थीं.

इनमें तरल निवेश, नगदी और बैंक में जमा राशि, सावधि जमा राशियां (19,456 करोड़ रु.); कर्जदार, कर्ज व अग्रिम राशि, आयकर रिफंड, अन्य मौजूदा पूंजी (7,629 करोड़ रु.), जमीन, निर्माण, चल रहा काम, खत्म हो चुका स्टॉक और सावधि पूंजी (82,139 करोड़ रु.) शामिल हैं. पैसा चुकाना कोई समस्या नहीं है. समस्या यह है कि दो भिन्न तत्वों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. पंचाट का कदम तर्कसंगत नहीं है.''

रॉय की रहस्यमय दुनिया के इर्दगिर्द फंदा कसता जा रहा है. रिजर्व बैंक, सेबी, प्रवर्तन निदेशालय से लेकर कंपनी मामलों का मंत्रालय सरीखे कई नियामकों के बीच फंसकर वे सभी पर निशाना साध रहे हैं और भविष्य की योजना बनाते हुए उनसे लोहा ले रहे हैं. मुंबई में 2002 में 115 करोड़ रु. से खरीदे गए 223 कमरों वाले उनके होटल सहारा स्टार की निजी लिफ्ट के बाहर एक वर्दीधारी रसोइया उनका इंतजार कर रहा है. कूटभाषा वाला कार्ड स्पर्श कराकर आप उनके सफव्द रंग से रंगे विशेष कक्ष में पहुंचते हैं, जहां से एयरपोर्ट का ज्‍यादातर हिस्सा नजर आता है.

स्थिति माकूल है लेकिन रॉय की परेशानियां बरकरार हैं. जून, 2008 में रिजर्व बैंक ने एसआइएफसीएल से कहा कि वह नई जमा राशियां स्वीकार न करे और सात वर्षों में जनता की 20,000 करोड़ रु. की जमा रकम को चुकाए. पूरी तरह लगाए गए प्रतिबंध में रिजर्व बैंक ने 2011 के बाद परिपक्व होने वाली नई जमा राशियां स्वीकार करने पर रोक लगा दी. आदेश के मुताबिक 30 जून, 2011 तक कंपनी पर 9,000 करोड़ रु. से ज्‍यादा की देनदारी नहीं होनी चाहिए.

11 जुलाई, 2008 को सहारा इंडिया की ओर से प्रकाशित विवरण पत्र में दिखाया गया था कि एसआइएफसीएल ने 1987 में अपनी शुरुआत के बाद से जमा राशियों के रूप में 59,076.26 करोड़ रु.(ब्याज समेत) जुटाए और जमाकर्ताओं को 30 जून, 2008 तक 41,563.06 करोड़ रु. (ब्याज समेत) वापस किए. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की ओर से संकलित आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2009 तक जमाकर्ताओं के प्रति देनदारी (जिसमें ब्याज भी शामिल था) 17,640 करोड़ रु. थी. मार्च, 2010 के अंत तक इसकी कुल देनदारी 13,235 करोड़ रु. थी. मार्च, 2010 के बाद का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन रिजर्व बैंक के करीबी सूत्रों का कहना है कि देनदारी घटकर 9,000 करोड़ रु. से 11,500 करोड़ रु. के बीच रह गई है.

रॉय कहते हैं, भुगतान व्यवस्थित तरीके से करना होती है. ''इसलिए हम तय कार्यक्रम के मुताबिक भुगतान करेंगे, जिसके बारे में जानकारी लखनऊ में सहारा के मुख्यालय को भेज दी गई है. हम बहुत सुगठित तरीके से काम करते हैं. मुख्यालय को अपनी 3,800 शाखाओं को सलाह देनी होती है और इस तरह से भुगतान किए जाते हैं (देखें बातचीत).'' नगदी भले ही उनके लिए बड़ी चिंता न हो, लेकिन नवंबर, 2010 में सेबी के अंतरिम आदेश के तहत पूंजी जुटाने की उनकी योजनाओं का गला घोंटने का सरकार की कोशिश जरूर चिंता का विषय है.

इस आदेश से प्रभावित होने वाली उनकी दो कंपनियों में से एक, एसएचआइसीएल में उनकी मौजूदा पूंजी, नगदी और बैंक में जमा राशि करीब 725 करोड़ रु. है, जबकि एससीएससीएल में उनकी पूंजी, नगदी और बैंक में जमा राशि 4,266 करोड़ रु. है. सहारा समूह ने पिछले 10 वर्षों में आयकर और सेवा कर के रूप में कु ल 2,757 करोड़ रु. चुकाए हैं, इस तरह यह टैक्स चुकाने के हिसाब से एक समर्पित समूह बन गया है.

फिर रिजर्व बैंक ने किस वजह से इसे निशाना बनाया. इसके तार बहुत उलझे हैं. आरएनबीसी के तौर पर एसआइएफसीएल ने दैनिक जमा, आवर्ती जमा और सावधि जमा के रूप में आम लोगों का पैसा स्वीकार किया. रिजर्व बैंक और सेबी ने एसआइएफसीएल पर निशाना साधा (देखें बाक्स), क्योंकि उन्हें लगा कि वह कथित तौर पर काले धन को सफेद बनाने का काम कर रही है. अपना नाम गुप्त रखना चाह रहे एक बड़े बैंकर का कहना है, ''यह कैसे हो सकता है कि सुब्रत रॉय आपकी रजामंदी के बिना इतने वर्षों तक एक समांतर पैराबैंकिंग कंपनी चलाते रहे और अचानक सब कु छ बदल गया. यहां एक तरह से किसी को निशाना बनाए जाने की बात है, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई के बारे में कोई अटकल लगाने के लिए मैं तैयार नहीं हूं.''

मई, 2004 के चुनावों के बाद जब यूपीए सत्ता में आया तो एक बड़े सरकारी पदाधिकारी और अब एक महत्वपूर्ण प्रदेश के राज्‍यपाल से कहा गया कि वे रॉय और सहारा परिवार की गतिविधियों की फाइल तैयार करें. यह फाइल बहुत गहन थी और उसने रॉय के साम्राज्‍य यानी उनके विशाल पैराबैंकिंग धंधे पर, जो उनके अपार खजाने का स्त्रोत था, करारी चोट की. अपने नोट में रिजर्व बैंक ने निर्देश दिया कि सहारा कव्वल सरकारी प्रतिभूतियों और पूरी तरह से सुरक्षित पीएसयू बैंक जमा योजनाओं में ही निवेश कर सकता है.

इसके पीछे उद्देश्य सहारा के कारोबार को ठप करना था. सरकार को इस तरह का कदम क्यों उठाना पड़ा? इंडिया टुडे ने जब इस बारे में सवाल किया, तो रिजर्व बैंक ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन यह जरूर कहा कि वह एसआइएफसीएल के विज्ञापन की जांच कर रहा है.

अगर रिजर्व बैंक की ओर से सहारा को निशाना बनाया जाना पहली चोट थी तो रॉय के खिलाफ सेबी की दंडात्मक कार्रवाई दूसरी चोट है (देखें बॉक्स). आइपीओ जारी करने का मन बना रही सहारा समूह की कंपनी सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड ने 30 सितंबर, 2009 को सेबी को दी अपनी प्रस्तावना में अपने समूह के बारे में सूचना दी थी. सेबी ने घोषणाओं को नाकाफी मानते हुए नियमों के मुताबिक सहारा की कुछ कंपनियों के बारे में सूचना मांगी. इसके बाद शब्दों की जंग में अतिरिक्त सॉलीसिटर-जनरल मोहन पारासरन ने इस मामले पर अपनी राय में कहा, ''मेरी समझ में सहारा समूह जैसी गैर-सूचीबद्ध कंपनियां, जो स्वयं को सूचीबद्ध कराना नहीं चाहती हैं, सेबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती हैं.'' सहारा ने पारासरन की राय को आधार बनाते हुए कहा कि यह मामला सेबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है क्योंकि कंपनी कंपनी मामलों के मंत्रालय और कंपनी रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र में आती है.

जब सेबी ने अपने आदेश का तुरंत पालन करने के लिए कहा तो सहारा ने 31 मई, 2010 के दिनांक वाले पत्र के जरिए कंपनी मामलों के मंत्रालय को एक प्रतिवेदन भेजा, जिसमें उससे स्पष्ट करने को कहा गया कि उनकी कंपनी कंपनी मामलों के मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आती है या सेबी के. 17 जून, 2010 को मंत्रालय ने सहारा को जानकारी दी कि मामले की जांच की जा रही है.

फिर उसने मामले को कानून एवं न्याय मंत्रालय के पास भेज दिया, जहां पारासरन ने सरकार के कानून अधिकारी के तौर पर पाया कि गैर-सूचीबद्ध कंपनियां सेबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती हैं. कानून मंत्रालय ने भी इसी नजरिए के पक्ष में अपनी राय दी, जिसे 8 फरवरी, 2011 को तत्कालीन कानून सचिव के अलावा तत्कालीन कानून मंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने भी मंजूरी दे दी.

इसके बावजूद सेबी को कोई फर्क नहीं पड़ा. नवंबर, 2010 में उसने एक अंतरिम आदेश में सहारा समूह की कंपनियों एससीएससीएल और एसएचआइसीएल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए, जिसके जरिए उन्हें कंपनी रजिस्ट्रार को दाखिल किए गए क्रमशः 12 मार्च, 2008 और 6 अक्तूबर, 2009 के दिनांक वाले रेड हेरिंग प्रास्पेक्टस के तहत जनता से पैसा उगाहने से रोक दिया गया. ऐसा उन्होंने 1956 के कंपनी कानून की धारा 60बी के तहत किया.

उन कंपनियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे जनता को अपने इक्विटी शेयर/ओएफसीडीएस या किसी अन्य प्रतिभूति की भी पेशकश न करें. और फिर, सेबी ने निर्देश दिया कि रॉय, वंदना भार्गव, रवि शंकर दुबे और अशोक रॉय चौधरी सरीखे जिन लोगों का नाम प्रमोटर के तौर पर दिया गया है, उन्हें प्रास्पेक्टस या कोई अन्य दस्तावेज लाने या जनता से पैसा उगाहने वाला कोई भी विज्ञापन जारी करने से रोका जाए.

15 जुलाई, 2011 को पंचाट को फैसले के लिए मामला भेजते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि कंपनी मामलों के मंत्रालय को इस मामले में एक पक्ष बनाया जाए. मंत्रालय ने प्रतिवेदकों को अपना जवाबी शपथ-पत्र दाखिल करने को कहा. इसका पालन करते हुए मंत्रालय ने 26 अगस्त, 2011 और सहारा ने 30 अगस्त, 2011 को मेमो ऑफ अपील के प्रति अपना जवाबी शपथ-पत्र दाखिल किया. लेकिन अपने जवाबी शपथ पत्र में मंत्रालय ने एकदम उलटा रुख अपनाते हुए कहा कि इस मामले में सेबी को फैसला लेने का अधिकार है.

उसने कानून मंत्रालय की राय की भी अनदेखी कर दी. उसने लखनऊ हाइकोर्ट में अपने पहले के रुख से भी अलग रुख ले लिया. तब सहारा ने 30 अगस्त, 2011 को मंत्रालय को नया प्रतिवेदन भेजा. अब कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री मोइली ने 2 सितंबर, 2011 के अपने नोट में कहा है, ''इस चरण में कंपनी मामलों के सचिव को यह विचार करना है कि यह मामला क्या दोबारा कानून मंत्रालय को भेजा जा सकता है.''

सबसे तगड़ा झ्टका सुप्रीम कोर्ट की ओर से आया, जिसने फैसला सुनाया, ''हमारा यह मत है कि ओएफसीडी के सवाल पर सेबी के फैसले की जरूरत है. सेबी को ही सुनवाई करने दी जाए और आदेश पारित करने दिया जाए.'' सहारा को लखनऊ हाइकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करनी पड़ी, क्योंकि सेबी को सहारा समूह की ओर से पूरी जानकारी मुहैया कराने के बावजूद स्थगन के अंतरिम आदेश को मानने से इनकार कर दिया गया था. चीफ जस्टिस एस.एच. कापडिया की अगुआई वाली पीठ ने सहारा समूह को सेबी के खिलाफ पंचाट में जाने को कहा.

चूंकि पंचाट ने इस मामले में अपनी राय दे दी थी, इसलिए सहारा को फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी. इससे पहले 26 अगस्त, 2011 को पंचाट ने एसआइएचसीएल बनाम सेबी के मामले में अपने आदेश में कहा था, ''सहारा की ओर से जारी ओएफसीडी की पेशकश जनता को की गई थी…और इसलिए यह सेबी के अधिकार क्षेत्र में है. 50 से भी कम व्यक्तियों को की गई पेशकश दरअसल निजी प्लेसमेंट है.''

दिलचस्प बात यह है कि 28 अप्रैल, 2010 को संसद में अपने एक जवाब में सरकार ने कहा था, ''निजी तौर पर दिए गए डिबेंचर 1956 के कंपनी कानून के तहत जारी किए जाते हैं, जो कंपनी मामलों के मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.'' साफ जाहिर है कि दो अलग-अलग कंपनियों के लिए दो अलग-अलग नियम हैं.

