”आज पत्रकारिता बाजार के साथ है और साहित्य बाजार के प्रतिरोध में है”

: सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर की पुण्य तिथि पर वाराणसी में साहित्यकारों और पत्रकारों का जमावड़ा : वाराणसी। प्रसिद्ध साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने कहा है कि आज हम जिस भाषा में लिख रहे हैं उसे राजमार्ग बनाने का काम पत्रकारिता ने किया है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य का साथ 200 वर्षों का है लेकिन आज पत्रकारिता बाजार के साथ है और साहित्य बाजार के प्रतिरोध में है। डॉ. सिंह सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर की पुण्य तिथि 12 जनवरी पर उनकी जन्म और कर्मस्थली वाराणसी में आयोजित समारोह में विचार व्यक्त कर रहे थे।

सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर स्मृति न्यास ने पराड़कर स्मृति भवन में स्मृति समारोह का आयोजन किया था, जिसमें साहित्यकारों और पत्रकारों का जमावड़ा हुआ और 'हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य की जरुरत' विषय पर चर्चा हुई। आयोजन की अध्यक्षता करते हुए श्री सिंह ने कहा कि जिस प्रकार कथाकारों के लिए प्रेमचंद पितामह हैं, पत्रकारों के पितामह पराड़कर जी हैं। उन्होंने बताया कि गोर्की के मरने पर 'आज' में शोक सभा हुई थी और प्रेमचंद उसमें शरीक हुए थे, जबकि प्रेमचंद के मरने पर 'हंस' का जो अंक निकला उसका संपादन पराड़कर जी ने किया था। उन्होंने कहा कि पराड़कर जी का जीवन पत्रकारों के लिए आचार संहिता है। उनका सम्बन्ध एक ओर जहाँ तिलक से था वहीं गणेश शंकर विद्यार्थी से भी था। इस प्रकार वे राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष दोनों थे।

संगोष्ठी में प्रसिद्ध साहित्यकार और 'तद्भव' के सम्पादक अखिलेश ने कहा कि साहित्यकार को अपने समय के सत्य को समझने के लिए पत्रकारिता जैसी जागरूकता की जरूरत होती है। इसी प्रकार साहित्य से पत्रकारिता में भाषा और सरोकार आते हैं। वरिष्ठ पत्रकार और समकालीन सरोकार के प्रधान संपादक सुभाष राय ने कहा कि बेचने की मानसिकता ने पत्रकारिता की भाषा को बिगाड़ा है। पत्रकारिता को यह लगता है कि साहित्य बिकने वाली चीज नहीं है। समकालीन सरोकार के संपादक एवं युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय ने कहा कि संवेदनशील पत्रकारिता के लिए लेखकों को पत्रकारिता की कमान अपने हाथ में लेनी होगी। सोच विचार के प्रधान संपादक जितेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा कि 50 वर्षों पूर्व इस विषय पर चर्चा नहीं हो सकती थी। काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष कृष्णदेव नारायण राय ने सवाल उठाया कि अपराध कि रिपोर्टिंग में साहित्य कैसे काम आएगा?

संयोजक एवं पराड़कर जी के पौत्र आलोक पराड़कर ने कहा कि पराड़कर जी का मानना था कि भारतीय भाषाओ का गद्यांग समाचार पत्रों से ही प्रारंभ और पुष्ट हुआ है। इस मौके पर कुंवर जी अग्रवाल, धर्मशील चतुर्वेदी, वशिष्ठ मुनि ओझा, राम अवतार पाण्डेय, जगत शर्मा ने भी विचार व्यक्त किये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *