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आरपी सिंह बने जनसंदेश टाइम्‍स में सीईओ, गोरखपुर में डाक एडिशन बंद कराया

जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर से खबर है कि आरपी सिंह ने यहां सीईओ के रूप में ज्‍वाइन किया है। आरपी सिंह इसके पहले मेरठ में सुभारती ग्रुप से जुड़े हुए थे। वहां से हटाए जाने के बाद उनकी जनसंदेश टाइम्‍स में इंट्री हो गई है। हालांकि माना जा रहा है कि बाबू सिंह कुशवाहा की बिरादरी का होने के चलते यहां उन्‍हें सुपर बास बनाया गया है। नई नौकरी ज्‍वाइन करने के बाद यहां भी उन्‍होंने पुराना पैतरा शुरू कर दिया है। उनका यह फैसला अखबारी जगत में मजाक का विषय बन गया है।

जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर से खबर है कि आरपी सिंह ने यहां सीईओ के रूप में ज्‍वाइन किया है। आरपी सिंह इसके पहले मेरठ में सुभारती ग्रुप से जुड़े हुए थे। वहां से हटाए जाने के बाद उनकी जनसंदेश टाइम्‍स में इंट्री हो गई है। हालांकि माना जा रहा है कि बाबू सिंह कुशवाहा की बिरादरी का होने के चलते यहां उन्‍हें सुपर बास बनाया गया है। नई नौकरी ज्‍वाइन करने के बाद यहां भी उन्‍होंने पुराना पैतरा शुरू कर दिया है। उनका यह फैसला अखबारी जगत में मजाक का विषय बन गया है।

बताया जा रहा है कि शैलेन्‍द्र मणि की अखबार में अरुचि और कार्यालय नहीं आ पाने से बदहाल गोरखपुर यूनिट को दुरुस्‍त करने का जो फार्मूला उन्‍होंने आदेश के रूप में दिया वह कई पत्रकारों के लिए परेशानी का सबब भी बन गया है। गोरखपुर यूनिट के कायाकल्‍प के लिए निर्णय लिया कि डाक एडिशन (जिलों का संस्‍करण) अब नहीं छपेगा। जिलों के ब्‍यूरो कार्यालय भी बंद कर दिये जायेंगे। यानि अब जनसंदेश टाइम्‍स का केवल गोरखपुर नगर संस्‍करण छपेगा। इसके तहत बकायदा सात लोगों से इस्‍तीफा मांगे जाने की भी खबर है। वैसे लगातार खस्‍ताहाल होती जा रही अखबार की हालत और सेलरी समय से नहीं मिलने के चलते जनसंदेश टाइम्‍स का हर कर्मचारी अपने नये ठिकाने की तलाश में है। बहुत से लोग छोड़कर जा भी चुके हैं, लेकिन जिनकी कोई व्‍यवस्‍था अब नहीं हो पायी  अचानक इस नयी बला से काफी परेशान हैं।

इस निर्णय की घोषणा भी काफी बेवकूफी भरे तरीके से हुई। हुआ यूं कि गोरखपुर यूनिट से जुड़े जिलों के प्रतिनिधियों की 27 नवंबर को मीटिंग बुलायी गयी थी। प्रतिनिधियों से कहा गया था कि वे अपना हिसाब यानि विज्ञापन का पैसा भी लेकर आयेंगे। इस मीटिंग में नये सीईओ के रूप में आरपी सिंह का परिचय भी होना था। प्रतिनिधियों से धन की वसूली से पूर्व ही आरपी सिंह ने ब्‍यूरो कार्यालय बंद करने का फरमान सुना दिया। फिर क्‍या था, भागते भूत की लंगोटी ही सही की तर्ज पर सभी प्रतिनिधि विज्ञापन का धन अपने जेब में दबाकर लौट गये। इससे अखबार को लाखों की चपत लगी। यानी जिम्‍मेदारी संभालते ही प्रबंधन का नुकसान करा दिया।

वैसे इस अखबार का भविष्‍य मालिकों के बिरादराना प्रेम के चलते भगवान के ही हा‍थ में है। इसके चलते हर काबिल आदमी टूटता जा रहा है। कारण एक खास बिरादरी का होने के चलते छुटभैया भी यहां खास ओहदे पर पहुंच जा रहा है। उनके आगे पुराने और अनुभवी लोगों की कोई कद्र नहीं है। गोरखपुर में शैलेन्‍द्र मणि ने धमाकेदार तरीके से लांचिंग करायी थी, लेकिन हाल ये हुई कि अपमान के चलते उन्‍होंने कार्यालय आना ही छोड़ दिया। जिसका खामियाजा यह हुआ कि अखबार वहां बंदी की कगार पर पहुंच गया है। बनारस में आशीष बागची, एके लारी, सीपी राय और विशाल श्रीवास्‍तव ने अखबार लांच कराकर एक अच्‍छे मुकाम पर पहूंचा दिया, लेकिन बिरादरी के नहीं होने के चलते इनके पर कतर दिए गए।

हिंदुस्‍तान में सीनियर रिपोर्टर के पद पर कार्यरत रहे विजय विनीत को मालिकान ने प्रमोट करके पॉवरफुल बना दिया क्‍योंकि वे उनकी बिरादरी के थे, लिहाजा बड़बोलेपन के शिकार विजय विनीत की आदतों से तमाम अच्‍छे लोग या तो अखबार छोड़ दिया या फिर खुद को समेट लिया। परिणाम यह रहा है कि यह अखबार यहां भी पिट गया। एक बार तो इसने अपनी डिजाइनर बेटी को एक खबर में मालिक समझे जाने वाले अनुराग कुशवाहा से आगे कर दिया। खबर पेज वन पर छपी इससे पूरे अखबार की थू-थू हुई। मालिक ने नाराजगी जताई, पर बिरादरी ने एक बार फिर बचा लिया।

अखबार के डायरेक्‍टर के रूप में रितेश अग्रवाल को जिम्‍मेदारी मिली, वो अभी अखबारी काम समझते तब तक उन्‍हें बिरादराना ताकतों की साजिश का शिकार होना पड़ गया। इसके बाद अखबार चलाने की जिम्‍मेदारी पांच वरिष्‍ठों की कोर कमेटी को सौंपी गयी। मगर यह भी दौर कुछ दिन ही चला। फिर डायरेक्‍टर के रूप में रितेश अग्रवाल और रवींद्र मौर्या ने काम-काज देखना शुरू किया। दोनों अखबार को पटरी पर लाने में जुटे थे, तब तक सुभारती ग्रुप का भट्ठा बैठाने के बाद आरपी सिंह यहां पहुंच गये। अब देखना है वे क्‍या नया गुल खिलाते हैं। वैसे उनके पुराने इतिहास और जनसंदेश टाइम्‍स में लिये गये शुरुआती निर्णय से तो यही उम्‍मीद लगायी जा सकती है कि नाव जल्‍द डूबने वाली है।

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