इंडिया टुडे ने जब सेबी से संपर्क किया तो उधर से कोई जवाब नहीं मिला. वह सिर्फ सहारा के खिलाफ अपने आदेश की प्रति देने के लिए ही राजी थी. बाजार से जुड़े एक व्यक्ति का कहना था, ''सुब्रत रॉय अपने दिखावे और दोस्तियों की कीमत चुका रहे हैं, लेकिन इसके पीछे भी शायद कोई न कोई कारण ही होगा, क्योंकि केंद्र सरकार की एजेंसियां पैसा उगाहने की रॉय की क्षमता के पीछे पड़ गई हैं.''

इस साल मार्च में ही रॉय ने हार्वर्ड में स्वप्रेरणा को लेकर एक भाषण दिया था. और इसी स्वप्रेरणा के चलते ही वे अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रहे हैं. (इंडिया टुडे)

सहारा के साथ लेन-देन पर सेबी ने निवेशकों को किया सर्तक

नई दिल्ली : बाजार नियामक सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों और उसके प्रवर्तक समे0त समूह के प्रमुख सुब्रत राय के साथ किसी भी प्रकार के लेनदेन को लेकर निवेशकों तथा आम लोगों को आगाह किया है। कुछ दिन पहले सेबी ने सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कार्प लि. तथा सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कार्प लि.एवं समूह के चेयरमैन सुब्रत राय समेत उसके प्रवर्तकों के बैंक खातों, निवेश तथा अन्य सभी संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया था जिसके बाद यह चेतावनी जारी की गयी है।

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कहा,‘कोई भी इन कंपनियों तथा उसके तीन प्रवर्तकों एवं निदेशकों के साथ लेनदेन करता है तो वह अपने जोखिम पर करेगा।’ नियामक ने कहा कि सहारा समूह की इन कंपनियों द्वारा प्राप्त रकम निवेशकों को लौटाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद उसने संबंधित कंपनियों तथा उसके प्रवर्तकों एवं निदेशकों सुब्रत राय सहारा, वंदना भार्गव, अशोक राय चौधरी तथा रवि शंकर दुबे की सभी चल एवं अचल संपत्ति, बैंक खाते तथा डिमैट एकाउंट जब्त करने का आदेश दिया है।

सेबी ने सार्वजनिक नोटिस में कहा,‘निवेशकों एवं आम लोगों को सलाह दी जाती है कि वे उक्त इकाइयों को लेकर सतर्क रहे और आदेश की प्रति देखें।’ बाजार नियामक ने 13 फरवरी को दो अलग-अलग आदेश में सहारा की दोनों कंपनियों एवं सहारा समूह के प्रमुख तथा प्रवर्तकों की संपत्ति कुर्क करने और खातों पर रोक लगाने को कहा था। सेबी के इस आदेश से कुछ ही दिन पहले उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि सहारा समूह की कंपनियां निवेशकों को धन वापस करने के लिए उसके पास राशि जमा नहीं कराती हैं तो बाजार नियामक संपत्तियों को कुर्क करने और खातों को बंद करने के लिए स्वतंत्र है।

जिन परिसंपत्तियों को जब्त करने का आदेश दिया गया उनमें समूह की पुणे के आंबीवैली रिजोर्ट, दिल्ली और मुंबई में अन्य रियल स्टेट संपत्तियां, देश के विभिन्न भागों में फैली संपत्तियां, शेयर, म्यूचुअल फंड और विभिन्न अन्य निवेश शामिल हैं। दोनों कंपनियों के खिलाफ दो अलग-अलग आदेश जारी करते हुए सेबी ने कहा था कि दोनों कंपनियों ने बॉन्ड धारकों से क्रमश: 6380 करोड़ रुपए और 19400 करोड़ रुपए एकत्र किए तथा इस धन को एकत्र करने में विभिन्न अनियमितताएं बरती गईं। (एजेंसी)

सुब्रत रॉय और विजय माल्‍या के राइज और फॉल की कहानी एक जैसी है

नई दिल्ली। सहारा और इससे पहले किंगफिशर, ये दोनों ऐसे ग्रुप हैं जो अपने प्रमोटर की शख्सियत की वजह से चर्चा में रहे हैं। और अब जब वो फंसे हैं तो सवाल उनके बिजनेस के तौर-तरीके को लेकर उठ रहे हैं। तरीके उनके भले अलग हों – लेकिन विजया माल्या और सुब्रत राय सहारा के राइज और फॉल की कहानी एक जैसी है। दोनों में कारोबारी रिश्ते भी हैं। एफ-1 रेस की फोर्स वन टीम में दोनों पार्टनर भी हैं।

1978 में सुब्रत राय ने सहारा ग्रुप की शुरुआत की थी और 1983 में विजय माल्या ने भी यूबी ग्रुप की कमान संभाली थी। इन दोनों की लाइफस्टाइल और कारोबार में भी कई समानताएं हैं। विजय माल्या और सुब्रत रॉय सहारा का बुरा दौर शुरू हो गया है। मौजूदा हालात तो कम से कम यही कहते हैं। स्पोटर्स, एविएशन और होटल कारोबार में दोनों की खासी दिलचस्पी है लेकिन मेन बिजनेस दोनों का अलग है। सहारा ग्रुप ने जहां एनबीएफसी के कारोबार से दौलत हासिल की तो विजया माल्या ने लिकर किंग बनकर दिखाया। जिस एनबीएफसी कारोबार के दम पर सुब्रत रॉय सहारा ने अपना साम्राज्य खड़ा किया था, वही कारोबार अब सहारा ग्रुप के लिए सबसे बड़ी लायबिलिटी बन गया है।

सेबी ने सहारा से 24 हजार करोड़ रुपये की वसूली के लिए प्रॉपर्टी जब्त करने और खाते सील करने का फरमान सुना दिया है। एक अनुमान के मुताबिक सहारा ग्रुप का कारोबार 5 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है। कंपनी फाइनेंस, मीडिया, हाउसिंग और रिटेल सहित दूसरे कारोबार में है। कंपनी ने एविएशन में भी हाथ आजमाया था लेकिन भारी नुकसान के बाद उसे बेच दिया। अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सेबी 24 हजार करोड़ रुपये की वसूली कर पाएगा? और सहारा ग्रुप का क्या होगा?

किंगफिशर कैलेंडर से सुर्खियों में रहने वाले विजय माल्या भी भारी मुसीबत में हैं, घर तक बिकने की नौबत आ चुकी है। मामला किंगफिशर एयरलाइंस के डूबने का है। किंगफिशर एयरलाइंस पर 7 हजार करोड़ का कर्ज है और बैंकों ने वसूली के लिए अल्टीमेटम दे दिया है। विजय माल्या के पास शायद अब कोई रास्ता नहीं बचा है। किंगफिशर की उड़ान तो लगभग असंभव है अब खतरा यूबी ग्रुप की दूसरी कंपनियों के बिकने तक का है। ग्रुप कंपनियों के शेयर भी बैंकों के पास गिरवी हैं। बैंक अब उन्हें बेचने की तैयारी कर रहे हैं। इस सब के बावजूद भी बैंक कितना कर्ज वसूल पाएंगे, इसका खुद बैंकों को भी पता नहीं है।

दोनों बिजनेस लीडर की कहानी को देखें तो यही लगता है कि ये बिजनेस के मूल सिद्धांत से कहीं भटक गए। इनके शाही शानों शौकत की चर्चा ने लोगों के बीच भी ऐसी छवि बना दी है जहां इनके बिजनेस के डूबने पर भी अफसोस कम है, आलोचना ज्यादा। सबक क्या है-यही कि हलके में बिजनेस नहीं चलता। (आईबीएन7)

सुप्रीम कोर्ट के आदेश एवं सेबी की जांच से ऊपर है सहारा समूह!

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सहारा अपनी देनदारी से बचने के लिए निवेशको के लिए अखबारों और मीडिया के माध्यम से बड़े बड़े विज्ञापन निकाल कर अपनी साख बचाने में लगा हुआ है। इस केस में पूर्व में हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को निवेशको के पैसे सेबी के माध्यम से लौटने के आदेश दिए थे, सहारा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धत्ता बताते हुए कोर्ट में अपनी लड़ाई जा रखी। सेबी बनाम सहारा मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 13 फ़रवरी को सहारा के खातों और उनके चार बड़े अधिकारियों के खातों को सीज करते हुए लेन देन पर रोक लगा दी थी।

अब सहारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत बताते हुए सेबी से ही धन वसूली की बात कह रहा है, इसके लिए सहारा ने देश भर के अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन निकाल कर अपने को पाक साफ़ बताने की कोशिश की है। सवाल ये है कि सहारा के ये विज्ञापन क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत साबित करने के लिए निकाले गए है, या सहारा सुप्रीम कोर्ट और सेबी को झूठा साबित करने की कोशिश में लगा हुआ है।

आज निकाले गए विज्ञापन में सहारा ने अपनी दो कंपनियों का जिक्र करते हुए कहा की मेसर्स सहारा इंडिया रियल इस्टेट कार्पोर्रेशन लिमिटेड और मेसर्स सहारा इंडिया इन्वेस्टमेंट कारर्पोरेशन लिमिटेड की बकाया ओएफसीडी देनदारी को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जहा सेबी निवेशको की कुल देनदारी 25,781.32 बता रहा है वहीं सहारा का कहना है कि उसने 22,117.39 करोड़ की धनराशि निवेशकों को लौटा चुकी है। सहारा ने इस विज्ञापन का सहारा लेकर ये भी प्रकाशित किया है कि उसके ऊपर कुल 3, 663.93 करोड़ की देनदारी बकाया है। इस वजह से निवेशकों को सहारा इंडिया पर विश्वास करना चाहिए।

सहारा सेबी को ही झूठा साबित करने में लगा है। उसका इस विज्ञापन के माध्यम से ये भी कहना है कि उसने अभी तक कोर्ट के आदेश और सेबी में मिली शिकायतों को ध्यान में रखकर उसने 5120 करोड़ रुपये सेबी में जमा किये हैं, उन जमा रुपयों के सापेक्ष अब सहारा को सेबी को कुछ नहीं देना है, उलटे सहारा ही सेबी से बहुत जल्दी बहुत बड़ी धनराशि पाने का हक़दार है। सहारा ये भी लिखता है कि सहारा इंडिया से सम्बंधित इन दोनों कंपनियों की सम्पतियों के गिरवी होने से सम्बंधित खबरें गलत और भ्रामक हैं।

सहारा ने आज देश के प्रमुख अखबारों में इन विज्ञापनों को छापकर अपने को सही और सेबी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत साबित करने की कोशिश की है। जबकि सहारा की कार्यशैली पर नज़र रखने वालों का मानना है कि सहारा अब अपने नए स्कीम सहारा क्यू शाप में निवेशकों से पैसे इन्वेस्ट करा रहा है। सहारा की कार्यशैली भी पुरानी रही है। आज कोर्ट केस और सेबी के मामले में उलझने के बाद सहारा और उसके कर्ताधर्ता इस मामले से निकलने के लिए रोजाना नए पैतरें इस्तेमाल कर रहे हैं। आने वाले दिनों में देखना ये है कि कोर्ट और सेबी इस विज्ञापन को कैसे लेते हैं।

पीटी के लिए शितांशुपति त्रिपाठी की रिपोर्ट.

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मुमताज अहमद लखनऊ अटैच, मनोज तोमर बने बनारस के यूनिट हेड

एक तरफ सहारा समूह अपनी दुर्गति को प्राप्‍त हो रहा है तो दूसरी तरफ इस समूह के मीडिया हाउस में चलने वाली उठापटक भी अपनी गति से जारी है. बनारस से खबर है कि यूनिट हेड मुमताज अहमद को हटा दिया गया है. उन्‍हें लखनऊ से अटैच कर दिया गया है. उनकी जगह संपादक मनोज तोमर को यूनिट हेड की अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी निभाने को कहा गया है. इसके लिए एक पत्र भी जारी कर दिया गया है.

मुमताज अहमद इलाहाबाद में राष्‍ट्रीय सहारा के ब्‍यूरोचीफ हुआ करते थे. उन्‍हें उपेंद्र राय ने प्रमोट करके बनारस यूनिट का हेड बना दिया था. जब उपेंद्र राय की टीम कमजोर हुई और स्‍वतंत्र मिश्रा एंड कंपनी मजबूत हुई तभी से कयास लगाए जा रहे थे कि बनारस में बदलाव देखने को मिलेगा. आशंका अब सही साबित हुई है. फिलहाल जब तक किसी नए व्‍यक्ति की नियुक्ति नहीं की जाती है तब तक मनोज तोमर ही संपादक एवं यूनिट हेड का दायित्‍व निभाएंगे. 

सहारा समूह ने कैसे खरीदा लंदन का ग्रोवनर हाउस?

