“आप” ने तो सच में कमाल कर दिया…

नयी दिल्ली : एक साल का वक़्त, राजनीती में पहला क़दम, संगठन बनाया, राजनीतिक दल के तौर पर उसकी पहचान बनाने में अपने कुछ चुनिंदा साथियों के साथ दिन रात का समय लगाया, और देखते ही देखते देश कि राजधानी दिल्ली म विधान सभा चुनाव की घोषणा हो गयी।

दो प्रमुख दल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी तो चुनावी मैदान में पूरी तैयारी के साथ उतर ही रहे थे, साथ ही कुछ अन्य राजनीतिक पार्टियां भी इन दोनों दलों के सामने चुनौती देने को चुनावी समर में कूदने को तैयार बैठी थी, जिसमे मायावती की बसपा, मुलायम की सपा और नितीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड शामिल थी। इन्हीं सभी दिग्गज नेताओं की पार्टियों के बीच एक साल पुरानी एक बहुत ही साधारण और बगैर किसी ताम झाम की नयी पार्टी आम आदमी पार्टी ने भी चुनावी बिगुल फूंका, जिसका शोर भी बहुत ज़यादा नहीं सुना गया।

चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई, सभी दलों ने अपने अपने ढंग से और संगठित तौर पर प्रचार प्रसार किया। इसी में अपनी गति से आम आदमी पार्टी भी मेहनत कर रही थी, जिसका नेतृत्व एक बहुत ही साधारण वेश-भूषा वाला इंसान अरविन्द केजरीवाल कर रहा था, जो खुद ही अपनी पार्टी का सबसे बड़ा पोस्टर बॉय था। उसके इलावा जो भी लोग उसके दल में उसके साथी के तौर पर उसका साथ दे रहे थे वो बहुत ही लो प्रोफाइल थे, जिनका नाम केजरीवाल के बाद ही लिया जाता था। परन्तु, इन सभी ने केजरीवाल को ताक़त बख्‍शी और उसकी सत्ता परिवर्तन की लड़ाई में साथ हो लिये।

सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के उमीदवार भी प्रमुख ही थे, जिनमें खुद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, उनके सरकार के कई वरिष्ठ सहयोगी।  दूसरी तरफ, भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. हर्षवर्धन और उनकी पार्टी  के कई पुराने चेहरे। इसी तरह अन्य दलों में भी कई नामचीन चेहरे भी शामिल थे, जो चुनावी जंग को रोचक और चुनौतीपूर्ण बनाने के लिए काफी थे। उधर अपनी पहली पारी खेल रही आम आदमी पार्टी के टीम में 90 प्रतिशत उम्मीदवार ऐसे थे, जिनका किसी ने पहले नाम तक नहीं सुना था, जिन्हे राजनीति का "क -ख -ग" भी नहीं आता था और शायद जिनलोगों ने पहले कभी राजनीति में आने का सपना भी नहीं देखा होगा।

इन सभी लोगों की जमात से बनी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधान सभा का चुनाव लड़ा। चुनाव के दिन तक सभी ने यही माना कि मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच है। साथ ही कुछ सीटों का अनुमान लगाया गया, जिसमे आम आदमी पार्टी, बसपा और नितीश की जदयु शामिल थी। परन्तु यह अनुमान ऐसा नहीं था, जिसके ज़रिये आम आदमी पार्टी के लिए दावे के साथ यह कहा जाता कि एक साल पुराने इस दल को अपनी पहली पारी में ही सरकार बनाने का मौक़ा मिलेगा और इसके साधारण से दिखने वाले नेता को मुख्यमंत्री की गद्दी मिल जायेगी।

कहा जाता है न कि जिसका मुहाफ़िज़ अल्लाह हो उसको किसी बात का क्या खौफ और यही कर दिखाया गोविन्द राम केजरीवाल और गीता देवी के सपूत आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चूका और असिस्टेंट इंजीनियर के तौर पर अपनी नौकरी शुरू करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने। अरविन्द ने बाद में आईआरएस भी पास किया और दिल्ली में इनकम टैक्स के संयुक्त आयुक्त के तौर पर भी काम किया, परन्तु बात वहाँ भी नहीं बनी तो एक एनजीओ बना कर समाज सेवा का बीड़ा उठाया। अंततः अन्ना हज़ारे के जन लोकपाल आंदोलन से जुड़ कर अपनी एक नयी पहचान बनायी, जिसने आज उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में अहम रोल अदा किया।

