इसमें भी मेरे “अलोकतांत्रिक” होने का सुराग मिल गया है : ओम थानवी

Om Thanvi : मुझे नहीं समझ पड़ता कि अगर मेरी वाल पर आ-आकर कोई मेरा और आपका वक्त बरबाद करे और मैं उससे हाथ जोड़ लूं — यानी ब्लॉक कर दूं — तो इसमें आपत्तिजनक क्या है? कुछ फेसबुकिया शोहदों को इसमें भी मेरे "अलोकतांत्रिक" होने का सुराग मिल गया है और फतवाते फिर रहे हैं। हालांकि उनमें ब्लॉक होने का सौभाग्य प्राप्त करने वालों की संख्या अभी दर्जन भर ही होगी, लेकिन सुना है उन वीरों ने मिलकर एक मंडली (प्रीमियर लीग) बना ली है।

लगता है उन्हें लोकतंत्र का मतलब नहीं पता। क्या ब्लॉक कर मैंने किसी का मताधिकार छीन लिया है? या फेसबुक पर ही किसी के आने-जाने पर रोक लगवा दी है (जो मैं कर नहीं सकता!)? मेरी वाल पर किसी की गतिविधि मुझे अशोभनीय लगे तो उसके जारी रहने का फैसला मैं करूंगा या कोई और? किसी के आंगन में जाना और मनचाही हरकतें करते रहना क्या आगंतुक को शोभा देता है? लोकतंत्र का तर्क ऐसी हरकतें करने वाले अवांछित मेहमानों की भला क्या मदद कर सकता है?

'फ़िराक़' साहब का शेर याद आयाः

जो हमको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं?

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के एफबी वॉल से साभार.

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