रियल एस्टेट, हॉस्पिटैलिटी और रिटेल कारोबार में दखल रखने वाले लखनऊ के सहारा इंडिया परिवार ने विदेश में कई बैंक खाते खोले और मॉरीशस व ब्रिटेन में कंपनियां शुरू कीं। और यह सब हुआ भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा समूह की दो कंपनियां- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्प (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्ट कॉर्प (एसएचआईसीएल) के खिलाफ जांच कार्रवाई प्रक्रिया शुरू करने के बाद। इन बैंक खातों का ब्योरा और इन्हें चलाने वाली कंपनियों के अलावा इनके बीच होने वाले रकम हस्तांतरण का पूरा विवरण एक विदेशी वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू) ने अपनी भारतीय समकक्ष के साथ साझा की रिपोर्ट में दिया है। 

संदेहास्पद वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने, उसके विश्लेषण और फिर उस जानकारी को प्रवर्तन एजेंसियों व विदेशी एफआईयू के साथ साझा करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय एजेंसी एफआईयू इंडिया की है। इस रिपोर्ट, जिसे बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी देखा है, में खुफिया एजेंसियों ने दो कंपनियों द्वारा विदेश में कुछ बैंक खाते चलाने का जिक्र किया है। ये कंपनियां हैं 10 अक्टूबर 2010 को मॉरीशस में पंजीकृत ऐंबी वैली (मॉरीशस) और ब्रिटेन में 22 नवंबर 2010 को पंजीकृत कराई गई ऐंबी हॉस्पिटैलिटी सर्विसेज (यूके)। एफआईयू की रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों ने क्रमश: 4 फरवरी 2012 और 11 फरवरी 2011 को यूबीएस एजी के साथ खाते खोले। दिसंबर 2010 में सहारा द्वारा खरीदे गए लंदन के ग्रोवनर होटल सौदे की खातिर 47 करोड़ पाउंड की रकम के हस्तांतरण में इन खातों ने भी भूमिका निभाई थी। 
 
ऐंबी वैली मॉरीशस के यूबीएस खाते (संख्या- 539469)के बारे में सहारा समूह के प्रवक्ता अभिजित सरकार ने ईमेल के जरिये भेजी अपनी प्रतिक्रिया में कहा, 'यह खाता दिसंबर 2010 में ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के बाद मार्च 2011 में खोला गया था।' उनके अनुसार यह खाता ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के दौरान हुए परिचालन खर्च के भुगतान और उसकी सहायक कंपनियों में निवेश के लिए खोला गया था। 
 
होल्डिंग ढांचे को समझाते हुए सरकार कहते हैं, 'यहां इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि ग्रोवनर हाउस होटल के अधिग्रहण के समय ऐंबी वैली (एवीएल) में सुब्रत रॉय सहारा की 75.79 फीसदी हिस्सेदारी थी न कि 100 फीसदी, जैसी कि अफवाहें फैलायी जा रही हैं। ऐंबी वैली मॉरीशस में एवीएल की 99.99 फीसदी हिस्सेदारी है, तो इसलिए एवीएल में हिस्सेदारी के अनुसार सुब्रत रॉय सहारा की भी इसमें बहुलांश हिस्सेदारी हुई। लेकिन उनके पास एवी(एम)एल की 100 फीसदी हिस्सेदारी नहीं है।'
 
सरकार ने बताया कि अभी मॉरीशस स्थित इस कंपनी में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष होल्डिंग के जरिये सुब्रत रॉय की हिस्सेदारी घटकर 43.55 फीसदी रह गई है। पुराने दस्तावेज पर नजर डालें तो पता चलता है कि जनवरी 2010 में किसी रोशनलाल द्वारा की गई शिकायत के बाद सेबी ने आंशिक संपूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर्स (ओएफसीडी) जारी करने के मामले का ब्योरा मंगाना शुरू कर दिया था। इसके बाद  नियामक सेबी ने कई बार कंपनियों से ओएफसीडी निर्गम का ब्योरा प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन असफल रहा।
 
इस दौरान ओएफसीडी के जरिये कई करोड़ रुपये जुटाए गए और उन्हें किसी अन्य जगह निवेश किया गया। जनवरी 2012 में बिज़नेस स्टैंडर्ड ने छापा था कि किस तरह सेबी के जांच दायरे में आई इन दोनों कंपनियों ने 2009-10 में ऐंबी वैली में 6,687 करोड़ रुपये का निवेश किया था। वित्त वर्ष 2009-10 के लिए उपलब्ध कराई गई वित्तीय जानकारी के अनुसार एसआईआरईसीएल ने 30 जून 2010 को ऐंबी वैली के 23.4 करोड़ इक्विटी शेयर खरीदने के लिए 5,328 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इसी तरह एसएचआईसीएल ने भी ऐंबी वैली के 1.9 करोड़ शेयर खरीदने के लिए 553 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इस इक्विटी निवेश के अलावा एसएचआईसीएल के पास  ऐंबी वैली के 806 करोड़ रुपये मूल्य के 800 परिवर्तनीय डिबेंचर्स भी हैं। 
 
कई बार कोशिश करने के बाद भी जानकारी प्राप्त करने में असफल रहने पर सेबी ने 16 अगस्त 2010 को जारी अपने आदेश में जांच शुरू करने की बात कही। सेबी ने आदेश में कहा, 'सेबी का पास यह मानने के लिए पर्याप्त वजह है कि एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल द्वारा जारी ओएफसीडी निवेशकों या प्रतिभूति बाजार के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं और मुमकिन है कि प्रतिभूति बाजार से जुड़े किसी मध्यस्थ या व्यक्तियों ने सेबी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया हो।'
 
इसके बाद सेबी अधिनियम की धारा 11सी के तहत 30 अगस्त और 23 सितंबर 2010 को समन जारी किए गए थे। सहारा ने 13 सितंबर और 30 सितंबर को प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह इस बारे में कंपनी मामलों के मंत्रालय से विस्तृत जानकारी मांग सकता है, जो उसके अनुसार कंपनी का नियामक है। समूह ने क्षेत्राधिकार का हवाला देते हुए सेबी से समन वापस लेने के लिए कहा।  हालांकि लंदन स्थित ग्रोवनर हाउस होटल आधिकारिक तौर पर मार्च 2010 से ही बिक्री के लिए उपलब्ध है लेकिन सहारा ने इसके अधिग्रहण की कोशिश 6 महीने बाद ही शुरू की। सेबी को जवाब देने के 10 दिन बाद 10 अक्टूबर 2010 को ऐंबी वैली (मॉरीशस) का पंजीकरण कराया गया। 28 अक्टूबर 2010 को ऐंबी वैली लिमिटेड ने मॉरीशस की कंपनी का अधिग्रहण कर लिया।
 
पांच दिन बाद 3 नवंबर 2010 को सहारा समूह के मुख्य वित्त अधिकारी डी जे बागची ने सेबी के पूर्ण कालिक सदस्य के एम अब्राहम से बातचीत की, जो सहारा के खिलाफ जांच की अगुआई कर रहे थे। 24 नवंबर 2010 को जारी अंतरिम आदेश व कारण बताओ नोटिस में अब्राहम ने कहा, 'इस बैठक में कंपनी के प्रतिनिधि को सेबी को जल्द से जल्द पूरी और सही जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत से वाकिफ करा दिया गया था। लेकिन कंपनी के प्रतिनिधि ने जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रतिबद्घता नहीं जताई।' इसके बाद ही सेबी और सहारा की कानूनी लड़ाई शुरू हुई। 
 
आदेश जारी करने के चार दिन पहले इस अधिग्रहण से जुड़े एक और महत्त्वपूर्ण चरण को अंजाम दिया गया। एसआईआरईसीएल द्वारा दी गई जानकारी से संकेत मिलता है कि एसआईआरईसीएल के पास यह रकम ओएफसीडी भुनाने से आई थी। 30 जून 2010 को समाप्त वित्तीय वर्ष के लिए एसआईआरईसीएल द्वारा 30 नवंबर को जारी बहीखाते के अनुसार इन रकम के स्रोत में महज तीन बड़े आइटम थे। कंपनी के पास 90.12 करोड़ रुपये की साझा पूंजी थी, 1,710 करोड़ रुपये का भंडार और अधिशेष और करीब 13,245 करोड़ रुपये के असुरक्षित ऋण थे। बहीखाते के शेड्यूल 3 में दिखाया गया कि 'असुरक्षित ऋण' में 11,921 करोड़ रुपये के ओएफसीडी, 36.4 करोड़ रुपये मूल्य की ओएफसीडी आवेदन रकम, लंबित आवंटन और इस पर प्राप्त 1,286 करोड़ रुपये का ब्याज। 
 
एसआईआरईसीएल ने 20 नवंबर 2010 को एक सौदा किया, जिसके तहत 'वह संयुक्त उपक्रम लेनदेन के लिए सहारा इंडिया कॉमर्शियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को कुछ रकम मुहैया कराएगी, जिससे एसआईसीसीएल परियोजनाओं के निर्माण और विकास के लिए जमीन अधिग्रहण कर सके।'
 
दस दिन बाद इस रकम का कुछ हिस्सा ऐंबी वैली को ऋण के तौर पर दिया गया, जिसने अपनी मॉरीशस इकाई के जरिये इस रकम को भेजा और ग्रोवनर हाउस खरीदने में इस्तेमाल किया। सरकार के अनुसार, 'एसआईसीसीएल को अपनी खातिर तुरंत रकम की दरकार नहीं थी इसलिए एसआईसीसीएल ने एसआईआरईसीएल से मिली रकम का कुछ हिस्सा एवीएल को उसके हॉस्पिटैलिटी कारोबार के विस्तार की खातिर एक कारोबारी विकास लेनदेन के जरिये दिया। इस लेनदेन के लिए करार 30 नवंबर 2010 को किया गया।' इस करार के अनुसार एसआईसीसीएल ने एवीएल को 3,859.52 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया। इसके बाद इस रकम को तरजीही शेयर में तब्दील कर दिया गया। सहारा के अनुसार, 'यह मान लेना गलत होगा कि एसआईसीसीएल द्वारा एवीएल को कारोबार विकास के लिए दी गई पूरी रकम महज एसआईआरईसीएल से हस्तांतरित रकम से निकाली गई थी। एसआईसीसीएल के पास खुद की भी पूंजी थी, जिसका हस्तांतरण उसने एवीएल को किया।'
 
13 दिसंबर 2010 को एवीएल ने अपनी मॉरीशस इकाई के साथ एक ऋण समझौता किया। इसके बाद 24 दिसंबर 2010 को 47 करोड़ पाउंड की रकम एवी(एम)एल को भेज दी गई थी और 31 दिसंबर 2010 तक ग्रोवनर सहारा की झोली में था। सहारा समूह ने कहा कि 24 नवंबर को जारी सेबी के अंतरिम आदेश पर 13 दिसंबर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्थगनादेश दिया था और जब यह रकम विदेश भेजी गई तो यह स्थगनादेश प्रभावी था। 
 
प्रवक्ता ने कहा, 'गौरतलब है कि कथित भुगतान में स्वत: निवेश के तहत विदेश में प्रत्यक्ष निवेश के लिए फेमा (विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन अधिनियम) द्वारा जारी सभी दिशानिर्देशों का पालन किया गया था क्योंकि तब एवीएल या उसके प्रवर्तकों और निदेशकों के खिलाफ फेमा के नजरिये से किसी तरह की जांच (किसी भी जांच एजेंसी या प्रवर्तन एजेंसी या फिर नियामकीय संस्था)नहीं की जा रही थी। एवी(एम)एल परिचालन कारोबार से जुड़ी है और विदेशी हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में निवेश करती है। एवी(एम)एल ने इस ऋण के जरिए ग्रोवनर हाउस होटल सौदा पूरा किया और अन्य हॉस्पिटैलिटी संपत्तियां खरीदीं।'
 
सहारा समूह ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस पूरी प्रक्रिया के किसी भी चरण में एक भी नियामकीय या कानूनी जरूरत का उल्लंघन नहीं किया गया है। समूह ने कहा कि रकम का लेनदेन संबंधित कंपनियों के लक्ष्य के अनुसार ही था और रकम के हस्तांतरण या उसके इस्तेमाल में किसी भी तरह का कुछ भी गैर-कानूनी नहीं है। एवी(एम)एल ने सहायक कंपनियां स्थापित कर इक्विटी शेयर, तरजीही शेयर और ऋण के रुप में उनमें निवेश किया। प्रवक्ता ने कहा, ' स्टेप डाउन सहायक कंपनियां स्थापित करना 7 जुलाई 2004 को जारी रिजर्व बैंक की अधिसूचना संख्या 120/आरबी-2004 के अनुसार ही है, जिसमें समय के साथ बदलाव होते रहते हैं और ऐसी स्टेप डाउन कंपनियां से जुड़ी हर जानकारी एवीएल द्वारा नियुक्त आधिकारिक डीलरों के जरिये आरबीआई को दे दी गई है।' जून 2011 में सेबी ने एक अंतिम आदेश जारी किया, जिसमें उसने एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल को ओएफसीडी के जरिये जुटाई गई रकम लौटाने का निर्देश दिया। सहारा ने इसके खिलाफ प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट) में याचिका दायर की। 18 अक्टूबर 2011 को सैट ने सहारा की याचिका खारिज कर दी। 
 
