अरे! ये आपदा पीडि़त या भिखारी नहीं, पत्रकार हैं भाई

लखनऊ। अगर आपको लग रहा है कि नीचे के फोटो में सामान के लिए मारामारी करती भीड़ उत्‍तराखंड आपदा की है, या फिर ये लोग बाढ़ पीडि़त हैं या गरीब और भिखारी तबके के लोग हैं, तो आप बिल्‍कुल गलत सोच रहे हैं. ये ना तो भिखारी हैं और ना ही आपदाग्रस्‍त इलाकों के लोग. ये लोग देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी की राजधानी लखनऊ के बड़े बड़े पत्रकार हैं. जी हां, पत्रकार. चौंकिए नहीं, ऐसे दृश्‍य आए दिन लखनऊ की सरजमीं पर नुमाया होते रहते हैं.

खैर, हम आपको बताते हैं पत्रकारों की इस जुझारू दृश्‍य की असली कहानी. लखनऊ में शनिवार को योग गुरु बाबा रामदेव की प्रेस कांफ्रेंस थी. कई पत्रकार पहुंचे थे. कुछ बुलाए, कुछ बिन बुलाए. कुछ जमीन पर लिखने वाले, कुछ हवा में लिखने वाले. बाबा की पीसी खत्‍म होने के बाद पत्रकारों को उनकी तरफ से एक झोले में कुछ गिफ्ट दिया जाने लगा, जिसे पत्रकारों की भाषा में डग्‍गा कहा जाता है. बस फिर क्‍या था, पहले आप-पहले आप वाले लखनऊ की सरजमीं पर पहले मैं-पहले मैं शुरू हो गया. मीडियाकर्मी डग्गा पाने के लिए एक दूसरे पर टूट पड़े.

डग्गे के लिए एक दूसरे से छीना-झपटी होने लगी. धक्‍का-मुक्‍की होने लगी. अबे तेरी-तबे तेरी होने लगी. आयोजक पत्रकारों का यह रूप से देखकर हंसने लगे. बांटने वाले परेशान हो गए. कुछ पत्रकार दो-दो तीन-तीन बार डग्गा पाने के लिए संघर्ष करते नजर आए. क्‍या सीनियर क्‍या जूनियर. डग्गे के लिए सारी सीमाएं टूट गईं. सारे दीवार ढहा दिए गए. बाढ़ पीडितों, आपदा पीडितों की तरह लूट मच गई. कहीं भी नहीं दिखा कि ये समाज के पढ़े लिखे तबके के लोग हैं. डग्गे के चक्‍कर में अंधे बन गए.

हालांकि कुछ पत्रकार बंधु शर्म की दीवारों के पीछे रह गए और डग्गा पाने से चूक गए. हालांकि मन उनका भी मसोस कर रह गया, लेकिन करें तो क्‍या करें. पत्रकारों ने इस तरह की हरकत पहली बार नहीं की है. ऐसी हरकत अभी कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के एक कार्यक्रम में भी हो चुका है. मोबाइल और कुछ कैश पाने के लिए पत्रकार सारी सीमाओं को तोड़ते नजर आए. क्‍यां पुराने पत्रकार क्‍या नए पत्रकार, सबके सब बस डग्‍गा पाने का प्रयास करते दिखे. वैसे लखनऊ में आजकल पत्रकारों की भीड़ भी बढ़ गई है.

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