आलोक श्रीवास्‍तव के गीत वाला अनुष्का शंकर का ‘ट्रैवलर’ ग्रैमी में नॉमिनेट

सितार के सरताज स्व. पंडित रविशंकर की बेटी और मशहूर सितार वादक अनुष्का शंकर के एलबम 'ट्रैवलर' को ग्रैमी अवॉर्ड में नॉमिनेट किया गया है। सितार की नौ ख़ूबसूरत बंदिशों से सजे इस एलबम की ग्रैमी में जाने की ख़बर मीडिया के लिए इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इस एलबम के महज़ दो गीतों में से एक आजतक से जुड़े पत्रकार और युवा कवि आलोक श्रीवास्तव ने लिखा है। ये गीत 15वीं शताब्दी के मशहूर फ़ारसी कवि जामी की रचना का सहज-काव्यानुवाद है। दूसरा कृष्ण भजन है, जो स्व. पंडित रवि शंकर जी ने स्वयं लिखा है और उसे शुभा मुदगल जी ने गाया है। आलोक के गीत को प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक संजीव चिमलगी ने अपनी आवाज़ दी है और अनुष्का शंकर ने सितार के सुमधुर संगीत में पिरोया है। 

US से दुनिया भर में रिलीज़ हुए Traveller के ट्रैक नं. 9 : Ishq को आलोक श्रीवास्तव ने लिखा है. उन्होंने अपने ब्लाग आमीन पर इस गीत के बनने की कहानी बयां की है और गीत सुनने का लिंक भी दिया है. आलोक के ब्लॉग लिंक  www.aalokshrivastav.itzmyblog.com है. आलोक श्रीवास्‍तव का एक गजल संग्रह 'आमीन' एवं कहानी संग्रह 'आफरीन' भी प्रकाशित हो चुका है. उन्होंने अपने ब्लाग पर जो कुछ लिखा है, वो इस प्रकार है…
 
शुक्रिया शुभा दीदी। यूं शुक्रिया बहुत छोटा लफ़्ज़ है उनके लिए। कुछ लोगों की दुआओं का, स्नेह और विश्वास का तिलिस्म ऐसा

अनुष्‍का शंकर
होता है जो आपको फ़र्श से अर्श पर ला खड़ा करता है। अपनी शुभा दीदी (शुभा मुद्गल) उन्हीं में एक हैं। सितार के सरताज पंडित रवि शंकर जी की बेटी अनुष्का शंकर जी का नया एलबम Traveller रिलीज़ हुआ है। यूएस से दुनिया भर में रिलीज़ हुए Traveller का ट्रैक नं. 9 : Ishq आपके दोस्त ने लिखा है। 15वीं शताब्दी में फ़ारसी के बड़े कवि हुए- जामी। ''जामी के एक क़तए – 'इश्क़' का आमफ़हम ज़बान में काव्य अनुवाद किससे कराया जाए?'' जब अनुष्का जी ने ये सवाल हमारी शुभा दीदी से पूछा तो उन्होंने झट से मुझ जैसे नासमझ का नाम आगे कर दिया। ऐसा वो अक्सर करती रहती हैं। चुनौतियां पैदा करना और फिर उन चुनौतियों की कामयाबी के लिए दिल खोल के दुआएं देना, कोई शुभा दीदी से सीखे। जामी ने अपनी ज़बान में इश्क़ की इबादत कुछ यूं की है –

जाम ज़मज़मय-ज़े-पा-ए-ता-सर हमे इश्क़,
हक़्क़ा के: बे-अहदा नयायम बैरुन,
बर उदे नवाख़्त यक ज़मज़म-ए-इश्क़,
अज़ अहद-ए-हक़ गोज़ारी यकदम-ए-इश्क़.

फ़ारसी के एक बड़े आलिम-फ़ाज़िल की सोहबत उठाई। उनसे जामी के इस क़तए का भाव पूछा-समझा और फिर जो काव्य अनुवाद हुआ उसका चेहरा कुछ इस तरह बना –

ये इश्क़ क्या हुआ है, ख़ुद इश्क़ हो गया हूं,
ख़ुद में ही रम गया हूं, ख़ुद में ही खो गया हूं,
तन-साज़ हो गया हूं, मन-राग हो गया हूं,
कभु करके कोई देखे, जो इश्क़ हो गया हूं.

संजीव चिमल्गी जी हमारे दौर के स्थापित शास्त्रीय गायक हैं। उन्होंने ये गीत गाया है। इस लिंक के ज़रिए गीत सुनिए और अच्छा लगे तो मेरी तरह आप भी ज़रूर कहिए – शुक्रिया शुभा दीदी। शुक्रिया अनुष्का जी।

इस एलबम को यूट्यूब पर इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं.

Youtube link : http://www.youtube.com/watch?v=B6uJTHpeyQo

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