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एमजे अकबर के दादा हिंदू थे

मशहूर अखबारनवीस एमजे अकबर ने पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता बना दिया है. राजनीति उनके लिए कोई नया काम नहीं है. वे इससे पहले भी 1989 में कांग्रेस पार्टी की ओर से बिहार के किशनगंज लोकसभा से चुनाव जीत चुके हैं, बाद में 1991 में उन्हें यह सीट गंवानी पड़ी, इसके बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अधिकारिक प्रवक्ता के रूप में काम किया.

मशहूर अखबारनवीस एमजे अकबर ने पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता बना दिया है. राजनीति उनके लिए कोई नया काम नहीं है. वे इससे पहले भी 1989 में कांग्रेस पार्टी की ओर से बिहार के किशनगंज लोकसभा से चुनाव जीत चुके हैं, बाद में 1991 में उन्हें यह सीट गंवानी पड़ी, इसके बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अधिकारिक प्रवक्ता के रूप में काम किया.

इस दौरान उन्होंने सरकार के सलाहकार के रूप में काम करते हुए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की योजना बनाने में मदद की. दिसंबर 1992 में उन्होंने पूरी तरह सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया और फिर से पत्रकारिता के कैरियर में आ गये. एमजे अकबर का पूरा नाम मोबाशर जावेद अकबर है. उनके शुरुआती जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है, मगर यह कहा जाता है कि उनका मूल निवास स्थान बिहार का सारण जिला है. उनके दादा प्रयाग हिंदू थे जो कोलकाता के करीब तेलिनीपाड़ा के एक जूट मिल में काम करते थे. बाद में उन्होंने इस्लाम को अपना लिया और अपना नाम रहमतुल्ला रख लिया. संभवत: अपने दादा के नाम पर ही एमजे अकबर ने अपने पुत्र का नाम प्रयाग रखा है. उनकी पढ़ाई कोलकाता ब्वाय कॉलेज और प्रेसिडेंसी कॉलेज कोलकाता में हुई.

उन्होंने अपने पत्रकारिता के कैरियर की शुरुआत 1971 में द टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में ट्रेनी के रूप में की. कुछ ही महीनों बाद उन्होंने द इलेस्ट्रेड वीकली ऑफ इंडिया में सब एडिटर के रूप में योगदान किया. 1973 में उन्हें फ्री प्रेस समूह की एक पाक्षिक पत्रिका ऑनलुकर में संपादक बना दिया गया. 1976 में आनंद बाजार पत्रिका समूह ने उन्हें अपनी पत्रिका संडे का संपादक बना दिया. संडे की सफलता के बाद 1982 में उन्होंने देश के पहले आधुनिक समाचार पत्र द टेलिग्राफ की शुरुआत की. वहां वे 1989 तक कायम रहे, जब तक उन्होंने राजनीति की राह को नहीं अपनाया.

पत्रकार के तौर पर उनकी दूसरी पारी बहुत सफल नहीं रही. उन्होंने एशियन एज नामक अखबार की शुरुआत की जो सफल नहीं रहा. उन्होंने इंडिया टुडे समूह में संपादकीय निदेशक के रूप कुछ दिन काम किया. उन्होंने कोवर्ट और द संडे गार्जियन आदि पत्रों का प्रकाशन शुरू किया जो कोई खास पहचना नहीं बना पाया है. (प्रभात खबर)

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