एफआईयू की रिपोर्ट के अनुसार सैट के आदेश के तुरंत बाद नए लेनदेन हुए। विदेशी एजेंसी ने कहा, 'खुफिया जांच में सामने आया कि 21 अक्टूबर 2011 और 28 नवंबर 2011 को ऐंबी वैली (मॉरीशस) को सहारा ग्रोवनर हाउस हॉस्पिटैलिटी लिमिटेड, जिसका खाता बैंक ऑफ चाइना में है, से खासी रकम प्राप्त हुई।' इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐंबी वैली (मॉरीशस) ने प्रायोजन एडवांस के तौर पर फोर्स इंडिया फॉर्मूला वन टीम को 50 लाख पाउंड का भुगतान भी किया। 30 मार्च 2012 को जारी एफआईयू रिपोर्ट में आगे संकेत है कि ऐंबी वैली (मॉरीशस) की मंशा अपने विभिन्न बैंक खातों में भारी भरकम रकम का हस्तांतरण करने की थी। रिपोर्ट में कहा गया है, 'खुफिया जांच में संकेत मिले कि ब्रिटेन के एक वित्तीय संस्थान में ऐंबी वैली (मॉरीशस) लिमिटेड के नाम पर खाता है और इसका नियंत्रण सुब्रत रॉय करते हैं। खाताधारक 80 लाख पाउंड का हस्तांतरण इस खाते से एसजी हैमब्रॉस बैंक (चैनल आइलैंड्स) लिमिटेड में करना चाहता था।' विदेशी एफआईयू ने कहा कि कंपनी की मंशा बैंक ऑफ चाइना में मौजूद खाते में और 19 करोड़ पाउंड का हस्तांतरण करने की थी। न्यूयॉर्क स्थित एक होटल के अधिग्रहण की खातिर अन्य कंपनी फिडेलिटी नैशनल टाइटल कंपनी के पास भी रकम रखी गई थी। 
 
31 अगस्त 2012 को उच्चतम न्यायालय ने सैट व सेबी का आदेश बरकरार रखा। न्यायालय ने एसआईआरईसीएल और एसएचआईसीएल को आदेश दिया कि कंपनियां 2.96 करोड़ निवेशकों से जुटाई गई 24,029 करोड़ रुपये की रकम 15 फीसदी ब्याज के साथ उन्हें लौटाएं। निवेशकों की पहचान की जांच करने के बाद उन्हें रकम लौटाने की जिम्मेदारी सेबी को सौंपी गई। नवंबर 2012 में सहारा ने 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम खर्च कर न्यूयॉर्क में दो होटलों का अधिग्रहण किया। दिसंबर 2012 में समूह ने अखबारों में विज्ञापन के जरिये घोषणा की कि उसे ओएफसीडी निवेशकों को महज 2,620 करोड़ रुपये चुकाने हैं। अभी तक समूह ने निवेशकों को भुगतान के लिए 5,120 करोड़ रुपये जमा किए हैं, जिसमें अंतर की भरपाई के लिए अतिरिक्त 2,500 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। (बीएस)

 

सहारा में सनसनी, विजय राय ने चैनल छोड़ा, मनोज मनु मेट्रो एडिटर बने

सहारा समय चैनल के दिग्गज विजय राय सहारा न्यूज से अलग हो गए हैं। विजय राय चैनल में कद्दावर थे और उनके पास सहारा न्यूज के ब्यूरो हेड की जिम्मेदारी थी। सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक विजय राय से इस्तीफा ले लिया गया है। हालांकि अभी तक इसका कारण पता नहीं लग पाया है। सूत्रों का कहना है कि विजय राय का जाना वर्चस्व की लड़ाई का नतीजा है। राय पिछले काफी वक्त से सहारा में सक्रिय थे। एक अन्य खबर में मनोज मनु को मेट्रो एडिटर बना दिया गया है।

इससे पहले मनोज मनु सहारा नेशनल और एमपी चैनल के हेड थे। बाद में उनसे नेशनल की जिम्मेदारी ले ली गई थी। फिलहाल उनके पास एमपी की ही जिम्मेदारी थी,जिसे बढ़ाते हुए अब उन्हें मेट्रो एडिटर का अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया है।

सहाराश्री के सचिवालय से चित्रा का इस्तीफा

चित्रा त्रिपाठी ने सहारा ग्रुप को बॉय बोल दिया है। चित्रा सहाराश्री के सचिवालय का हिस्सा थीं, जहां से वह अलग हो गई हैं। चित्रा पहले सहारा टीवी में एंकर थीं। मगर कुछ समय पहले उन्हें मुंबई में स्थित सहाराश्री के सचिवालय में भेज दिया गया था। तब से वह यहीं काम कर रही थी। सचिवालय में मुख्यधारा की मीडिया जैसा काम नहीं होने के कारण चित्रा ने यह निर्णय लिया है।

हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि चित्रा ने खुद नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया है बल्कि उन्हें जाने को कह दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक चित्रा अब फिर से मुख्यधारा की पत्रकारिता से जुड़ने की जुगत में हैं।
 

दुर्घटना में सहाराकर्मी के मासूम पुत्र की मौत

नई दिल्ली। गाजीपुर थाना क्षेत्र के मयूर विहार फेज-3 में एक तेज रफ्तार कार से कुचलकर तीसरी कक्षा के छात्र की मौत हो गई। छात्र की पहचान नीरज जोशी (8) के रूप में हुई है। नीरज के पिता सहारा इंडिया परिवार में बतौर चालक तैनात हैं। पुलिस ने नीरज के शव को पोस्टमार्टम के बाद उसके परिजनों के हवाले कर दिया है।

छात्र नीरज अपने पिता राजेंद्र जोशी, मां राधा जोशी व बड़े भाई के साथ मयूर विहार फेज-3 स्थित जनता फ्लैट में रहता था। वह रामईश पब्लिक स्कूल में तीसरी कक्षा में पढ़ता था। शनिवार रात पड़ोस में रहने वाली उसकी फुफेरी बहन की शादी थी। इसके चलते शाम को ही नीरज अपने परिजनों के साथ फुफेरी बहन के घर चला गया था। देर शाम नीरज अपनी मां राधा के साथ कपड़े बदलने के लिए अपने घर जा रहा था। गाजीपुर पुलिस बूथ के पास सड़क पार करते समय राधा तो आगे निकल गई, लेकिन नीरज को एक तेज रफ्तार कार ने कुचल दिया। गंभीर हालत में नीरज को उसके परिजन नोएडा के एक निजी अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। कार चालक विनोद को गिरफ्तार कर लिया गया है। साभार : सहारा    

सहारा और मौर्य टीवी ने गलत खबर चलाकर दहशत फैलाई

बिहार-झारखंड के दो खबरिया चैनल सहारा समय और मौर्य टीवी ने आगे निकलने की होड़ में गलत खबर दिखाकर लोगों के बीच दहशत फैलाने का काम किया. दरअसल 27 नवम्‍बर की देर रात गिरीडीह जिले के हजारी बाग रोड रेलवे स्‍टेशन के समीप रेलवे ट्रैक पर केन बम होने बात आरपीएफ को पता चली. इसके बाद महुआ, ईटीवी एवं कशिश पर ट्रैक पर केन बम होने की आशंका का ब्रेकिंग देर रात को चला. इस खबर को देखकर सहारा समय और मौर्य टीवी ने खुद ही ये खबर चला दी कि ट्रैक पर तीन-चार केन बम हैं, जिसे निकाला गया.

सुबह हुई और जब पुलिस उस स्‍थान पर पहुंची तो देखा कि ट्रैक पर बम नहीं है बल्कि स्‍टील का खाली कंटेनर रखा हुआ है. यहां के बाद जिन चैनल ने बम की आशंका की खबर चलाई उनकी तो साख बच गई लेकिन सहारा और मौर्य टीवी की काफी किरकिरी हुई. जब अंदर की बात पता की गई तो मालूम हुआ कि सहारा और मौर्य में इस खबर को सनसनी बनाने का काम दोनों चैनलों के धनबाद के रिपोर्टर क्रमश: बलराम दुबे और नितेश मिश्रा ने किया.

दरअसल दोनों रिपोर्टर चैनल में अपनी छाप सबसे तेज रिपोर्टर की तरह छोड़ना चाहते हैं, तभी दूसरे जिले की खबर को दोनों ने ब्रेक कराया. खबर है कि दोनों की इस रिपोर्ट की शिकायत चेनल वरिष्‍ठ लोगों से दोनों चैनलों के गिरीडीह के रिपोर्टर ने की है. अब देखना है कि इनके खिलाफ कुछ एक्‍शन लिया जाता है या फिर खबरों को सनसनी बनाने के लिए छोड़ दिया जाता है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सहारा को फिलहाल थोड़े दिनों की राहत

सर्वोच्च न्यायालय ने सहारा समूह को राहत देते हुए आज कहा कि प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (एसएटी) के उस आदेश पर अमल के लिए अगले साल 8 जनवरी तक इंतजार किया जा सकता है, जिसके तहत सहारा समूह की कंपनियों से निवेशकों के 17,400 करोड़ रुपये लौटाने को कहा गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि निवेशकों की रकम वापसी के लिए एसएटी की ओर से दिए गए 6 सप्ताह की अवधि को फिलहाल ठंडे बस्ते में रखा जाएगा और इस मामले में अगला आदेश 8 जनवरी को सुनवाई के बाद दिया जाएगा।

इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने इन कंपनियों से कहा कि वे 30 नवंबर तक अपनी-अपनी शुद्घ परिसंपत्तियां दर्शाएं और वित्त वर्ष 2010-11 की बैलेंस शीट एवं खातों के स्टेटमेंट पेश करें। प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिय़ा की अध्यक्षता वाले पीठ ने सहारा समूह की 2 कंपनियों- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन को यह भी निर्देश दिया कि वे पहले से एकत्रित फंडों के आवेदन और उन परिसंपत्तियों के बारे में हलफनामा दायर करें, जिनकी देनदारी बनी है। शीर्ष न्यायालय के आदेश में कंपनियों से यह भी बताने को कहा गया है कि उन्होंने देनदारियों और डिबेंचर धारकों की जमा रकम को कैसे सुरक्षित किया है।

कुल मिलाकर 2.3 करोड़ निवेशकों की रकम लौटाने के आदेश पर रोक अगले साल 9 जनवरी तक जारी रहेगी, जब दोनों कंपनियों द्वारा हलफनामा दायर किए जाने के बाद इस मामले पर एक बार फिर गौर किया जाएगा। एसएटी ने वैकल्पिक तौर पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचरों के लिए निवेशकों से जुटाई गई रकम पर विवाद के मामले में अपील करने के लिए आज तक का समय दिया था। हालांकि एसएटी के आदेश का बचाव करने के लिए पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के वकील अदालत में पेश हुए, लेकिन न्यायालय ने विनियामक को औपचारिक नोटिस जारी किया।

सहारा की कंपनियों की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील एफ एस नरीमन ने ऐसे बॉन्डों के 3 सेट अदालत में जमा कराया, जिन्हें इन कंपनियों ने जारी किया है और उन्हें 4 वर्षों बाद या उससे पहले भुनाया जा सकता है। लाखों निवेशकों ने इन डिबेंचरों को परिपक्वता अवधि से पहले भुनाया है और उनमें से किसी ने भी स्कीम के खिलाफ शिकायत नहीं दर्ज कराई है।

फिर भी न्यायाधीशों ने सवाल किया कि कंपनियां यह कैसे सुनिश्चित करती हैं कि पैसे लौट दिए जाएंगे और निवेशकों के हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है। उन्होंने कंपनियों से कहा, 'हमें आंकड़े, बैलेंस शीट और परिसंपत्तियां दिखाएं।. उन्होंने पाया कि ये असुरक्षित ऋण हैं। न्यायाधीशों ने कहा, 'बगैर सिक्योरिटी, नकदी या कोई भी अन्य साधन के बॉन्ड नहीं जारी किए जा सकते।

सेबी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अरविंद दतर जानना चाहते थे कि लोगों से जुटाए गए धन का क्या हुआ। उन्होंने सवाल उठाया, 'यदि धन फंस जाता है तो सुरक्षा के क्या उपाए किए गए हैं?. दतर ने अपनी दलील में कहा कि इस स्कीम का खतरनाक पहलू यह है कि इसमें बांध और हवाई अड्डों जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं की बात कही गई है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कीम के कुछ अन्य पहलू भी हैं, जो स्पष्ट नहीं हैं। साभार : बीएस

sebi sahara

चौबीस घंटे में बदल गए राष्‍ट्रीय सहारा के संपादक के तेवर!

वाह रे सहारा! गोरखपुर के राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय विभाग में कैसे काम होता है इसका एक नमूना शनिवार को और दूसरा रविवार को देखने को मिला. संपादक ने शनिवार को चेकिंग की तो संपादकीय विभाग के 11 में से 8 बंदे गायब मिले. संपादक मनोज तिवारी ने गायब मिले आठों पर रेड लगा दिया, मतलब लेट आए तो अनुपस्थित हो गए. काम किये लेकिन उस दिन की तनख्‍वाह नहीं बनेगी. लेकिन वही संपादक रविवार को इतने नार्मल हो गये कि लोगों को विश्‍वास ही नहीं हुआ.

