आज के फिल्मवाले ‘सूफी’ का मतलब भी समझते हैं क्या..? (इंटरव्‍यू)

: जाने-माने कव्वाल वारसी भाइयों से खास मुलाकात : कव्वाली की 850 साल की विरासत को सहेजने वाले हैदराबाद के वारसी घराने के प्रतिनिधि नजीर अहमद खान वारसी और नसीर अहमद खान वारसी को हिंदी फिल्मों में कव्वाली पेश करने के अंदाज पर एतराज है। 2010 में उपराष्ट्रपति मुहम्मद हामिद अंसारी के हाथों संगीत नाटक अकादमी अवार्ड पा चुके और देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी कव्वाली पेश करने वाले दोनो भाई फिल्मों में सिर्फ वहीं कलाम गाना चाहते हैं जहां पेश करने का अंदाज भी सलीके का हो। स्पिक मैके के कार्यक्रम में 5 नवंबर 2012 को भिलाई आए वारसी भाइयों ने स्टील क्लब में अपने प्रोग्राम से ठीक पहले मोहम्‍मद जाकिर हुसैन से की दिल की बातें।  

 
– आपके खानदान में कव्वाली का साथ कब से है? 
 
हमारे खानदान में कव्वाली का चलन ख्वाजा गरीब नवाज अजमेरी के दौर यानि करीब 850 साल से चल रहा है। हजरत अमीर खुसरो ने जो अपने शागिर्दों को सिखाया, हमारा घराना उन्हीं शागिर्दों की पीढ़ी से ताल्लुक रखता है। उन्ही के शिष्यों की औलादों में हम लोग हैं। हमारे बड़े बुजुर्ग दरगाहों-खानकाहों में भी गाते थे और बादशाहों के पास भी रूहानियत की महफिल सजाते थे। हमारे पूर्वजों मे बड़े दादा मियां एतमाद-उल-मुल्क तानरस खां साहब हुए हैं। उन्हें तानरस का खिताब मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़ऱ ने दिया था। वो हजरत निजामुद्दीन औलिया में गाते भी थे। हमारे ही खानदान के अल्लामा-ए-मौसिक़ी मुहम्मद सिद्दीक खान साहब हैदराबाद के निजाम के शाही गायक थे। हमारे खानदान में सूफी और क्लासिकल दोनों की रिवायत है। हमारे दादा पद्मश्री अजीज अहमद खां वारसी अपने दौर के बड़े सूफी कव्वाल हुए हैं। वहीं हमारे वालिद उस्ताद जहीर अहमद खां वारसी ने भी कव्वाली को नई ऊंचाइयां बख्शी। आज हम दोनों भाई इस दौर की नुमाइंदगी कर रहे हैं। हम अपने तौर पर और स्पिक मैके की ओर से नई जनरेशन को पूरे हिंदुस्तान में घूम-घूम कर अपनी मिट्टी की तहजीब से रूबरू करा रहे हैं। 
 
– आप कव्वाली की जिस 850 साल की रिवायत की बात कर रहे हैं, उसमें आज कितना बदलाव देखते हैं? 
 
देखिए आज जिसे हम कव्वाली कहते हैं, वो हिंदुस्तान में ही जन्मी है। इसकी शुरूआत 850 साल पहले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैहि ने की थी। कव्वाली शब्द बना है कौल से, जिसके मायने है दोहराना। जो अल्लाह ने और सरकारे दो आलम मोहम्मद मुस्तफा ने कहा उसको दोहराने का नाम ही है कव्वाली। लेकिन शुरूआती दौर में कव्वाली को महफिले समा और गाने वाले को मुतरिब कहते थे। तब यह खानकाहों  (आश्रम) और दरगाहों तक ही महदूद (सीमित) थी।  बाद में हजरत निजामुद्दीन औलिया ने इसे कव्वाली का नाम दिया। उन्होंने और उनके शागिर्द हजरत अमीर खुसरो ने कव्वाली को खानकाहों-दरगाहों से निकाल कर इसे आम लोगों तक पहुंचाया। उस जमाने के सूफी शायरों ने अपने कलाम फारसी में लिखे थे। तब और आज में बदलाव बहुत सा आया है। तब ताली, ढोलक,तबला और नौबत(डफ) का इस्तेमाल होता था। आज हमनें इसमें सिर्फ हारमोनियम को जोड़ा है। जहां तक फारसी के कलाम की बात है तो आज के दौर के शायरों ने उसे आसान करते हुए उर्दू में लिखा है। वैसे जो बुजुर्गों सूफियों के कलाम है, उनका अपना एक अलग इफेक्ट तो रहता ही है। इस दौर में लोगों ने कुछ और बदलाव भी किए हैं। इसका नाम कव्वाली  ही रखा है लेकिन हम्द (अल्लाह की शान में), नात (नबी की शान में), मनकबत (वलियों की शान में) और  गजल भी इसमें अलग-अलग ढंग से पेश की जाती है। 
 
 
– कव्वाली पेश करने और सुनने का जो लुत्फ है, उसे आप कैसे बयां करेंगे? 
 
