उत्‍तराखंड सरकार ने बेच दिया पद्मविभूषण! सीबीआई जांच की मांग

 

उत्तराखंड में राज्य सरकार द्वारा पद्मश्री ओर पद्मविभूषण के लिए उत्तर प्रदेश में रह रहे व्यक्तियों के नामों की संस्तुति किए जाने से बबाल हो गया है। राज्य के कई संगठनों और गणमान्य व्यक्तियों ने राज्य सरकार और मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया है कि यूपी के एक शिक्षा माफिया को पद्मविभूषण देने की सिफारिश में करोड़ों का लेनदेन हुआ है। आक्रामक क्षेत्रीय संगठन उत्तराखंड जनमंच ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड को यूपी का उपनिवेश बना दिया गया है। 
 
मुख्यमंत्री पर हमला करते हुए जनमंच ने कहा है कि राज्य के मुख्यमंत्री यूपी के रेजिडेंट कमिश्नर की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उत्तराखंड सांस्कृतिक पुनर्जागरण मंच, राज्य आंदोलनकारी मंच, आल उत्तराखंड स्टूडेंट यूनियन, हिमालयन जर्नलिस्टस ऐशोशियेशन समेत कई जन संगठनों ने राज्य सरकार के निर्णय को उत्तराखंड का अपमान बताते हुए कहा है कि कानपुर के निवासी की सिफारिश कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि उसे उत्तराखंड के निवासियों से कोई लेना देना नहीं है।
 
उत्तराखंड सरकार के फैसलों से राज्य में बुद्धिजीवियों और क्षेत्रीय संगठनों का गुस्सा आसमान पर है। हाल ही में राज्य सरकार ने प्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों के लिए जो कुलपति नियुक्त किए उनमें से एक भी राज्य का निवासी नहीं है। जबकि राज्य इन पदों के लिए आवेदन करने वालों में जाने-माने शिक्षाविद शामिल थे। ये सभी राज्य के निवासी थे। लेकिन राज्य सरकार और राजभवन की मिलीभगत से एक भी स्थानीय शिक्षाविद को कुलपति के लिए नहीं चयनित किया गया। जबकि कांग्रेस के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ ने खुलकर इन तीन पदों पर राज्य के निवासी शिक्षाविदों की नियुक्ति की मांग की थी। बाहरी राज्यों के लोगों को कुलपति नियुक्त किए जाने की खबर ज्यों ही सार्वजनिक हुई तो राज्य के बुद्धिजीवियों में गुस्से की लहर दौड़ गई। कई पत्रकार, कवि, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने राज्य सरकार के इस निर्णय की भर्त्सना की। 
 
गौरतलब है कि राज्य के नौ विश्वविद्यालयों में एक भी राज्य का निवासी नहीं है। यह ऐसा तथ्य है जिससे राज्य के बौद्धिक समाज में गहरा असंतोष है। लेकिन राज्य सरकार ने पद्मविभूषण के लिए यूपी के कानपुर निवासी एक व्यक्ति के नाम की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजे जाने की खबर जैसे ही सार्वजनिक हुई, राज्य में बयानों का तूफान आ गया। हालांकि सरकार के मीडिया प्रबंधन करने वाले तंत्र ने इन खबरों के अखबारों और न्यूज चैनलों में न आने देने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। फिर भी कुछ अखबारों ने इन खबरों को छापने की हिम्मत जुटाई और अब पूरा प्रकरण जनता के सामने आ गया है।
 
आक्रामक क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाले उत्तराखंड जनमंच ने इसे लेकर कांग्रेस, भाजपा और क्षेत्रीय राजनीतिक दल यूकेडी पर जोरदार हमला बोलते हुए इन तीनों दलों पर आरोप लगाया है कि कुलपतियों की नियुक्त्यिों और पद्मविभूषण के लिए हुई डील में इन तीनों दलों के नेता शामिल हैं। जनमंच ने सवाल उठाया है कि यूपी सरकार ने कभी भी कानपुर निवासी उक्त व्यक्ति का नाम पद्मविभूषण के लिए नहीं भेजा। जनमंच ने सवाल उठाया है कि दूसरे राज्य के निवासी का नाम कैसे राष्ट्रीय सम्मान के लिए भेजा जा सकता है। 
 
जनमंच के कार्यकारी अध्यक्ष शशिभूषण भट्ट ने कहा कि प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले एक दर्जन जाने-माने ऐसे शिक्षाविद हैं जिनके काम की तारीफ राष्ट्रीय स्तर पर की गई है। भट्ट ने कहा कि यूपी के इस करोड़पति व्यक्ति के नाम की सिफारिश के पीछे सरकार चलाने वाली एक भ्रष्ट लाबी का हाथ है। उन्होंने कहा कि इसी लाबी ने लेनदेन कर पद्मविभूषण का सौदा किया है। जनमंच के नेता ने कहा कि राज्य में भ्रष्टाचार यहां तक बढ़ गया है कि अब सरकार में बैठे लोग पद्म विभूषण और पद्मश्री भी बेचने लगे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सम्मानों के लिए की जा रही इस सौदेबाजी की जांच सीबीआई द्वारा की जाने चाहिए। 
 
जनमंच के कार्यकारी अध्यक्ष ने कहा है कि राज्य के बुद्धिजीवी और महत्वपूर्ण हस्तियां प्रधानमंत्री, यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी 

और राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर मांग करेंगे कि राज्य सरकार द्वारा पद्मश्री और पद्म विभूषण के लिए जिन लोगों की सिफारिश की गई है उनकी संपत्ति, चाल चलन और धंधों की खुफिया जांच कराई जाय। जनमंच ने ऐलान किया है कि वह जल्द ही राज्य की हस्तियों को एक मंच पर लाकर राज्यसरकार के निर्णयों के खिलाफ पत्रकार सम्मेलन आयोजित करेगा। उत्तराखंड सांस्कृतिक  पुनर्जागरण मंच के प्रमुख एसएन पांडे ने कहा है कि राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ राज्य के सभी संस्कृति कर्मियों, लेखकों, कवियों और लोकगायकों का एक सम्मेलन बुलाया जाएगा। जिसमें इस निर्णय के खिलाफ राजधानी में एक सांस्कृतिक जुलूस निकाला जाएगा।
 
लेखक एस राजेन टोडरिया वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. 

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