सिटी डेस्क के भुत्भवन मिश्रा दो घण्टे लेट आये तो उनके इन्तजार में मीटिंग देर से शाम को छह बजे की बजाय आठ बजे शुरू हुई. अब लोग कह रहे है कि अचानक संपादक के तेवर में चौबीस घंटे में इतना परिवर्तन कैसे आ गया. कहा जा रहा है कि सहारा में किसी का नहीं चलता है, इसिलिए लोग कार्रवाई करने में डर रहे हैं. संपादक का तेवर भी ज्‍यादा दिन तक नहीं चल पाएगा.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

अखबारों ने निभाई स्‍टाफगीरी, नहीं छपी सुब्रत राय वाली खबर

स्टाफगीरी के चलते चालक, परिचालक बसों में फ्री चलते हैं, इसी तरह एक नाई दूसरे नाई से शेव करने के पैसे नहीं लेता। ऐसी ही स्टाफगीरी अखबार की दुनिया में निभाई जाने लगी है। यह स्टाफगीरी सही है या गलत, इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता, पर सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय के मामले में अखबारों की स्टाफगीरी देख कर वाकई आश्चर्य हुआ।

हालांकि पिछले दिनों सेबी की कार्रवाई वाली सुब्रत राय की खबर को अधिकांश अखबारों ने प्रथम पेज पर स्थान दिया था, लेकिन अगले ही दिन सुब्रत राय ने अधिकांश अखबारों में प्रथम पेज पर विज्ञापन के माध्यम से अपना पक्ष रखा, तो फिर सभी अखबारों से खबर गायब हो गयी, जबकि वह विज्ञापन की जगह प्रेसवार्ता के माध्यम से ही अपना अधिकारपूर्ण पक्ष रख सकते थे और अखबारों को उनका पक्ष प्रकाशित भी करना पड़ता, पर उन्होंने ऐसा करने की बजाये विज्ञापन के माध्यम से सभी अखबारों की आत्माओं को खरीदना उचित समझा, लेकिन अखबार मालिक तर्क दे रहे हैं कि सुब्रत राय मीडिया से जुड़े हैं, इसलिए उनके विरुद्ध खबरें नहीं छापनी चाहिए।

अखबार मालिकों के इस तर्क पर सवाल उठता है कि उन्होंने जब सेबी वाली खबर छापी थी, तब उनका तर्क कहां गया था? तर्क को अगर सही भी मान लिया, तो सवाल यह भी उठ रहा है कि सटोरिये या दाउद इब्राहिम भी अखबार निकालने लगें, तो क्या उनके साथ भी स्टाफगीरी निभायेंगे? खैर, तर्क जो भी दिये जायें, पर असलियत यही है कि सुब्रत राय ने अधिकांश अखबारों को खरीद लिया है, तभी सुब्रत राय को अदालत द्वारा भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई की खबर किसी बड़े अखबार में नहीं छापी गयी है। बदायूं में अधिकांश पाठक बड़े अखबारों की आलोचना करते नजर आये, क्योंकि बदायूं अमर प्रभात ने इस खबर को प्रथम पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

बदायूं से बीपी गौतम की रिपोर्ट.

सुब्रत राय पर कोर्ट ने कसा शिकंजा, भगोड़ा घोषित करने की तैयारी

बदायूं। न्यायालय के आदेशों को गंभीरता से न लेने पर सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय को मजिस्ट्रेट ने भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। मामले की अगली सुनवाई अब 18 दिसंबर को होगी, जिसमें सुब्रत राय हाजिर नहीं हुए तो उनके विरुद्ध कुर्की के आदेश भी हो सकते हैं। सहारा ग्रुप के नेतृत्व में संचालित कंपनी द्वारा पच्चीस साल पहले गोल्डन की एकाउंट नाम की योजना चलाई गयी थी, जिसके तहत देश भर से करीब दस हजार लोगों से पच्चीस सौ रुपये प्रति व्यक्ति जमा कराये गये थे।

योजना के तहत धन जमा करने वाले लोगों के बीच ड्रा होने के बाद विभिन्न इनामों का बंटवारा होना था, जो नियमानुसार दस सालों का निरंतर होते रहना चाहिए था, लेकिन आरोप है कि दो सालों के बाद ड्रा बंद कर दिये गये और धन जमा करने वालों को कोई सूचना भी नहीं दी गई। न ही धन वापस करने के बारे में संतोष जनक उत्तर दिया गया। इस योजना का शिकार कस्बा बिसौली के मोहल्ला होली चौक निवासी एडवोकेट धनवीर सक्सेना भी हुए। उन्होंने सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय और स्थानीय शाखा प्रबंधक को नोटिस देकर जवाब मांगा, पर उन्होंने संतोषजनक उत्तर नहीं दिया, इस पर वर्ष 1997 में मुकदमा संख्या 16-15/1997 के तहत मुंसिफ मजिस्ट्रेट बिसौली के न्यायालय में पीडि़त ने वाद दायर कर दिया। 24 मार्च 1999 को मुरादाबाद जनपद के कस्बा चंदौसी स्थित शाखा के प्रबंधक वेदराम सैलानी व सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत राय को तलब किया गया। कई तारीखों के बाद शाखा प्रबंधक तो न्यायालय में हाजिर हो गये, पर चेयरमैन की ओर से वकील ने पक्ष रखा।

बाद में शाखा प्रबंधक ने भी आना बंद कर दिया, जिस पर न्यायालय ने सहारा ग्रुप के चेयरमैन व शाखा प्रबंधक के विरुद्ध वारंट जारी किया, पर वह नहीं आये। इसके बाद अदालत के गैर जमानती वारंट जारी करने पर भी वह नहीं आये। न्यायालय के आदेशों की लगातार अवहेलना होने पर न्यायालय ने सुब्रत राय और शाखा प्रबंधक वेदराम सैलानी के विरुद्ध भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। मामले की अगली सुनबाई 18 दिसंबर को होगी। कयास लगाये जा रहे हैं कि उक्त लोग तारीख पर नहीं आये, तो इनके विरुद्ध न्यायालय कुर्की की कार्रवाई कर सकता है।

बदायूं से पत्रकार बीपी गौतम की रिपोर्ट. बीपी से 08979019871 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

…ब्रृजेश ने स्‍पष्‍टीकरण नहीं दिया तो सहारा से 13 नवम्‍बर को चली जाएगी नौकरी

सहारा इंडिया यूपी-उत्‍तराखंड चैनल में सीनियर करेस्‍पांडेंट एवं एक्‍जीक्‍यूटिव के पद पर लखनऊ में कार्यरत ब्रृजेश सिंह के बारे में राष्‍ट्रीय सहारा में नोटिस छापी गई है. यह नोटिस अखबार के दिल्‍ली एडिशन के पेज नम्‍बर तीन पर प्रकाशित की गई है. नोटिस के अनुसार लखनऊ के विज्ञानपुरी में रहने वाले ब्रृजेश सिंह (कर्मचारी कोड संख्‍या – 76090) का तबादला 27 अगस्‍त को पटना के लिए कर दिया गया था. उन्‍हें सहारा के बिहार-झारखंड चैनल के लिए काम करने को कहा गया था, परन्‍तु बृजेश सिंह ने ना तो वहां ज्‍वाइन किया और ना ही लखनऊ में काम कर रहे हैं और ना ही किसी प्रकार की सूचना प्रबंधन को दी है.

नोटिस में लिखा गया है कि बृजेश के घर के पते पर नोएडा कार्यालय से भेजे गए दो नोटिस क्रमश: 20 सितम्‍बर एवं 27 सितम्‍बर को वापस कर दिए गए. डाकिये ने लिखा कि लेने से इनकार किया गया. नोटिस में लिखा गया है कि ब्रृजेश की यह हरकत सहारा टीवी नेटवर्क के सीएसओ की धारा 33 एवं 34 (2) के अनुसार अनुशासनहीनता है, अगर नोटिस छपने के तीन दिन के अंदर ब्रृजेश ने इस संदर्भ में स्‍पष्‍टीकरण एवं संपर्क नहीं किया तो चौथे उन्‍हें टर्मिनेट कर दिया जाएगा. 

राष्‍ट्रीय सहारा, आजमगढ़ के प्रभारी बने राजेश, राजीव की नई पारी

राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस यूनिट में कुछ फेरबदल किया गया है. बनारस में स्‍टाफर के रूप में तैनात राजेश मिश्र को आजमगढ़ का नया प्रभारी बनाया गया है. राजेश इसके पहले हिंदुस्‍तान को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इससे पहले आजमगढ़ की जिम्‍मेदारी विवेकानंद मिश्र के पास थी, जो अब राजेश को रिपोर्ट करेंगे. बनारस यूनिट में ब्‍यूरो कोआर्डिनेशन देख रहे सुभाष पाठक को शंटिंग लाइन में डाल दिया गया है. उनकी जगह पहले भी डेस्‍क इंचार्ज रहे अभयानंद शुक्‍ल को कोआर्डिनेशन की जिम्‍मेदारी दे दी गई थी.

वन वर्ल्‍ड साउथ एशिया से खबर है कि राजीव टिक्‍को ने ज्‍वाइन किया है. इसके पहले वे एफई में डिप्‍टी एडिटर के पोस्‍ट पर कार्यर‍त थे. राजीव इस फील्‍ड में काफी समय से सक्रिय हैं.

न्‍यूज चैनलों को महंगा पड़ेगा नान-न्यूज दिखाना

नई दिल्ली। टीवी न्यूज चैनलों के लिए फिल्मी गाने और फिल्मी दृश्य दिखाना अब आसान नहीं होगा। नए कॉपीराइट विधेयक के अनुसार न्यूज चैनलों को फिल्मकार, गीतकार या कॉपीराइट होल्डर से अनुमति लेनी होगी और उसे रॉयल्टी देनी होगी। अभी तक की व्यवस्था के अनुसार आधे मिनट से कम समय का क्लिप टीवी चैनलों पर चल सकता है। यह व्यवस्था खेलों पर लागू होती है लेकिन फिल्मकारों, गीतकारों, संगीतकारों, कलाकारों, नाटककारों और साहित्यकारों के लगातार आपत्ति जताने के बाद सरकार चेती है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यश चोपड़ा की अध्यक्षता में एक कमेटी का भी गठन किया था कि जिसमें पाइरेसी रोकने और कॉपीराइट कानून को मजबूत करने पर सुझाव दिए थे। चूंकि कॉपीराइट कानून मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन आता है इसलिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने सुझाव एचआरडी मिनस्ट्री को सौंप दिए थे। संसद के मानसून सत्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कॉपीराइट संशोधन विधेयक-2011 पेश किया था और उसे 27 अगस्त को पारित कराने के लिए राज्यसभा में पेश भी किया था लेकिन भ्रष्टाचार पर ऐसा हंगामा हुआ कि कपिल सिब्बल के तीन विधेयक लटक गए।

इसी बीच कॉपीराइट विधेयक में एक और संशोधन किया गया है, जिसमें न्यूज चैनलों पर लगाम लगाने का प्रयास किया गया है। अभी न्यूज चैनल किसी कलाकार को श्रृद्धांजलि देते हुए उनके कार्य को दिखातें हैं, कुछ चैनल फ्लैश बैक नाम से भूले बिसरे दिनों को याद करते हैं। नए संशोधन के मुताबिक अब किसी भी चैनल को फिल्मी सीन या गीत दिखाने से पहले कॉपीराइट होल्डर से अनुमति लेनी होगी और उसे रॉयल्टी देनी होगी। यह रॉयल्टी फिल्मों की ही तरह महंगी होगी। बड़े चैनल तो महंगी रॉयल्टी का बोझ उठा भी लेंगे लेकिन छोटे मोटे न्यूज चैनल मोहताज हो जाएंगे।

मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने कपिल सिब्बल के इस प्रस्ताव का विरोध किया है। आगामी 22 नवम्बर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में जब यह संशोधन विधेयक फिर से राज्यसभा में पारित होने के लिए पेश किया जाएगा तब इस पर चर्चा होगी। कॉपीराइट पर गठित कमेटी के एक सदस्य गीतकार और राज्यसभा सदस्य जावेद अख्तर ने गीतकारों को रॉयल्टी देने की पुरजोर वकालत की थी। साभार : सहारा

ब्‍यूरोचीफ अमरनाथ की देहरादून में वापसी, राष्‍ट्रीय सहारा में हलचल

: जनवाणी से जुड़े अनिल रावत : राष्ट्रीय सहारा से खबर है कि देहरादून एडिशन के स्थानीय संपादक एलएन शीतल के साथ हुए विवाद में नोएडा एटैच किए गए ब्यूरो चीफ अमरनाथ की वापसी कर दी गई है। अमरनाथ को ब्यूरो चीफ के पद पर ही देहरादून भेजा गया है। करीब छह पूर्व ब्यूरो चीफ और संपादक के बीच विवाद इतना बढ़ा कि मारपीट की नौबत आ गई थी। इस विवाद के चलते ही अमरनाथ को नोएडा अटैच कर लिया गया था।

अब इस नये घटनाक्रम को स्थानीय संपादक एलएन शीतल के लिए एक झटके के रूप में देखा जा रहा है। शीतल के विरोधी इस वापसी के कई मायने निकाल रहे हैं। शीतल इन दिनों एक और मुश्किल में फंसे हैं। हुआ यूं कि सहारा ने राज्य सरकार से मिले चार पृष्ठों का पिछले दिनों विज्ञापन परिशिष्ट छापा, लेकिन उसका ऐसा गुड़गोबर हुआ कि मुख्यमंत्री की नाराजगी के चलते वही परिशिष्ट अगले दिन दोबारा छापना पड़ा, और जो भद्द पिटी सो अलग। विज्ञापन में सीएम खंडूड़ी के ‘भ्रष्टाचार की दिशा में बढ़ते कदम’ जैसे स्लोगन छपने के साथ ही कई और गलतियां चली गईं। यह विज्ञापन उसी दिन बाजार में आया जब खंडूड़ी, भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त बिल विधानसभा में पेश कर रहे थे। इस मामले की भी सहारा में जांच चल रही है।

उधर, देहरादून से ही एक अन्य खबर है कि अभी तक अंग्रेजी दैनिक ट्रिब्यून को अपनी सेवाएं दे रहे फोटो जर्नलिस्ट अनिल रावत ने देहरादून में ही दैनिक जनवाणी ज्वाइन कर लिया है।

सहारा का नया ऑफिस… किराया सवा सौ करोड़ रुपये

मुंबई : अपनी रहस्‍यमय दुनिया से सबको हैरान कर देने वाले सुब्रत रॉय ने एक बार फिर लोगों को अचम्‍भे में डाल दिया है. अब उनकी कंपनी का नया लखनऊ से मुंबई शिफ्ट कर लिया है. हैरानी कंपनी के ऑफिस की शिफ्टिंग नहीं बल्कि इसका किराया है. इस नए आफिस का सालाना किराया एक अरब से भी ज्‍यादा है. जी हां हैरान मत होइए, यह सच है. मुंबई के प्रसिद्ध बांद्रा-कुर्ला कॉमप्लेक्स में एक ऑफिस का किराया इतना ही है.

