…एक और सानंद की आस में प्रदूषण से लदी आदि गंगा गोमती

जौनपुर। आदि गंगा कही जाने वाली गोमती नदी को यदि जनपद की जीवन रेखा कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहां के भूभाग को संमृद्ध बनाने और सांस्कृतिक गौरव दिलाने में इस आदि गंगा गोमती की अहम भूमिका रही है, जिसके कारण जनपद में विकास और हरियाली की गंगा बहने लगी। लेकिन मौजूदा परिवेश में जहां राष्ट्रीय नदी घोषित गंगा हमारेपाप धोते-धोते आज अपने वजूद को बचाने में संघर्षरत है तो कमोवेश वही हाल गंगा की छोटी बहन गोमती का भी हुआ जा रहा है। गंगा के अस्तित्व को बचाने को लेकर जहां संत समाज उद्वेलित है तो वहीं गोमती आज भी स्वामी सानंद जैसा पुत्र ढूंढ रही है।

पीलीभीत के माधोटाण्डा से उदगमित यह आदि गंगा लगभग 900 किमी का सफर तय कर वाराणसी के पास सैदपुर में गंगा से मिलकर अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को समर्पित कर देती है। अपने इस सफर में गोमती का 138 किमी लम्बा व्यापक स्वरूप जौनपुर में देखने को मिलता है, जहां यह जनपद को दो बराबर भागों में विभाजित करती है। लेकिन दुखद है कि गोमती संकट प्राचीन समय में जिस गोमती के निर्मल जल को लोग पीते थे। कालान्तर में बढ़ती जनसंख्या के कारण लोगों के शौचालय व दैनिक उपयोग का गन्दा जल सरकारी व्यवस्था के अन्तर्गत नदी में बहाया जाने लगा।

औद्योगिक युग की शुरुआत होते ही कारखानों का रासायनिक तथा हानिकारक जल भी गोमती में छोड़ा जाने लगा, जिसका परिणाम यह हुआ कि गोमती जल की निर्मलता प्रदूषित व विषैली होने लगी है, जिसके कारण जल में दुर्गन्ध व गन्दगी के कारण हाथ मुंह धोने लायक भी नहीं बचा है। लेकिन इस तथ्य की ओर प्रशासन, नगर पालिका, जल निगम व प्रदूषण विभाग का ध्यान नहीं जाता है।

जौनपुर से राजेश मौर्य की रिपोर्ट. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *