आलोक मेहता को भी सताने लगी है मीडिया की गिरती साख

एक पुरानी कहावत है कि सौ सौ चूहे खाकर बिल्‍ली हज को चली. यही स्थिति इस समय नईदुनिया से नेशनल दुनिया में तब्‍दील हुए अखबार के प्रधान संपादक आलोक मेहता की है, जो आजकल मीडिया पर भी लिख रहे हैं, जबकि आलोक मेहता की पत्रकारिता जगजाहिर है. यहां तक कि उनकी ऐसी पत्रकारिता के चलते उन्‍हें एक खास पार्टी का अघोषित प्रवक्‍ता माना जाता है. यही आलोक मेहता को मीडिया की वर्तमान स्थिति से घृणा हो रही है.

रविवार के नेशनल दुनिया के साप्‍ताहिक पत्रिका में विशेष संपादकीय में आलोक मेहता ने इस बार मीडिया पर लिखा है. उनको वर्तमान मीडिया स्थिति से घृणा हो रही है. उन्‍होंने पेड न्‍यूज पर सवाल उठाते हुए कहा है कि टीवी चैनल खोलने में तो फिर भी लाखों-करोडों का बैलेंस देखा जाता है जबकि प्रिंट और न्‍यू मीडिया के लिए इसकी भी जरूरत नहीं पड़ती. पिछले कई सालों से पीआर पत्रकारिता और एक पार्टी विशेष के पक्ष में खबर लिखने वाले की छवि बना चुके आलोक मेहता को क्‍या इस बात का नैतिक अधिकार है कि मीडिया की दुर्दशा पर सवाल उठाएं.

मेहता लिखते हैं कि टीवी चैनल के दो संपादकों के जेल जाने के बाद यह स्थिति और भी बदतर हुई है. इन सब बातों के बीच वे एक अच्‍छी बात भी लिखते हैं कि प्रेस परिषद बिना दंत-नख की संस्‍था है, जिसके पास किसी मीडिया संस्‍थान को दंड देने तक का अधिकार नहीं है. यह सही भी है कि प्रेस परिषद जैसी संस्‍था केवल भौंक सकती है काटना उसके वश की बात नहीं है. तभी तो उसके फैसलों को भी तमाम अखबार और मीडिया संस्‍थान प्रकाशित नहीं करते क्‍योंकि इस संस्‍था से उन्‍हें कोई डर ही नहीं है. शायद इसीलिए काटजू साहब ऐसे मुद्दों पर बोलते हैं, जो छप सके. पत्रकार हित में कुछ नहीं बोलते उन्‍हें पता ये छपने वाला नहीं है. आप भी पढि़ए आलोक मेहता का संपादकीय.

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