अरविन्द ने आम आदमी पार्टी के बैनर पर दिल्ली के सभी 70 विधान सभा सीटों पर अपने उमीदवार उतारे, जो भी जहाँ मिला उसको पार्टी का चुनाव निशान झाड़ू पकड़ा दिया और कहा कि लग जाओ भ्रष्टाचार को साफ़ करने में। आत्म विश्वास से भरे केजरीवाल ने अपने शुरुआती चुनावी संघर्ष में ही यह दावा किया था कि इस बार सत्ता परिवर्तन हो कर रहेगा और दिल्ली पर अब आम आदमी की ही सरकार राज करेगी, परन्तु केजरीवाल के इस दावे को समान्त्यः हलके में ही लिया गया। कोई भी दल या उसका नेता केजरीवाल या आम आदमी पार्टी को एक बड़ी शक्ति मानने को तैयार नहीं था। खुद दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित से मेरी कई मुलाक़ात में भी यह बात सामने आयी, परन्तु शीला ने कभी यह  बात खुल कर नहीं मानी की केजरीवाल इतनी बड़ी शक्ति बन कर उभरेगा कि दिल्ली पर अगली सरकार उसकी ही होगी। और जिस कुर्सी पर वो पिछले 15 वर्षों से बैठी हैं उस पर चुनाव के बाद केजरीवाल का क़ब्ज़ा होगा।  

कुछ ऐसा ही मानना था भाजपा के नेता और मुख्यमंत्री पद के उमीदवार डॉ. हर्षवर्धन का भी। हर्षवर्धन और उनके क़रीबी लोगों ने मुझसे यह बात तो साझा की थी कि कि आम आदमी पार्टी कुछ सीटें ज़रूर जीत सकती है, पर उन्हें भी यह अनुमान नहीं था कि आम आदमी पार्टी इतनी सीटें जीत जायेगी कि उन सभी की वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देगी। आखिर कार चुनावी परिणाम आया और सभी की आँखें खुली की खुली रह गयी। दिल्ली की 70 विधानसभा में से 28 सीटें आम आदमी पार्टी के खाते में गयी और इसके साथ कई चौंकाने वाले परिणाम भी आये, जिसमे खुद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी केजरीवाल के हाथों अपनी सीट एक बड़े अंतर से गंवा बैठीं। साथ ही उनके कई दिग्गज मंत्री और नेता भी केजरीवाल के साधारण से लगने वाले उमीदवारों के हाथों पूरी तरह पीट चुके थे।

हालांकि इन सबके बावजूद आम आदमी पार्टी सरकार बनाने के 36 के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी और भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी ही बन पाई। मगर इस परिणाम ने दिल्ली में 15 वर्षों से सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी को कहीं का न छोड़ा। वो मात्र 8 सीटों पर ही सिमट कर रह गयी। अब बारी थी भाजपा की सरकार बनाने की पहल करने की, परन्तु सभी जुगत के बाद भी भाजपा 33 सीटों से आगे नहीं बढ़ पायी। अंततः उसने अपने हाथ खड़े कर दिये। फिर लोगों का दबाव केजरीवाल पर बढ़ा और उनसे कहा गया कि आप सरकार बनाने का प्रयास करें। चूँकि कांग्रेस पहले ही आम आदमी पार्टी को अपना समर्थन देने की बात कह चुकी थी, इसलिए आम आदमी पार्टी के पास यह बात कहने को भी नहीं रह गया था कि उसके पास जादुई आंकड़ा नहीं है, परन्तु केजरीवाल इतनी आसानी से कांग्रेस का साथ लेना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने जनमत संग्रह के बाद अपने अंतिम निर्णय की बात कही। टीम केजरीवाल ने दिल्ली के लगभग 272 वार्ड में जनमत संग्रह कराया। उनकी राय जानी और अंततः सोमवार कर सुबह यह निर्णय लिया गया कि आम आदमी पार्टी को दिल्ली में सरकार बनानी चहिये।

अपने इसी निर्णय को लेकर आम आदमी के नेता अरविन्द केजरीवाल अपने कुछ ख़ास सहयोगियों के साथ दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग से मिलने पहुँच गए। वहां कहा कि जनता ने उन्हें सरकार बनाने का निर्देश दिया है, इसलिए उन्हें यह मौक़ा मिलना चहिये। उप राज्यपाल ने हामी भरी और 26 दिसंबर का दिन तय हुआ आम आदमी की सरकार गठन का। साथ ही तय हुआ दिल्ली का नया मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की शक्‍ल में।

इसके बाद तो सिर्फ यही कहा जा सकता है न कि "आप" ने तो सच में कमाल कर दिया। असम्भव से दिखने वाले सपने को सम्भव कर दिखाया, जिसमे उनका भरपूर साथ दिया दिल्ली के आम आदमी ने, जिनके द्वारा किये गए जनमत ने आज देश में एक नया इतिहास रच दिया। अरविन्द ने सरकार की सबसे बड़ी चुनौती तो पार कर ली अब उनके सामने अपने द्वारा जनता से किये गए कठिन वादों की लम्बी फेहरिस्त है, जिसको पूरा करना शायद उनके लिए बहुत ही आसान नहीं होगा। परन्तु जिस तरह उन्होंने कई कठिन पड़ाव बड़े खूबसूरती से पार कर लिए, उम्मीद लगाना ग़लत नहीं होगा कि वो आगे भी अपने रास्ते के पत्थरों को पार करने कामयाब होंगे और एक नयी राजनीति की परिभाषा को पूरी तरह सत्यापित कर पाएंगे।

लेखक सैयद असदर अली दिल्लीमें स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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