देखिए, कव्वाली तो सीधे रूहानियत से जुड़ी हुई है। सही जो कव्वाली होती है वो सीधे अल्लाह से मिलाती है। इसलिए हमें हुक्म दिया जाता है कि जब तुम समा (कव्वाली) गाने बैठो तो वजू करके  पाक साफ होकर बैठो। यह सच है कि जब सही कव्वाली गाई जाती है और किसी को वज्द (हाल) आ जाता है तो उसकी रूह सीधे आलमे बरज$ख (ईह लोक) में चली जाती है। अक्सर ऐसा होता है  जब हम देखते हैं कि अल्लाह का कलाम सुन कर किसी को हाल आ रहा है, तो इस हालत में बेखुदी में वो नहीं झूमता बल्कि उसकी रूह झूमती है। हमनें भी बुजुर्गों से सुना है कि अल्लाह ने मिट्टी का पुतला (इंसान) बनाया और रूह को हुक्म दिया कि जा अंदर दाखिल हो जा, तो रूह अंदर जा रही थी और परेशान हो कर बार-बार बाहर आ रही थी। रूह का कहना था कि मेरे मालिक मैं अंदर जा रही हूं तो सब अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और मेरा दम घुट रहा है। मैं क्या करूं,समझ में नहीं आ रहा है। अंदर समाया नहीं जा रहा है। ऐसे में फिर अल्लाह पाक ने अपने फरिश्तों को हुक्म दिया कि एक लहन (सुर) छेड़ो। जब फरिश्तों ने लहन छेड़ा तो रूह एक दम से मस्ती में आ गई और इंसान के जिस्म में चली गई। तो आज जब अच्छा संगीत या सुर सुनकर जब हममें से किसी को भी एक नशा सा तारी होता है तो वो हममें नहीं बल्कि हमारी रूह में होता है। लोग सुन कर वाह-वाह कहते हैं तो ये हम नहीं करते हमारी रूह करती है। हमारा चाहे सूफी संगीत हो या हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, इसमें दिल और दिमाग दोनों झूमता है। यही हमारी संगीत की परंपरा है। 
 
– आपका ऐसा अपना कोई रूहानी तजुर्बा? 
 
ये तो उस मालिक का करम है। हम तो यही मानते हैं कि हम कलाम पेश कर रहे हैं तो इबादत कर रहे हैं। ऐसा कई बार होता है कि जब हम ख्वाजा गरीब नवाज अजमेरी के दरबार में कव्वाली पेश कर रहे होते हैं तो ज़ार-ज़ार आंसू बहते रहते हैं। वहां कव्वाली पेश करने के दौरान फिर हमको अपनी भी सुध नहीं रहती। एक अलग किस्म का नशा हम पर तारी हो जाता है। चूंकि ख्वाजा साहब ने ही कव्वाली की शुरूआत की थी, इसलिए उनके दरबार में कव्वाली पेश करना हमेशा एक अलग तरह का रूहानी तजुर्बा रहता है।
 
– ..तो क्या ये रूहानी जज्बा आपको सिर्फ कव्वाली से ही हासिल होता है? 
 
देखिए उसको पुकारना है तो कोई भी जबान में पुकार सकते हैं। हमनें श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ में कबीर दास जी का भजन ‘हर में हर को देखा’ गाया था। इसमें देखिए कितनी गहराई है। ‘हर में हर को देखा’ देखा यानि हम सब में वही मौजूद है। अल्लाह ने भी फरमाया है कि ‘मैं तेरी शहरग़ (गले के पास की एक खास नस) के करीब हूं तू मुझे पहचान’। इसलिए अल्लाह-परमेश्वर तो हम सबके बेहद करीब है। हम सब में वही है और उसने किसी में भेदभाव नहीं किया। इसलिए उसे चाहे कव्वाली से पुकारो या भजन से। पुकार सच्ची होनी चाहिए तो रूहानियत का जज्बा अपने आप उभर आता है।  
 
– हिंदुस्तानी फिल्मों की वजह से कव्वाली की भी दो धाराएं हो गईं हैं…क्या आप ऐसा मानते हैं? 
 
जी, हां बिल्कुल। एक तो मंच की कव्वाली है और दूसरी फिल्मों की। फिल्म इंडस्ट्री तो कव्वाली से हमेशा मुतअस्सिर (प्रभावित) रही है। कई बड़े नाम है जिन्होंने फिल्मों के लिए कव्वाली गाई है। ज्यादातर मामले में तो हम मानते हैं कि फिल्मों ने कव्वाली का बेड़ा गर्क ही किया है। जहां तक दूसरी धारा की बात है तो कव्वाली आज भी मकबूल है। इसका क्रेडिट उन कव्वालों को जाता है, जिन्होंने इसकी पाकीजगी को कायम रखा। जैसे कि हमारे दादा पद्मश्री अजीज अहमद खां वारसी , हाजी गुलाम फरीद साबरी और उस्ताद नुसरत फतेह अली खान सहित और भी दूसरे नाम। जिन्होंने दुबारा से इसे उपर लाया और इसे मकबूलियत दी। आज कव्वाली हिंदुस्तान-पाकिस्तान में तो है ही यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में कव्वाली खूब सुनी जाती है।  
 
– आप को ऐसा क्यों लगता है कि फिल्मों ने कव्वाली का बेड़ा गर्क किया है? 
 
देखिए ‘परदा है परदा’ को आप क्या कव्वाली कहेंगे..? हमारी नजर में वो सिर्फ एक एंटरटेनमेंट या आज की जबान में आइटम सांग है। हजरत अमीर खुसरो अपने पीर हजरत निजामुद्दीन औलिया के दीदार के बाद कहते हैं कि छाप तिलक सब छीन ली। ये रुहानियत में डूबा हुआ कलाम है। वो कहते हैं कि आपने मुझे देखा तो मेरी जितनी भी पहचान और जो छाप थी वो सब छीन ली। वो ‘अपनी सी रंग दीनी’ कहते हैं यानि दुनिया से बेनियाज कर मुझे अल्लाह से मिलवा दिया। लेकिन फिल्म वालों ने क्या किया? ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ फिल्म मे लडक़ी भांग के नशे में झूम रही है और खेत में गा रही है ‘छाप तिलक सब छीन ली’। 
 
– ये बीते दौर की बात हो गई लेकिन आज तो फिल्मों में सूफी खूब चल रहा है..? 
 
हम पूछना चाहते हैं, आज के ये फिल्म वाले सूफी का मतलब, उसकी अहमियत भी समझते हैं..? सूफी यानि हर चीज से पाक साफ। अब आज की फिल्मों को देखिए सूफी के नाम पर गीत रचा गया ‘इश्क सूफियाना’। ये फिल्म वाले जानते हैं इन पाक लफ्जों की अहमियत..? अभी शाहरूख खान की एक फिल्म में सूफी के नाम पर गीत रचा गया ‘तेरा सजदा’। इसमें वो औरत को सजदा करवा रहे हैं। ये क्या हो रहा है..? 
 
– लेकिन आप (कव्वाल) लोगों की तरफ से कभी कोई एतराज भी तो सामने नहीं आता है? 
 
आपका ऐसा कहना गलत है। हमारे हैदराबाद के नागेश कुकनूर ने 2-3 साल पहले ‘इकबाल’ फिल्म बनाई थी। जिसमें सीन रखा कि लोग शराब पी कर बोतल के साथ नाचते हुए ‘आज रंग है हे मां रंग है री’गा रहे हैं। हमने नागेश को बुला कर तुरंत एतराज जताया और उनसे पूछा कि क्या आपको ‘रंग’ का मरतबा या उसके मायने मालूम है..? ये बुजुर्ग सूफी शायर हजरत अमीर खुसरो ने किसलिए लिखा है और इसे क्यों गाया जाता है..? हमनें उनसे कहा कि आइंदा से किसी अच्छे जानकार से मश्विरा लेना फिर कोई सूफी कलाम को रखना। वरना तुम पर ऐसी फिटकार पड़ेगी कि कहीं के भी नहीं रहोगे और ये जितना सब नाम-वाम है,ये सब चले जाएगा। नागेश हमारी बात समझ गए और तुरंत माफी मांगने लगे कि नहीं वारसी साहब हमसे गलती हो गई। 
 
– लेकिन ऐसे माहौल में आपको फिल्मों के ऑफर तो आते होंगे? 
 
बिल्कुल आते हैं। लेकिन, हम अपना और अपने घराने का नाम खराब नहीं करना चाहते हैं। हमारा साफ कहना है कि जिसमें सूफियाना होगा वहीं गाएंगे। जिसमें अल्लाह का नाम होगा,मौला का नाम होगा हमारे ख्वाजा का नाम होगा वो गाएंगे। अब जैसे हमारे दादा पद्मश्री अजीज अहमद खां वारसी ने ‘मौला सलीम चिश्ती’ गाया था। आज भी आप  देखिए और सुनिए कि कैसा पिक्चराइजेशन है और कैसे अल्फाज हैं ‘घूंघट की लाज रखना इस सर पे ताज रखना’।  अब आज तो फिल्मवाले जो दिल मे आए ठोक देते हैं। इसलिए तब तक हम फिल्मों से दूर ही ठीक हैं। 

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