उत्तराखंड में खंडूरी और कोश्यारी की जोड़ी ने निशंक को किनारे लगाया

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की हाईटेक रणनीति व कोश्यारी की कूटनीति के चलते भाजपा के 11 विधायकों को टिकट से हाथ धोना पड़ा है. इसके अलावा आधा दर्जन विधायकों के टिकट कटने लगभग तय थे, लेकिन अंसतोष बढने की संभावनाओं को देखते हुए पार्टी थिंक टैंक को अंतिम समय में अपना निर्णय बदलना पड़ा. टिकट न मिलने वालों में दो काबीना मंत्री व दो पूर्व मंत्री भी शामिल हैं.

बेटी को टिकट न मिलने से आहत पूर्व मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी खुले तौर पर अपनी नाराजगी मीडिया में बयान कर रहे हैं. टिकट वितरण में गडकरी व कोश्यारी के साथ ही मुख्यमंत्री खण्डूरी भी अपने चहेतों को टिकट देने में कामयाब रहे हैं, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान निशंक खेमे को उठाना पड़ा है. टिकट से महरूम अधिकांश भाजपा विधायक बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. हालांकि कांग्रेस में भी टिकट वितरण को लेकर बवाल मचा है, लेकिन सत्ताधारी दल के मुकाबले वहां भीतरघात होने की संभावना कम है. अब देखना दिलचस्प होगा कि दोनों दलों में उपजे असंतोष से ये दल कैसे निपटते हैं.

गौरतलब है कि गडकरी के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद से ही पार्टी में नये नये प्रयोग किये जा रहे हैं. ऐसा प्रयोग वो बिहार विधान सभा चुनाव में भी कर चुके हैं. इसी फार्मूले के तहत उत्तराखण्ड में कई दौर में सर्वे कराये गये. इसमें राज्य में पार्टी की सत्ता में वापिसी की संभावनाएं बेहद कम आंकी गई. डैमेज कंट्रोल के तौर पर खण्डूरी की चुनाव से चार माह पहले ताजपोशी की गई. यहां उल्लेखनीय है कि ये गडकरी ही थे जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री निशंक पर लगातार लग रहे आरोपों के बावजूद उनकी पीठ ठोकते रहे. लेकिन केन्द्र में अपनी साख बचाने व संघ के दवाब के चलते उनको निशंक को हटाने का फैसला करना पडा.

खण्डूरी की वापसी में कोश्यारी की भूमिका किसी से छिपी नही है. यही कारण रहा कि टिकट बंटवारे में कोश्यारी खेमा अन्य नेताओं पर भारी पडा. केवल कुमांऊ में ही नहीं, कोश्यारी गढवाल मंडल में भी अपने चहेतों को टिकट दिलाने में कामयाब रहे. इस पूरी एक्सरसाइज में पूर्व मुख्यमंत्री जो कभी गडकरी के खासमखास थे, को सबसे ज्यादा राजनैतिक नुकसान उठाना पड़ा है. खासतौर से निष्ठा बदलने व सत्ता की परिक्रमा करने वाले चाटुकारों को हाथ मलने पर विवश होना पड़ा. कभी कोश्यारी व खण्डूरी के इर्द गिर्द घूमने वाले उन छुटभैया नेताओं को नेता द्वय ने अच्छा सबक सिखाया, जिन्होंने राजनैतिक महत्वाकांक्षा के चलते निशंक का दामन थामा था. कोश्यारी के साथ भाजपा का ककहरा पढने वाले व बाद में खण्डूरी के करीब रहने वाले अधिकांश उन विधायकों को टिकट से हाथ धोना पड़ा, जिन्होंने निशंक में निष्ठा जताई थी. जिन 11 विधायकों का टिकट काटा गया उसमें से अधिकांश को इसकी कीमत चुकानी पड़ी.

कुल मिलाकर भारतीय जनता पार्टी में टिकट वितरण के बाद जो राजनैतिक हालात पैदा हुए हैं, उससे पार्टी का अंतरकहल खुलकर सामने आ गया है. यदि बगावत पर उतर आये बागियों को मनाने की कोशिश नहीं की गई तो सत्ता में वापसी की पार्टी की उम्मीदों पर ग्रहण लगना तय है.

निष्ठा बदलने वाले नेताओं को सिखाया सबक

मुख्यमंत्री खण्डूरी व कोश्यारी की जुगलबंदी ने पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की उम्मीदों पर पलीता लगा दिया है. कभी एक दूसरे के धुर विरोधी रहे इन दोनों नेताओं ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हाथ मिला लेने का नुकसान निशंक खेमे को उठाना पडा है. टिकट की मंशा पाले जिन सत्तालोलुपों ने निशंक का दामन था उनको इस पूरे खेल में मुंह की खानी पडी है. ऐसे दो दर्जन से अधिक नेता हैं, जिन्होंने अपना टिकट पक्का मानकर कई महीने पहले ही चुनाव तैयारी शुरू कर दी थी, लेकिन अचानक हुए सत्ता परिवर्तन की मार का असर इन नेताओं को भी झेलना पडा है.

निशंक का सिपहसलार बनने का खामियाजा आधे दर्जन से अधिक विधायकों  को उठाना पडा है. समय रहते कुछ विधायक व्यक्तिगत प्रयास न करते तो लगभग आधा दर्जन और विधायकों का टिकट कट गया था. पूर्व मुख्यमंत्री निशंक के जिन खास लोगो को टिकट से हाथ धोना पडा है उसमें कर्णप्रयाग के विधायक अनिल नौटियाल, गोविन्द लाल, केदार सिंह, फोनिया,खजान दास, का नाम प्रमुख है. इसके अलावा निशंक के मुख्यमंत्री रहते हुए जो नेता अपना टिकट पक्का मानकर चल रहे थे, उसमें उनके राजदार मनवीर सिंह चौहान – यमनोत्री से, मनोज कुलाश्री – यमकेश्वर से, टिहरी से ज्योति गैरोला, देवप्रयाग से विनोद कंडारी, हल्द्वानी से हेमंत द्विवेदी ,हरिद्वार ग्रामीण से ओम प्रकाश जमदग्नी, गंगोत्री से सूरत राम नौटियाल का नाम तय था. इसके अलावा एक दर्जन जो अन्य दावेदार थे, उसमें सुभाष, वडथ्वाल, आदित्य कोठारी, अनिल बलूनी,बलराज पासी, पंकज सहगल, रूचि भटट, एसके द्विवेदी  प्रमुख बताये जा रहे हैं.

टिकट वितरण से यह बात साफ हो गई कि खण्डूरी और भगत दा ने निष्ठा बदलने वाले नेताओं को अच्छा सबक सिखया और उनके प्रति आस्था रखने वालों को उपकृत भी किया.

देहरादून से बृजेश विजय की रिपोर्ट

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