…ऐसे में बोर्ड परीक्षा का मतलब ही क्या है?

इलाहाबाद। सूबे में भले ही समाजवादी पार्टी की सरकार हो पर शिक्षा क्षेत्र में तो शिक्षा माफियाओं का ही एकछत्र राज चल रहा है। खासकर यूपी बोर्ड परीक्षा में नकल माफियाओं की कार्यप्रणाली देखकर पूरे दावे से कहा जा सकता है कि शासन-प्रशासन ने नकल माफियाओं के आगे पस्त होकर घुटने टेक दिए हैं। इतना ही नहीं, आमजन तो अब यह भी कहने लगे हैं कि ऐसी बोर्ड परीक्षा का मतलब ही क्या रह गया है।

नकल के चलते अपना इकबाल खो चुकी हाईस्कूल, इंटर की बोर्ड परीक्षा को होम एक्जाम कर देना चाहिए। हर साल लाखों छात्र-छात्राओं के भविष्‍य से क्रूर मजाक करने वाला माध्यमिक शिक्षा परिषद इस बार भी अंधाधुंध हो रही नकल को रोक पाने में नकारा साबित हो रहा है। परीक्षा कक्ष में बोलकर सामूहिक नकल कराई जा रही है। परीक्षा पास कराने की गारंटी के साथ नब्बे फीसदी परीक्षा केंद्रों में केंद्र व्यवस्थापक खुद जमकर नकल कराने में जुटे हैं। इसके लिए बाकायदे डेढ़ हजार रुपए से लेकर दस हजार रुपए तक प्रति परीक्षार्थी वसूल किए जा रहे हैं। सूत्रों की माने तो नकल के नाम पर मिलने वाली एकमुश्त धनराशि में कई जगह हिस्सा जाता है।

परीक्षा की बैतरिणी आसानी से पार होने की सुविधा मिलने की वजह से इस बार भी दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा आदि स्टेट के हजारों छात्र-छात्राएं आकर इलाहाबाद, प्रतापगढ़, कौशांबी जिले के विभिन्न परीक्षा केंद्रों में परीक्षा दे रहे हैं। इनमें कई तो पैंतीस साल से भी ज्यादा दिख रहे हैं। माध्यमिक शिक्षा परिषद ने इन अधेड़ों को परीक्षा में बैठने की अनुमति कैसे दे दी। इस सवाल का जवाब लोगों को खोजे नहीं मिल रहा है। खेत-खलिहानों के बीच परीक्षा केंद्रों में नकल कराने वालों की भीड़ किसी मेला का अहसास कराती है। विभागीय अफसर, स्थानीय प्रशासन की ढिलाई कुंए में भांग पड़ी वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। ऐसे में बिगड़ रहा है तो हर साल लाखों नौजवानों का भविष्‍य। सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में यूपी में किस तरह के डिग्रीधारक-अशिक्षितों की फौज इकट्ठा होने जा रही है।

इलाहाबाद से शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट.

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