आईपीसी और सीआरपीसी को लेकर दैनिक जागरण, बनारस में बवाल

दैनिक जागरण, वाराणसी में एक खबर को लेकर बवाल मचा हुआ है. बकायदे संपादकीय प्रभारी और खबर लिखने वाले रिपोर्टर के बीच एसएमएस युद्ध छिड़ा हुआ है. जो खबर लिखी गई है उसमें सीआरपीसी और आईपीसी के बीच अंतर रिपोर्टर को न समझ में आने के चलते अर्थ का अनर्थ हो गया है. सीआरपीसी यानी अपराध प्रक्रिया संहिता संशोधन विधेयक 2010 को 23 दिसम्‍बर 2010 को लोकसभा में पारित किया गया था. हालांकि इस धारा में संशोधन करने की बात 2006 से ही चल रही थी. 

1973 में बने सीआरपीसी में यह दसवां संशोधन था. इस संशोधन में गवाहों का मुकर जाना, महिलाओं को अधिक संरक्षण समेत कई मुद्दे शामिल थे. पर इसमें सबसे अहम मुद्दा था सीआरपीसी की धारा 41 में संशोधन. सीआरपीसी की धारा 41 के अंतर्गत पुलिस को गिरफ्तारी के अधिकार दिए गए हैं. जिसमें 41 (1) में (ए) से लेकर (आई) तथा (2) यानी दस स्थितियों में पुलिस किसी को भी बिना मजिस्‍ट्रेट के आदेश के गिरफ्तार कर सकती थी. इस धारा का काफी दुरुपयोग होने की भी शिकायतें थी. इसी आधार पर संसद ने लगभग साल भर पहले सीआरपीसी की धारा 41 (1)(b) में परिवर्तन क‍र सात साल से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी.

इसी संशोधन को आधार बनाकर एलएन त्रिपाठी ने एक खबर 'कुछ शब्‍दों के हेरफेर से खाली हो गए हवालात' लिखी, यह खबर बाइलाइन लगी. पर एलएन सीआरपीसी की जगह आईपीसी लिख दिया. हालांकि यह खबर लिखे जाने के बाद कई जगह जांच भी हुई होगी, पर जागरण के तथाकथित विद्वानों को यह अंतर समझ नहीं आया. सुबह भी खबर को लेकर कोई दिक्‍कत नहीं थी, पर मामला तब बिगड़ा जब किसी वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता ने जागरण के संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा को इसकी जानकारी दी. इसके बाद संपादकीय प्रभारी ने ग्रुप एसएमएस कर सभी लोगों को बताया कि यह खबर गलत है तथा सीआरपीसी की जगह आईपीसी हो गया है (हालांकि भड़ास के पास जो एसएमएस मौजूद है उसमें संपादकीय प्रभारी ने खुद प्रोसिजर की अंग्रेजी गलत लिखी हुई है), इसलिए इस खबर अनर्थ हो गया है.

इसके बाद एलएन ने भी गुडमार्निंग करते हुए संपादकीय प्रभारी को मैसेज भेजा और लिखा कि आपसे इस तरह एकतरफा प्रतिक्रिया की उम्‍मीद मुझ जैसे रिपोर्टर को नहीं होती. इसके बाद भी कुछ एसएसएम युद्ध हुआ. अब खबर है कि अखबार में मामला पूरा गरम है. अखबार की तो छीछालेदर हुई ही कार्यालय के अंदर भी माहौल गरम है. ये वही एलएन त्रिपाठी हैं, जिन्‍होंने जागरण की आंतरिक परीक्षा में टॉप किया था. इस संदर्भ में जब सिटी प्रभारी जय प्रकाश पांडेय से जानने की कोशिश की गई तो उन्‍होंने अपने परिवार के साथ होने की बात कहकर आईपीसी या सीआरपीसी से संबंधित किसी खबर की जानकारी से इनकार कर दिया.

नीचे पूरी खबर पढि़ए –

कुछ शब्दों के हेरफेर से खाली हो गये हवालात

एल. एन. त्रिपाठी, वाराणसी :  कभी शिकायत के बिना ही हवालात की सैर करा दी जाती थी। किस जुर्म में पकड़ा गया है, कई-कई दिन तक यही पता नहीं चलता था। अब तो एफआईआर और बार बार की गुहार के बाद भी धरपकड़ नहीं हो रही। आईपीसी की एक धारा की शब्दावली में जरा से परिवर्तन ने गजब का असर दिखाया है। इसमें पुलिस से गिरफ्तार करने या न करने की वजह भर पूछी गई है। छोटे से सवाल ने अधिकांश थानों के हवालात खाली करा दिए हैं। करीब एक माह से यही हालात हैं। गिरफ्तारी के आंकड़े दस प्रतिशत से भी कम हो गए हैं। जनता हैरान है तो बात बात पर हवालात की सैर कराने वाली पुलिस खुद भी खासी परेशान है। आईपीसी की धारा-41 पुलिस को बिना वारंट किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार देती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों पुलिस के इस अधिकार में आंशिक परिवर्तन के निर्देश दिए। इस निर्देश के क्रम में डीजीपी बृजलाल ने एक नवंबर 2011 को आदेश जारी कर सात वर्ष या सात वर्ष से कम की सजा वाले अपराधों के मामले में किसी व्यक्ति को क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है, इसका कारण बताने को कहा। इसमें अगर गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है तो उसका भी स्पष्ट कारण बताने को कहा गया है। साथ ही गिरफ्तार करने की एक प्रक्रिया निर्धारित कर दी है। इस परिवर्तन ने पुलिस की व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया है। पुलिस अब गिरफ्तार करने से बच रही है। खास कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के उल्लंघन के मामले में डीजीपी को तलब करने व दरोगा को दंड देने के बाद तो पुलिस ने गिरफ्तारी लगभग बंद ही कर दी है। अब तो जरूरी मामलों में भी गिरफ्तारी नहीं की जा रही। एक माह में गिरफ्तारी का आंकड़ा पूर्व के मुकाबले दस प्रतिशत तक सिमट गया है।

पुलिस के अधिकार में कोई कटौती नहीं :

हालांकि डीआईजी रामकुमार का कहना है कि अपराध नियंत्रण के मामले में पुलिस के अधिकार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। पुलिस को ज्यादा उत्तरदायी बनाया गया है। आरोपी द्वारा कोई अन्य अपराध करने की संभावना होने, विवेचना के लिए जरूरी होने, साक्ष्य नष्ट करने की संभावना होने, गवाहों को धमकाने या प्रलोभन देने की संभावना होने, न्यायालय में उपस्थित न होने या फरार होने आदि का कारण होने पर पुलिस किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है। पुलिस इस परिवर्तन के सहारे किसी पेशेवर अपराधी को यूं ही छोड़ नहीं सकती। विवेचक अगर किसी को गिरफ्तार नहीं करता तो उसे इसका भी कारण बताना पड़ेगा। इस परिवर्तन से पुलिस के कामकाज में सुधार होगा। आमतौर पर ऐसे मामलों में आरोपी को नोटिस देने का प्रावधान किया गया है।

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