केजड़ीवाल की आस्तकिता अवसरवादी राजनीति नहीं है?

Mukesh Kumar : वैसे तो किसी को कभी भी कहीं भी भगवान मिल सकते हैं क्योंकि ये विज्ञान का नहीं आस्थाओं का मामला है। लेकिन अरविंद केजडीवाल का ये कहना सही नहीं लगता कि उनकी सफलताओं ने उन्हें ये मानने को मजबूर कर दिया कि ईश्वर है। साफ़ है कि जिन्होंने उनको समर्थन और वोट देकर इस मुकाम तक पहुँचाया उनका श्रेय वे ईश्वर के खाते में डालकर आम आदमियों के साथ अन्याय कर रहे हैं।

क्या केजड़ीवाल ये कहना चाहते है कि अगर वे असफल हो गए होते तो नास्तिक बने रहते? और अगर आगे उन्हें फिर कामयाबी नहीं मिली तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा- ईश्वर या आम आदमी? अब ये मत कहिएगा दोनों। भाग्यवादी अकसर इस तरह के तर्क दिया करते हैं अपनी आस्तिकता के समर्थन में।

ये क्यों न माना जाए कि ये अरविंद केजडीवाल का राजनीतिक पैंतरा है? उन्हें लग रहा है कि एक नास्तिक को आम जनता नहीं स्वीकारेगी और आस्तिक बहुसंख्यक उनके ख़िलाफ मोर्चेबंदी कर सकते हैं इसलिए बेहतर है कि आस्तिक हो जाओ।

मुझे लगता है कि अपने विचारों से उनका ये सबसे बड़ा ज्ञात विचलन है और इसे दर्ज़ किया जाना चाहिए। अगर व्यावहारिक राजनीति का तकाज़ा मानकर वे आस्तिकता को स्वीकार कर रहे हैं तो कृपया ढोंग मत कीजिए। फिर कल को व्यावहारिक राजनीति की ज़रूरियात केजड़ीवाल और उनकी नीतियों में और भी विचलन पैदा कर सकती हैं और ये चिंता का विषय है।

आस्तकिता कोई अपराध नहीं है, मगर भारतीय राजनीति में उसका इस्तेमाल लोगों की धार्मिक भावनाएं भड़काने और दोहन करने के लिए जमकर किया जाता है। केजड़ीवाल नई राजनीतिक संस्कृति की बात करते रहे हैं मगर उनकी भी कई तस्वीरें इस तरह की छप चुकी हैं इसलिए कहीं ऐसा न हो कि इसकी शुरुआत आप में भी हो रही हो।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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