सहारा का नया आफिस इसी कांम्‍पलेक्‍स में शिफ्ट हुआ है तथा तमाम सुविधाओं से लैस है और बिल्कुल मॉडर्न है. यह ऑफिस 3.5 लाख वर्ग फुट में है, इसके लिए ग्रुप 11 करोड़ रुपए महीने का किराया देगा, यानी साल में वह 132 करोड़ के आसपास की रकम किराए पर ही खर्च करेगा. इस तरह से यह देश का सबसे महंगा ऑफिस होगा. देश की तमाम कंपनियों का इतना सालाना टर्न ओवर नहीं होगा, जितना सहारा एक साल में किराए पर खर्च करेगा.

सहारा में पिछले कुछ समय के हलचल ने सबको आश्‍चर्य में डाल रखा है. तमाम मुश्किलें झेलते हुए भी सहारा कई चमत्‍कार करता जा रहा है. सेबी को बिना बताए दो कंपनियों के नाम पर लिए गए पैसे को लौटाने का निर्देश सैट ने दिया है. सहारा बैंकिंग में पैसा जमा करने वालों को भी अलगे दो से तीन सालों में पैसा लौटाने हैं. कुछ दिन पहले ही सहारा ने पांच सौ करोड़ में फोर्स इंडिया में 42.5 प्रतिशत हिस्‍सेदारी खरीदी थी. उसके बाद अब इतने महंगा किराया, सभी को अचंभित किया है.

गौरतलब है कि यह ऑफिस जिस बिल्डिंग में है उसका नाम है क्रेसेंज़ो और इसे विकसित किय़ा है परीनी डेवलपर्स ने. इसे डिजाइन किया है देश के जाने-माने आर्किटेक्ट हफीज़ कॉन्ट्रैक्टर ने. इस बिल्डिंग की गिनती मुंबई के शानदार और जानदार भवनों में होती है. 

सुदर्शन न्‍यूज से बिकास एवं राष्‍ट्रीय सहारा से अजीत पांडेय ने इस्‍तीफा दिया

सुदर्शन न्‍यूज, नोएडा से खबर है कि बिकास प्रसाद ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी फ्रंटियर न्‍यूज, गुवाहाटी के साथ शुरू की है. इन्‍हें न्‍यूज प्रोड्यूसर बनाया गया है. मूल रूप से वेस्‍ट बंगाल के आसनसोल के रहने वाले बिकास प्रसाद ने करियर की शुरुआत सहारा समय से की थी. इसके बाद सुदर्शन न्‍यूज से जुड़ गए थे.

राष्‍ट्रीय सहारा, चंदौली से खबर है कि अजीत पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर थे. बताया जा रहा है कि ब्‍यूरोचीफ से विवाद होने के बाद उन्‍होंने अपना इस्‍तीफा प्रबंधन को सौंप दिया. वे अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. अजीत की जगह मुगलसराय ऑफिस में तैनात राजीव गुप्‍ता को चंदौली का संवाददाता बना दिया गया है. राजीव काफी समय से राष्‍ट्रीय सहारा से जुड़े हुए हैं. उसके पहले वे युनाइटेड भारत समेत कई अखबारों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

राष्‍ट्रीय सहारा, पटना के आफिस में पीने का पानी भी बंद

राष्‍ट्रीय सहारा, पटना में डेस्‍क पर काम करने वाले तथा सिटी रिपोर्टर परेशान हैं. पिछले दो महीने से ऑफिस में चाय तो बंद ही थी अब पीने के लिए पानी मिलना भी बंद हो गया है. डेस्‍क वाले तो किसी तरह अपना काम चला रहे हैं पर दिन भर इधर-उधर से दौड़ कर के आने के बाद सिटी रिपोर्टरों को अब पानी भी नसीब नहीं हो रहा है. एसी भी काफी समय से खराब है, जिससे फजीहत और बढ़ गई है. 

राष्‍ट्रीय सहारा के सिटी रिपोर्टर काम की अधिकता के बाद अब पानी को लेकर परेशान हैं. सिटी और ब्‍यूरो में काम बंटवारे को लेकर पूरी तरह से अंधेरगर्दी है. सिटी के चार से पांच पेजों को भरने की जिम्‍मेदारी मात्र छह रिपोर्टरों की है. इसमें भी लगभग हर दिन एक रिपोर्टर साप्‍ताहिक अवकाश के चलते छुट्टी पर होता है. यानी औसतन पांच रिपोर्टर ही इन पेजों के लिए काम पर होते हैं. वहीं ब्‍यूरो के पास एक पेज भरने की जिम्‍मेदारी होती है, पर इनके पास रिपोर्टरों की संख्‍या नौ है. इन मुश्किलों से जूझ रहे सिटी रिपोर्टरों की परेशानियां और ज्‍यादा बढ़ गई हैं. 

बिल्डिंग के सातवें तल पर स्थित राष्‍ट्रीय सहारा के आफिस के न्‍यूज रूम का एसी भी खराब है. बंदरों का आतंक अलग से है. कई लोगों को ये बंदर काट चुके हैं. बिल्डिंग के लिए पानी की जो टंकी बनाई गई है उसका मुंह खुला हुआ है. इसमें बंदरों के स्‍नान करने से लेकर चील-कौवों की बीट तक पड़ी रहती है, लिहाजा कोई भी इसे पीने में इस्‍तेमाल नहीं करता है. राष्‍ट्रीय सहारा में भी पीने के लिए अलग पानी का इंतजाम किया जाता था, पर चाय के बाद अब उसे भी बंद कर दिया गया है. राष्‍ट्रीय सहारा में काम करने वाले सिटी रिपोर्टर तो जल्‍द से जल्‍द यहां से पलायन करने की कोशिश में लगे हुए हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

राष्‍ट्रीय सहारा पहुंचे कमलेश, टीवी100 से आसिफ-नीरज निकले

स्‍वतंत्र चेतना, गोरखपुर से कमलेश सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. कमलेश यहां क्राइम रिपोर्टर थे. वे बीच के कुछ माह को छोड़कर पिछले बारह सालों से स्‍वतंत्र चेतना को अपनी सेवाएं दे रहे थे. इन्‍होंने अपनी नई पारी गोरखपुर में ही राष्‍ट्रीय सहारा से शुरू की है. इन्‍हें यहां भी क्राइम रिपोर्टर बनाया गया है. स्‍वतंत्र चेतना से ही करियर शुरू करने वाले कमलेश सिंह कुछ समय के लिए हिंदुस्‍तान के साथ भी जुड़े, परन्‍तु जल्‍द ही वापस स्‍वतंत्र चेतना लौट गए थे. कमलेश के जाने के बाद कुछ अन्‍य पत्रकार भी स्‍वतंत्र चेतना को झटका दे सकते हैं.

टीवी100 से आसिफ शेख एवं नीरज राठी ने इस्‍तीफा दे दिया है. आसिफ शेख एंकर एवं वीओ आर्टिस्‍ट थे. संभावना जताई जा रही है कि आसिफ चैनल वन से जुड़ सकते हैं. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. नीरज प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे तथा रन डाउन संभालते थे. नीरज फिलहाल नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं. बताया जा रहा है कि वे एक नवम्‍बर को वीओएन ज्‍वाइन करेंगे. दोनों लोगों के इस्‍तीफे की पुष्टि चैनल हेड राजीव पंछी ने की.

अजीज बर्नी ने कहा संघ से उन्‍होंने नहीं मांगी माफी, उपेंद्र राय ने लिखा था माफीनामा

: जस्टिस काटजू की उपस्थिति में भिड़े उर्दू के दिग्‍गज पत्रकार : रविवार को नेशनल काउन्सिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू ने मीडिया में मुसलमानों की इमेज के बारे एक संगोष्ठी का आयोजन किया था. इसकी अध्यक्षता प्रेस क्‍लब ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मारकंडेय काटजू कर रहे थे. संगोष्ठी में उस समय बवाल हो गया जब डेली जदीद मेल के संपादक ज़फर आगा ने सभा में उपस्थित उर्दू सहारा के संपादक अज़ीज़ बर्नी की इस बात के लिए प्रशंसा करना शुरू कर दी कि वह मुस्लिमों के लिए अपने अखबार के द्वारा बहुत कुछ कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि मुस्लिमों का अपना अखबार न होने के कारण सारी कठिनाई है. उन्होंने सहाराश्री की तारीफ़ करते हुए मिड डे ग्रुप के मालिकों पर हमला कर दिया और कहा कि उन्होंने मुसलमानों के एक बड़े अखबार को जागरण समूह के हाथ बेच कर बड़ा ग़लत काम किया. इस पर वहां उपस्थित दैनिक इन्‍कलाब के संपादक शकील शम्सी भड़क गए और उन्होंने ज़फर आगा को बीच में ही टोक दिया. उन्होंने कहा कि आगा इस प्रकार की बात दुर्भावना और व्यक्तिगत स्‍वार्थों के लिए कर रहे हैं. इस पर आयोजकों को हस्‍तक्षेप करना पड़ा और उन्हों ने ज़फर आगा से कहा कि वह इस प्रकार की बात न करें.

इसी मामले पर बोलते हुए उर्दू दैनिक हमारा समाज के संपादक खालिद अनवर ने कहा कि ज़फर आगा किस मुंह से सहारा ग्रुप की तारीफ कर रहे हैं. इसी सहारा ग्रुप ने श्री बर्नी को इस बात के लिए मजबूर किया था कि वह संघ से माफ़ी मांगें. इस प्रकार सहारा ने उर्दू के इतने बड़े संपादक को ज़लील किया था. इस पर श्री बर्नी ने कहा कि उन्हों ने कभी माफ़ी नहीं मांगी और सहारा के प्रथम पृष्‍ठ पर जो माफ़ीनामा छपा उस को शकील शम्सी ने उस समय लिखा था, जब वह सहारा उर्दू में कार्य करते थे. इस पर श्री शम्सी ने कहा कि अब वह सहारा में नहीं हैं इस लिए कुछ बोलना उचित नहीं है, लेकिन यहाँ पर इतने पत्रकार मौजूद हैं इसलिए मैं बताना चाहूँगा कि जिस समय श्री बर्नी को श्री उपेन्द्र राय ने फ़ोर्स लीव पर भेज कर उन्हें उर्दू सहारा का चार्ज दिया था, तब उपेन्द्र राय के कार्यालय से ही वह माफ़ीनामा इस निर्देश के साथ उर्दू विभाग भेजा गया था कि इस को बिना किसी परिवर्तन के पहले पेज पर छापा जाये.

श्री शम्सी ने कहा कि उन्होंने फ़ोन पर यह माफ़ीनामा श्री बर्नी को पढ़ कर सुनाया था और श्री बर्नी ने उसे सुन कर एक छोटा सा परिवर्तन बताया था, जिसे उपेन्द्र राय ने नामंज़ूर कर दिया और चूँकि उपेन्द्र राय श्री बर्नी से बड़े अधिकारी थे इस लिए उन का फैसला आखिरी और सर्वमान्य था. इस लिए माफ़ीनामा उसी रूप में छापा गया जिस रूप में वह प्राप्त हुआ था. श्री बर्नी द्वारा उपेन्द्र राय के सहारा में किनारे कर दिए जाने के बाद इस प्रकार का बयान दिए जाने से लग रहा है कि सहारा परिवार ने अब सारी कवायद का ठीकरा उपेन्द्र राय के सिर पर फोड़ना शुरू कर  दिया है. उधर उर्दू अख़बार पढ़ने वाले लोग पूछ रहे हैं कि यदि श्री बर्नी का माफ़ीनामा गलत था तो वह अपने अखबार में उस का खंडन क्यों नहीं कर रहे हैं? लोगों का मानना है कि श्री बर्नी उर्दू पाठकों में फिर से लोक प्रिय होने के लिए अब संघ के सामने पेश किये गए माफ़ीनामे से इनकार कर रहे हैं. अब जवाब स्‍वतंत्र मिश्र को देना है कि वह माफ़ीनामा झूठा था या सहारा परिवार की मंज़ूरी उस को प्राप्त थी?

