उत्‍तराखंड के सूचना विभाग में हजारों की टीवी फिल्‍में लाखों में बनाने का खेल!

देहरादून। उत्तराखण्ड के सूचना निदेशालय में सरकार की विकास योजनाओं पर आधारित लघु फिल्मों एवं टीवी, वीडियो, स्पॉट, प्रायोजित कार्यक्रमों के निर्माण को लेकर हजारों की फिल्में लाखों में बनाने का खेल शुरू कर दिया गया है और इस खेल को अंजाम देकर बाहरी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की स्क्रिप्ट सूचना विभाग के शिखंडियों ने लिख डाली है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यह पहला अवसर होगा जब सूचना निदेशालय में फिल्मों के निर्माण का काम बाहरी एजेंसियों को सौंपा जाएगा। इस काम के लिए लाखों रुपये घूस लिए जाने की जानकारियां भी हासिल हो रही हैं और बताया जा रहा है कि इन फिल्मों के निर्माण का काम एक ऐसे व्यक्ति को सौंपे जाने की तैयारी है, जिसने कुछ समय पूर्व ही उत्तराखण्ड में अपनी टीवी फिल्म कंपनी को डीएवीपी में सूचीबद्ध करवाया है।

उत्तराखण्ड में सरकार की विकास योजनाओं को टीवी चैनलों के माध्यम से आम जनता तक पहुंचाने के लिए सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग हर साल विभिन्न एजेंसियों/फर्मों से निविदा के माध्यम से टेंडर करता है। अब तक उत्तराखण्ड के स्थानीय फर्मों के लोग ही ऐसी फिल्मों का निर्माण करते आए हैं। इससे जहां स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध हो रहा था वहीं यह सस्‍ता भी था। जो टीवी फिल्म 60 सेकेंड की मात्र 35 से 50 हजार में बनकर तैयार हो जाती थी, वह फिल्म अब डीएवीपी के रेट कार्ड अनुसार साढ़े तीन लाख की बनकर तैयार होगी। उत्तराखण्ड में सरकार के खजाने की माली हालत बेहद खराब है और कई विभागों में सरकार को कर्मचारियों का वेतन देने के लिए धन उपलब्ध कराने में एड़ी चोटी को जोर लगाना पड़ रहा है। वहीं दूसरी तरफ खुद मुख्यमंत्री के आधीन आने वाला सूचना विभाग सरकार की योजनाओं के लिए टीवी चैनलों को दिए जाने वाली फिल्मों के निर्माण पर हजारों के बजाए लाखों रुपये खर्च करने की तैयारी में जुट गया है।

इस काम के लिए बकायदा बीते 8 दिसम्बर को समाचार पत्रों में टेंडर निकाला गया और 18 दिसम्बर को इस टेंडर में भाग लेने वाली फर्मों को काम देने की तैयारी कर ली गई। सूचना विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार 17 दिसम्बर तक करीब 30 से अधिक विभिन्न फर्मों द्वारा फिल्मे बनाने के लिए टेंडर खरीदे गए और 20 से अधिक फर्मों द्वारा टेंडर डाले गए। इस टेंडर को डाले जाने की पहली शर्त फर्म का डीएवीपी में सूचित होना अनिवार्य था, जिसमें उतराखंड से सलीम सैफी की न्यूज वायरस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ही डीएवीपी में सूचीबद्ध थी। हालांकि डाले गए टेंडरों में न्यूज वायरस ने भी प्रतिभाग किया है और बताया जा रहा है कि सूचना विभाग के शिखंडियों ने शर्तों में डीएवीपी में सूचीबद्व होने की शर्त सिर्फ इसलिए रखी है, जिससे न्यूज वायरस को फायदा पहुंचाया जा सके। क्योंकि उत्तराखण्ड की कोई भी फर्म इसके अलावा डीएवीपी में सूचीबद्ध नहीं है।

सूत्र यह भी बताते हैं कि इस फर्म की बनाई गई बैंलेंस सीट में काफी कमियां हो सकती हैं और आखिर इतनी जल्दी इस फर्म को डीएवीपी में किस तरह सूचीबद्ध किया गया है, यह भी सवालों के घेरे में आता दिख रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि जब उत्तराखण्ड में सरकार के पास बजट की स्थिति बेहद खराब हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सीमित खर्चों में ही प्रदेश को चलाने की बात कह चुके हैं, तो फिर किस आधार पर सूचना विभाग के अधिकारी मुख्यमंत्री की बातों को ठेंगा दिखाते हुए हजारों की बनने वाली टीवी फिल्में लाखों रुपये में बनाए जाने का खेल क्यों खेल रहे हैं? सूचना विभाग के इस कदम से स्थानीय फिल्में बनाने वाले लोगों में नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। इस कारोबार से जुड़े कई लोगों ने मुख्यमंत्री से इस प्रकरण की शिकायम भी कर दी है। अब देखना होगा कि सूचना विभाग के इस शिखंडियों की चाल से सूचना डीजी दिलीप जावलकर निकल पाते हैं या नहीं।

देहरादून से नारायण परगाई की रिपोर्ट.

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