राष्‍ट्रीय सहारा के पत्रकार मोहित श्रीवास्‍तव को पितृ शोक

राष्ट्रीय सहारा नोएडा के संपादकीय विभाग में कार्यरत वरिष्‍ठ पत्रकार मोहित श्रीवास्तव के पिता भगवान प्रसाद श्रीवास्तव का रविवार को उनके निवास स्थान मोहल्ला टूंडली (टूंडला) जिला फिरोजाबाद में आकस्मिक निधन हो गया। वह 66 वर्ष के थे। वे एयरफोर्स से सेवानिवृत्त होने के बाद से टूंडली में ही रह रहे थे। स्वर्गीय श्रीवास्तव के परिवार में उनकी पत्नी पुष्पा श्रीवास्तव, दो पुत्री सीमा श्रीवास्तव व मनीषा श्रीवास्तव व दो पुत्र ललित श्रीवास्तव व मोहित श्रीवास्तव हैं। श्री श्रीवास्तव का अंतिम संस्कार सोमवार को सुबह आठ बजे टूंडला में किया गया।

राजस्‍थान में खुलेगा पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय

 राजस्थान के मुख्यमंत्री और ‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’के मानद सदस्य अशोक गहलोत ने सोमवार को कहा है कि राजस्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय खोलने की संभावना तलाशी जाएगी.‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’की बीसवीं वर्षंगाठ पर आयोजित समारोह में गहलोत ने कहा कि देश में राजस्थान की पत्रकारिता की अलग पहचान है. आजादी के आन्दोलन में भी राजस्थान के पत्रकारों ने महती भूमिका निभाई उन्हें भूला नहीं जा सकता है.

उन्होंने कहा कि राजस्थान में पत्रकारिता को और मजबूती देने के लिए राजस्थान में पत्रकारिता विश्वविद्यालय खोले जाने की संभावना तलाशी जाएगी. विश्वविद्यालय स्थापित होने से पत्रकारिता क्षेत्र में जाने वाले युवाओं को अध्ययन की सुविधा मिल सकेगी. गहलोत ने पत्रकारों की समस्याओं को निस्तारण करने का आश्‍वासन देते हुए कहा कि सरकार अन्य राज्यों में पत्रकारों को मिल रहीं सुविधाओं का अध्ययन करके प्रदेश के पत्रकारों को नहीं मिलने वाली सुविधाएं उपलब्ध कराने पर विचार करेगी.

इस मौके पर गहलोत ने कालबेलिया नृत्यांगना गुलाबो को ‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’की मानद सदस्यता प्रदान की. उन्होंने इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण चंद छाबडा, मिलाप चंद डंडिया, याम आचार्य और फोटोग्राफर गोपाल संगर को लाइफ टाइम एचीवमेंट सम्मान से सम्मानित किया. गहलोत ने पत्रकारिता क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ रिपोर्ट, फोटो और इलेक्ट्रानिक कैमरामैन और पत्रकार को भी सम्मानित किया.

गहलोत ने ‘पिंक सिटी प्रेस क्लब’की ओर से भारत के तीरदांजी के प्रशिक्षक लिम्बा राम और शिक्षाविद्ध पी सी व्यास को प्रेस क्लब की मानद सदस्यता का परिचय पत्र उनकी अनुपस्थिति में उनके परिजन को भेंट किया. राजस्थान के सूचना एंव जनसम्पर्क राज्य मंत्री अशोक बैरवा और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाडी ने भी समारोह को सम्बोधित किया. साभार : समय लाइव

रहस्‍यमय आकृति से गोरखपुर के पुलिस लाइन में सनसनी

: राष्‍ट्रीय सहारा और अमर उजाला ने खबर छापकर दहशत और बढ़ाया : गोरखपुर के पुलिस लाइन में सनसनी फैली हुई है. एक युवक के मोबाइल में अनायास ही एक ऐसी तस्‍वीर खींच गई है, जिसे लोग प्रेत-भूत-आत्‍मा-चुड़ैल मानकर दहशत में हैं. अब हाल यह है कि शाम होते ही बच्‍चे घरों में कैद होने लगे हैं और महिलाओं ने रात में निकलना बंद कर दिया है. इस खबर को राष्‍ट्रीय सहारा और अमर उजाला ने प्रकाशित कर माहौल को और अधिक डरावना बना दिया है. इसके बाद से नई-नई बातें और चर्चाएं सामने आने लगी हैं और डर-भय का दायरा बढ़ने लगा है.

पुलिस लाइन में आटा चक्की के पास एन ब्लाक में तीन मंजिला भवन है. उसमें कुशीनगर जिले में तैनात रिजवान का परिवार रहता है. रिजवान के बेटे आमिर ने नया मोबाइल हैंडसेट खरीदा. करवाचौथ के दिन दोपहर करीब तीन बजे रेलिंग के पास खड़ा होकर सीढ़ी पर रखे साइकिल की वह फोटो खींचने लगा, तभी तस्वीर में उभरी एक आकृति देखकर वह चौंक गया. साइकिल के ऊपर सीढ़ी की जाली से सटी साड़ी पहने महिला की छाया फोटो में नजर आई. उसने अपने दोस्तों को भी फोटो दिखाई.

बिल्डिंग में रहने वाले अनिल के बेटे आदर्श, नंदराज के बेटे अविनाश इत्यादि ने बताया कि रात में कभी-कभी छत पर पायल की छन-छन और महिला के रोने की आवाज सुनाई पड़ती है. एन ब्‍लॉक के मकान के छत से दस साल के भीतर तीन लोग गिर चुके हैं पर उनको कोई नुकसान नहीं हुआ. अब इन घटनाओं को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा है. एसओजी प्रभारी राजकुमार शर्मा कहते हैं कि पुलिस लाइन में भूत-प्रेत का साया नहीं हो सकता है. मोबाइल में महिला की आकृति का बनना महज संयोग है. यह किसी बालक की शरारत भी हो सकती है. वह इंटरनेट और दूसरे तकनीकी माध्‍यमों से तैयार किया गया भी हो सकता है. बहरहाल, इस मामले पर अभी कुछ भी कहना संभव नहीं है. नीचे राष्‍ट्रीय सहारा में छपी खबर.

पुलिस लाइन में एक भूतनी सी.. दहशत

गोरखपुर (एसएनबी)। पुलिस लाइन के एन. ब्लाक में करवाचौथ के दिन ‘प्रेतात्मा’ दिखी ! यह किसी के आखों का भ्रम था, हकीकत था या किसी मकसद से कोई ‘साइबर खेल’ यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता लेकिन पुलिस लाइन में दहशत है यह स्पष्ट दिख रहा है। कथित प्रेतात्मा की फोटो कई ने अपने मोबाइलों में सेव कर रखा है। पिछले कई वर्षो से रात 12 बजे के बाद होने वाली पायल की झंकार व किसी महिला के रोने की आवाज से लोग सशंकित रहते हैं। रात के आठ बजते ही इस ब्लाक में रहने वाले वर्दीधारी व उनके परिजन खौफ के कारण अपना दरवाजा बंद कर लेते हैं। उधर नेट के जानकारों का कहना है कि तमाम वेबसाइटों पर इस तरह के चित्र उपलब्ध हैं जिसमें छेड़छाड़ कर ऐसी इमेज बनाई जा सकती है। कुछ दिमागी फितूर वाले लोग सनसनी फैलाने के लिए ऐसा कर सकते हैं। करवा चौथ के दिन इस ब्लाक में ऐसी घटना घटी जिसके बाद पुलिसकर्मी व उनके परिजन काफी भयभीत हैं। उस दिन दोपहर का वक्त था। समय यही कोई 2 बजकर 30 मिनट हो रहा था। इस ब्लाक में रहने वाले वर्दीधारी रिजवान का बेटा आमिर अपनी नई मोबाइल से ब्लाक के क्वार्टर संख्या चार व पांच के बीच बनी सीढ़ी के फर्स्‍ट फ्लोर पर जंगले के पास रखी साइकिल की फोटो खींच रहा था। फोटो का व्यू उसने मोबाइल में देखा तो उसके होश उड़ गये। साइकिल की फोटो के साथ ही हवा में खड़ी एक महिला की फोटो भी थी। महिला का साया सफेद वस्त्र में लिपटा था। मोबाइल में कैद तस्वीर में उभरी साफ साया उसने मौके पर मौजूद अपने अन्य मित्रों को दिखाया। सभी के अंदर डर समा गया। इस घटना के बाद से देर रात तक बाहर घूमने, टहलने व कालोनी में अपने दोस्तों के साथ खेलने वाले बच्चे, किशोर व युवा, महिलाएं अब रात के 8 बजते ही अपने को घरों में कैद कर ले रही हैं। जब तक विशेष आवश्यकता न हो लोग रात में दरवाजा खोलने से भी कतरा रहे हैं। एक पुलिसकर्मी ने कहा कि फोटो देखकर अब उसे भी रात में बाहर से आने पर भय लगता है। कक्षा 8 में पढ़ने वाले अविनाश पुत्र नंदराज व कक्षा 6 में पढ़ने वाले आदर्श पुत्र अनिल ने बताया कि रात में छत पर पायल की झंकार किसी महिला के रोने की आवाज उन्होंने सुनी है। महिलाओं ने भी इस बात की पुष्टि की। महिलाओं ने बताया कि पिछले पांच वर्षो में अचानक दो हादसे हुए। सिपाही उमेश की बेटी व एक फालोवर अचानक छत से नीचे गिर गये। तीन मंजिले से नीचे गिरने के बाद भी वे साफ-साफ बच गये। उन्हें मामूली चोट आयी। शाहपुर थाने पर किसी प्रेतात्मा के वास की कहानी शायद ही कोई पुलिसकर्मी हो जो अनभिज्ञ हो। हालात यह है कि शाहपुर थाने पर तैनाती से पुलिसकर्मी कतराते हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र .

सुब्रत रॉय की रहस्यमय दुनिया के इर्दगिर्द कसता जा रहा है फंदा

हाल ही में एक घोषणा की वजह से दुनिया चौंक उठी. सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन लि. (एसआइ-एफसीएल) के जारी किए एक अखबारी विज्ञापन में कहा गया था कि कंपनी के पास जून, 2011 तक 73,000 करोड़ रु. की जमा इकट्ठी हो चुकी थीं. किसी गैरबैंकिंग संस्थान के लिए यह असामान्य रूप से बड़ी रकम है, जिससे पता चलता है कि कैसे सहारा सुप्रीमो सुब्रत रॉय बड़े अधिग्रहणों में पैसा लगाते आए हैं.

इनमें हाल ही में विजय माल्या के नियंत्रण वाली फार्मूला वन टीम पर 500 करोड़ रु. मूल्य का 42.5 प्रतिशत दांव लगाना शामिल है. पिछले साल के अंत में रॉय ने 3,250 करोड़ रु. लगाकर लंदन का नामी होटल ग्रॉसवेनर हाउस खरीद लिया था. रॉय का कहना है, ''पैसा कोई समस्या नहीं है. वह तो मैं कल सुबह 10 बजे दे सकता हूं. सहारा परिवार अंदर से मजबूत है. वह अपने रास्ते की सभी बाधाओं को पार कर लेगा.''

फौरी तौर पर दो 'बाधाएं' हैं. सहारा समूह ने भारतीय रिजर्व बैंक की निर्धारित 30 जून, 2015 की समयसीमा से चार साल पहले यानी 31 दिसंबर, 2011 तक 11,500 करोड़ रु. की अपनी देनदारियां चुकाने का वादा किया है. दूसरी एक और 'बाधा' है. 10 अक्तूबर को प्रतिभूति अपीली पंचाट ने अपने एक कड़े आदेश में रॉय की दो कंपनियों सहारा कमॉडिटी सर्विसेज कॉर्पोरव्शन लि. (एससीएससीएल, जिसका नाम पहले सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरव्शन लि. होता था) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन (एसएचआइसीएल) से कहा है कि उन्हें अगले छह हफ्ते के भीतर वैकल्पिक रूप से पूरी तरह परिवर्तनीय डिबेंचरों (ओएफसीडी) के जरिए उगाहे गए 24,029 करोड़ रु. वापस करने होंगे.

इस तरह रॉय को 31 दिसंबर तक कुल 35,000 करोड़ रु. से ज्‍यादा की रकम वापस करनी होगी. लेकिन ऐसा तभी होगा, जब रॉय उक्त आदेश का पालन करेंगे. उन्होंने पंचाट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है, लेकिन रिजर्व बैंक के आदेश वाली रकम वापस करने के लिए वे वचनबद्ध हैं.

पंचाट का आदेश नवंबर, 2010 को वित्तीय बाजार की नियामक सेबी के फैसले के बाद आया, जिसने सहारा समूह की दो कंपनियों पर ओएफसीडीएस के जरिए लोगों से पैसा उगाहने का आरोप लगाया. उसमें कहा गया है कि पैसों यह उगाही निवेशकों की सुरक्षा के लिए बने नियमों का, जो इस तरह के सार्वजनिक मुद्दों को नियंत्रित करते हैं, खुलासा किए बिना की गई. रॉय इसके विरोध में कहते हैं, ''सहारा समूह के पास 30 जून, 2010 तक 1,09,224 करोड़ रु. की संपत्तियां थीं.

इनमें तरल निवेश, नगदी और बैंक में जमा राशि, सावधि जमा राशियां (19,456 करोड़ रु.); कर्जदार, कर्ज व अग्रिम राशि, आयकर रिफंड, अन्य मौजूदा पूंजी (7,629 करोड़ रु.), जमीन, निर्माण, चल रहा काम, खत्म हो चुका स्टॉक और सावधि पूंजी (82,139 करोड़ रु.) शामिल हैं. पैसा चुकाना कोई समस्या नहीं है. समस्या यह है कि दो भिन्न तत्वों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. पंचाट का कदम तर्कसंगत नहीं है.''

रॉय की रहस्यमय दुनिया के इर्दगिर्द फंदा कसता जा रहा है. रिजर्व बैंक, सेबी, प्रवर्तन निदेशालय से लेकर कंपनी मामलों का मंत्रालय सरीखे कई नियामकों के बीच फंसकर वे सभी पर निशाना साध रहे हैं और भविष्य की योजना बनाते हुए उनसे लोहा ले रहे हैं. मुंबई में 2002 में 115 करोड़ रु. से खरीदे गए 223 कमरों वाले उनके होटल सहारा स्टार की निजी लिफ्ट के बाहर एक वर्दीधारी रसोइया उनका इंतजार कर रहा है. कूटभाषा वाला कार्ड स्पर्श कराकर आप उनके सफव्द रंग से रंगे विशेष कक्ष में पहुंचते हैं, जहां से एयरपोर्ट का ज्‍यादातर हिस्सा नजर आता है.

स्थिति माकूल है लेकिन रॉय की परेशानियां बरकरार हैं. जून, 2008 में रिजर्व बैंक ने एसआइएफसीएल से कहा कि वह नई जमा राशियां स्वीकार न करे और सात वर्षों में जनता की 20,000 करोड़ रु. की जमा रकम को चुकाए. पूरी तरह लगाए गए प्रतिबंध में रिजर्व बैंक ने 2011 के बाद परिपक्व होने वाली नई जमा राशियां स्वीकार करने पर रोक लगा दी. आदेश के मुताबिक 30 जून, 2011 तक कंपनी पर 9,000 करोड़ रु. से ज्‍यादा की देनदारी नहीं होनी चाहिए.

11 जुलाई, 2008 को सहारा इंडिया की ओर से प्रकाशित विवरण पत्र में दिखाया गया था कि एसआइएफसीएल ने 1987 में अपनी शुरुआत के बाद से जमा राशियों के रूप में 59,076.26 करोड़ रु.(ब्याज समेत) जुटाए और जमाकर्ताओं को 30 जून, 2008 तक 41,563.06 करोड़ रु. (ब्याज समेत) वापस किए. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की ओर से संकलित आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2009 तक जमाकर्ताओं के प्रति देनदारी (जिसमें ब्याज भी शामिल था) 17,640 करोड़ रु. थी. मार्च, 2010 के अंत तक इसकी कुल देनदारी 13,235 करोड़ रु. थी. मार्च, 2010 के बाद का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन रिजर्व बैंक के करीबी सूत्रों का कहना है कि देनदारी घटकर 9,000 करोड़ रु. से 11,500 करोड़ रु. के बीच रह गई है.

रॉय कहते हैं, भुगतान व्यवस्थित तरीके से करना होती है. ''इसलिए हम तय कार्यक्रम के मुताबिक भुगतान करेंगे, जिसके बारे में जानकारी लखनऊ में सहारा के मुख्यालय को भेज दी गई है. हम बहुत सुगठित तरीके से काम करते हैं. मुख्यालय को अपनी 3,800 शाखाओं को सलाह देनी होती है और इस तरह से भुगतान किए जाते हैं (देखें बातचीत).'' नगदी भले ही उनके लिए बड़ी चिंता न हो, लेकिन नवंबर, 2010 में सेबी के अंतरिम आदेश के तहत पूंजी जुटाने की उनकी योजनाओं का गला घोंटने का सरकार की कोशिश जरूर चिंता का विषय है.

इस आदेश से प्रभावित होने वाली उनकी दो कंपनियों में से एक, एसएचआइसीएल में उनकी मौजूदा पूंजी, नगदी और बैंक में जमा राशि करीब 725 करोड़ रु. है, जबकि एससीएससीएल में उनकी पूंजी, नगदी और बैंक में जमा राशि 4,266 करोड़ रु. है. सहारा समूह ने पिछले 10 वर्षों में आयकर और सेवा कर के रूप में कु ल 2,757 करोड़ रु. चुकाए हैं, इस तरह यह टैक्स चुकाने के हिसाब से एक समर्पित समूह बन गया है.

फिर रिजर्व बैंक ने किस वजह से इसे निशाना बनाया. इसके तार बहुत उलझे हैं. आरएनबीसी के तौर पर एसआइएफसीएल ने दैनिक जमा, आवर्ती जमा और सावधि जमा के रूप में आम लोगों का पैसा स्वीकार किया. रिजर्व बैंक और सेबी ने एसआइएफसीएल पर निशाना साधा (देखें बाक्स), क्योंकि उन्हें लगा कि वह कथित तौर पर काले धन को सफेद बनाने का काम कर रही है. अपना नाम गुप्त रखना चाह रहे एक बड़े बैंकर का कहना है, ''यह कैसे हो सकता है कि सुब्रत रॉय आपकी रजामंदी के बिना इतने वर्षों तक एक समांतर पैराबैंकिंग कंपनी चलाते रहे और अचानक सब कु छ बदल गया. यहां एक तरह से किसी को निशाना बनाए जाने की बात है, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई के बारे में कोई अटकल लगाने के लिए मैं तैयार नहीं हूं.''

मई, 2004 के चुनावों के बाद जब यूपीए सत्ता में आया तो एक बड़े सरकारी पदाधिकारी और अब एक महत्वपूर्ण प्रदेश के राज्‍यपाल से कहा गया कि वे रॉय और सहारा परिवार की गतिविधियों की फाइल तैयार करें. यह फाइल बहुत गहन थी और उसने रॉय के साम्राज्‍य यानी उनके विशाल पैराबैंकिंग धंधे पर, जो उनके अपार खजाने का स्त्रोत था, करारी चोट की. अपने नोट में रिजर्व बैंक ने निर्देश दिया कि सहारा कव्वल सरकारी प्रतिभूतियों और पूरी तरह से सुरक्षित पीएसयू बैंक जमा योजनाओं में ही निवेश कर सकता है.

इसके पीछे उद्देश्य सहारा के कारोबार को ठप करना था. सरकार को इस तरह का कदम क्यों उठाना पड़ा? इंडिया टुडे ने जब इस बारे में सवाल किया, तो रिजर्व बैंक ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन यह जरूर कहा कि वह एसआइएफसीएल के विज्ञापन की जांच कर रहा है.

अगर रिजर्व बैंक की ओर से सहारा को निशाना बनाया जाना पहली चोट थी तो रॉय के खिलाफ सेबी की दंडात्मक कार्रवाई दूसरी चोट है (देखें बॉक्स). आइपीओ जारी करने का मन बना रही सहारा समूह की कंपनी सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड ने 30 सितंबर, 2009 को सेबी को दी अपनी प्रस्तावना में अपने समूह के बारे में सूचना दी थी. सेबी ने घोषणाओं को नाकाफी मानते हुए नियमों के मुताबिक सहारा की कुछ कंपनियों के बारे में सूचना मांगी. इसके बाद शब्दों की जंग में अतिरिक्त सॉलीसिटर-जनरल मोहन पारासरन ने इस मामले पर अपनी राय में कहा, ''मेरी समझ में सहारा समूह जैसी गैर-सूचीबद्ध कंपनियां, जो स्वयं को सूचीबद्ध कराना नहीं चाहती हैं, सेबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती हैं.'' सहारा ने पारासरन की राय को आधार बनाते हुए कहा कि यह मामला सेबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है क्योंकि कंपनी कंपनी मामलों के मंत्रालय और कंपनी रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र में आती है.

जब सेबी ने अपने आदेश का तुरंत पालन करने के लिए कहा तो सहारा ने 31 मई, 2010 के दिनांक वाले पत्र के जरिए कंपनी मामलों के मंत्रालय को एक प्रतिवेदन भेजा, जिसमें उससे स्पष्ट करने को कहा गया कि उनकी कंपनी कंपनी मामलों के मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आती है या सेबी के. 17 जून, 2010 को मंत्रालय ने सहारा को जानकारी दी कि मामले की जांच की जा रही है.

फिर उसने मामले को कानून एवं न्याय मंत्रालय के पास भेज दिया, जहां पारासरन ने सरकार के कानून अधिकारी के तौर पर पाया कि गैर-सूचीबद्ध कंपनियां सेबी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती हैं. कानून मंत्रालय ने भी इसी नजरिए के पक्ष में अपनी राय दी, जिसे 8 फरवरी, 2011 को तत्कालीन कानून सचिव के अलावा तत्कालीन कानून मंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने भी मंजूरी दे दी.

इसके बावजूद सेबी को कोई फर्क नहीं पड़ा. नवंबर, 2010 में उसने एक अंतरिम आदेश में सहारा समूह की कंपनियों एससीएससीएल और एसएचआइसीएल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए, जिसके जरिए उन्हें कंपनी रजिस्ट्रार को दाखिल किए गए क्रमशः 12 मार्च, 2008 और 6 अक्तूबर, 2009 के दिनांक वाले रेड हेरिंग प्रास्पेक्टस के तहत जनता से पैसा उगाहने से रोक दिया गया. ऐसा उन्होंने 1956 के कंपनी कानून की धारा 60बी के तहत किया.

उन कंपनियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे जनता को अपने इक्विटी शेयर/ओएफसीडीएस या किसी अन्य प्रतिभूति की भी पेशकश न करें. और फिर, सेबी ने निर्देश दिया कि रॉय, वंदना भार्गव, रवि शंकर दुबे और अशोक रॉय चौधरी सरीखे जिन लोगों का नाम प्रमोटर के तौर पर दिया गया है, उन्हें प्रास्पेक्टस या कोई अन्य दस्तावेज लाने या जनता से पैसा उगाहने वाला कोई भी विज्ञापन जारी करने से रोका जाए.

15 जुलाई, 2011 को पंचाट को फैसले के लिए मामला भेजते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि कंपनी मामलों के मंत्रालय को इस मामले में एक पक्ष बनाया जाए. मंत्रालय ने प्रतिवेदकों को अपना जवाबी शपथ-पत्र दाखिल करने को कहा. इसका पालन करते हुए मंत्रालय ने 26 अगस्त, 2011 और सहारा ने 30 अगस्त, 2011 को मेमो ऑफ अपील के प्रति अपना जवाबी शपथ-पत्र दाखिल किया. लेकिन अपने जवाबी शपथ पत्र में मंत्रालय ने एकदम उलटा रुख अपनाते हुए कहा कि इस मामले में सेबी को फैसला लेने का अधिकार है.

उसने कानून मंत्रालय की राय की भी अनदेखी कर दी. उसने लखनऊ हाइकोर्ट में अपने पहले के रुख से भी अलग रुख ले लिया. तब सहारा ने 30 अगस्त, 2011 को मंत्रालय को नया प्रतिवेदन भेजा. अब कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री मोइली ने 2 सितंबर, 2011 के अपने नोट में कहा है, ''इस चरण में कंपनी मामलों के सचिव को यह विचार करना है कि यह मामला क्या दोबारा कानून मंत्रालय को भेजा जा सकता है.''

सबसे तगड़ा झ्टका सुप्रीम कोर्ट की ओर से आया, जिसने फैसला सुनाया, ''हमारा यह मत है कि ओएफसीडी के सवाल पर सेबी के फैसले की जरूरत है. सेबी को ही सुनवाई करने दी जाए और आदेश पारित करने दिया जाए.'' सहारा को लखनऊ हाइकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करनी पड़ी, क्योंकि सेबी को सहारा समूह की ओर से पूरी जानकारी मुहैया कराने के बावजूद स्थगन के अंतरिम आदेश को मानने से इनकार कर दिया गया था. चीफ जस्टिस एस.एच. कापडिया की अगुआई वाली पीठ ने सहारा समूह को सेबी के खिलाफ पंचाट में जाने को कहा.

चूंकि पंचाट ने इस मामले में अपनी राय दे दी थी, इसलिए सहारा को फिर सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी. इससे पहले 26 अगस्त, 2011 को पंचाट ने एसआइएचसीएल बनाम सेबी के मामले में अपने आदेश में कहा था, ''सहारा की ओर से जारी ओएफसीडी की पेशकश जनता को की गई थी…और इसलिए यह सेबी के अधिकार क्षेत्र में है. 50 से भी कम व्यक्तियों को की गई पेशकश दरअसल निजी प्लेसमेंट है.''

दिलचस्प बात यह है कि 28 अप्रैल, 2010 को संसद में अपने एक जवाब में सरकार ने कहा था, ''निजी तौर पर दिए गए डिबेंचर 1956 के कंपनी कानून के तहत जारी किए जाते हैं, जो कंपनी मामलों के मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.'' साफ जाहिर है कि दो अलग-अलग कंपनियों के लिए दो अलग-अलग नियम हैं.

इंडिया टुडे ने जब सेबी से संपर्क किया तो उधर से कोई जवाब नहीं मिला. वह सिर्फ सहारा के खिलाफ अपने आदेश की प्रति देने के लिए ही राजी थी. बाजार से जुड़े एक व्यक्ति का कहना था, ''सुब्रत रॉय अपने दिखावे और दोस्तियों की कीमत चुका रहे हैं, लेकिन इसके पीछे भी शायद कोई न कोई कारण ही होगा, क्योंकि केंद्र सरकार की एजेंसियां पैसा उगाहने की रॉय की क्षमता के पीछे पड़ गई हैं.''

इस साल मार्च में ही रॉय ने हार्वर्ड में स्वप्रेरणा को लेकर एक भाषण दिया था. और इसी स्वप्रेरणा के चलते ही वे अपनी जिंदगी की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रहे हैं. साभार : इंडिया टुडे