‘कोटा’ की आग में ‘दहका’ यूपी, जनता फिर हतप्रभ

एफडीआई पर उत्तर प्रदेश के राजनैतिक दलों के रवैये से हैरान प्रदेश की जनता को प्रोन्नति में आरक्षण के नाम पर एक बार फिर विभिन्न नेताओं का असली चेहरा देखने को मिल रहा है। एफडीआई के समय कांग्रेस-सपा और बसपा ने एकजुट होकर भाजपा को पटकनी दी थी, लेकिन प्रोन्नति में आरक्षण के मसले पर इन दलों में फिर से बिखराव दिखने लगा है। सपा और बसपा बिल्कुल विपरीत लाइन पर चल रहे हैं, वहीं कांग्रेस और भाजपा ठहर कर हवा का रूख भांपने में लगे है। भाजपा कुछ संशोधनों के साथ आरक्षण के समर्थन की बात कर रही है, लेकिन उसने अपने पक्ष साफ नहीं किया है।

कांग्रेस के लिए यह लड़ाई इसलिये गंभीर होती जा रही है क्योंकि उसे समाजवादी पार्टी और बसपा दोनों का ही समर्थन मिला हुआ है, वह जिसके खिलाफ जायेगी, वह उसे आंखें दिखाने लगेगा। सपा प्रोन्नति में आरक्षण का विरोध कर रही है तो बसपा इसके समर्थन में बिल लाने के लिए कांग्रेस पर दबाव बनाये हुये हैं। वैसे इस समय पलड़ा बसपा का भारी लग रहा है। राज्यसभा में एफडीआई के मसले पर बसपा ने केन्द्र सरकार के पक्ष में मतदान किया था तभी से यह लगने लगा था कि कांग्रेस और बसपा के बीच प्रोन्नति में आरक्षण से संबंधित बिल लाने के लिए डील हो चुकी थी। वहीं समाजवादी पार्टी की नजर में प्रोन्नति में आरक्षण वैमनस्यता फैलाने की चाल है। एक तरफ सपा प्रोन्नति में आरक्षण की मुखालफत कर रही है तो दूसरी तरफ नौकरियों में मुस्लिमों को आरक्षण का बिगुल भी बजा रही है। एफडीआई पर समाजवादी विचारधारा को तिलाजंलि देकर कांग्रेस का साथ देने वाले भाजपा सुप्रीमो को प्रोन्नति में आरक्षण के मसले पर कांग्रेस ओर भाजपा में सांठगाठ भी दिख रही है तो मायावती कांग्रेस से धमकी की भाषा में बात कर रही हैं।

बात समाजवादी पार्टी की कि जाये तो उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव चाहते हैं कि प्रोन्नति में आरक्षण की आग को मुसलमानों को आरक्षण की मांग करके ठंडा कर दिया जाये। इसीलिए वह मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने की लड़ाई लड़ते रहने का भरोसा दिलाते हुए प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को वैमनस्यता फैलाने वाली खतरनाक चाल बताते हैं। इसके सहारे वह अपनी राजनैतिक रोटियां भी सेंकना चाहते हैं। कुछ दिनों पूर्व अपने का प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं होने की बात कहने वाले मुलायम एक बार फिर तीसरे मोर्चे की वकालत करने लगे हैं। वह उम्मीद जताते हैं कि सन् 2014 के चुनावों में भाजपा और कांग्रेस दोनों सत्ता में नहीं आ पाएगी। तीसरे मोर्चे की बात उन्होंने लखनऊ में की। मुस्लिमों को लुभाने के लिए मुलायम सिर्फ अपने श्रीमुख से ही कुछ नहीं कर रहे बल्कि मुस्लिमों के बीच पैठ बनाने के लिए उनके लिए तमाम घोषणाएं करने के अलावा उनसे मेलजोल भी बढ़ा रहे हैं। इसी कड़ी में गति दिनों मुलायम ने मौअल्लिमे उर्दू एसोसियेशन के अध्यक्ष ताजबर एहतिशाम के नेतृत्व में उर्दू मोअल्लिम डिग्रीधारकों तथा राकेश कुमार मौर्य अध्यक्ष आश्रम पद्धति इंटर कालेज शिक्षक कल्याण समिति, उ0प्र0 के प्रतिनिधि भी मिलें। काजी शहर कानपुर के जनाब आलम रजा नूरी ने उर्दू मोअल्लिमों के सिलसिले में नेता जी से भेंट की।

मुलायम सिंह यादव ने कहा कि प्रोन्नति में आरक्षण बहुत खतरनाक है। इससे समाज में वैमनस्यता और विषमता बढ़ेगी। इस व्यवस्था से जूनियर सीनियर और सीनियर जूनियर हो जाएगा। यह समाज को तोड़ने वाली चाल है। समाजवादी पार्टी इसीलिए इस संबंध में लाए गए संविधान संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है। यह विधेयक सामाजिक न्याय की अवधारणा के भी खिलाफ हैं। श्री यादव ने कहा कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग बनाया। सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुस्लिमों की हालत दलितों से भी ज्यादा खराब है। संसद में मुस्लिमों को नौकरियों में आरक्षण की मॉग समाजवादी पार्टी ने उठाई। उन्होंने कहा सरकार को मजबूर होकर एक दिन मुस्लिमों को आरक्षण का लाभ देना ही होगा। इसके मिलने तक हमारी लड़ाई भी जारी रहेगी। उन्होंने मुस्लिमों को याद दिलाया कि स्वंय उन्होंने पिछड़ों के हक की बरसों तक लड़ाई लड़ी, तब मंडल कमीशन की सिफारिशें स्वीकार की गई। इसके लिए हमने गिरफ्तारियॉ दी थी। लाठियॉ खाई थीं। चौधरी चरण सिंह जी को भी मण्डल कमीशन की सिफारिशें लागू कराने का श्रेय जाता है।

श्री यादव ने कहा मुस्लिमों को भी एक दिन जरूर आरक्षण मिलेगा। सपा प्रमुख ने कहा कि कांग्रेस और भाजपा के बीच नूरा कुश्ती चल रही है। दोनों एक दूसरे से मिले हुए हैं। ये लोग तीसरे फ्रंट को नहीं चाहते हैं। आजादी के बाद केन्द्र में 1977, 1993 और 2003 में तीसरे मोर्चे की सरकारें बनीं। वे स्वंय दो बार मुख्यमंत्री तथा केन्द्र में रक्षा मंत्री बनें। उन्होंने आशंका जताई कि कहीं कांग्रेस ही भाजपा केा केन्द्र की सत्ता में न बिठा दे। लेकिन उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं होने पाएगा। केन्द्र में सन् 2014 में न तो कांग्रेस की सरकार बनेगी और न ही भाजपा की। तीसरा मोर्चा चुनाव बाद स्वंय गठित हो जाएगा। श्री यादव ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे प्रोन्नति में आरक्षण से होने वाली सामाजिक वैमनस्यता के बारे में जनता को जागरूक करें, इसके साथ ही किसानों की कर्ज माफी, मुफ्त सिंचाई सुविधा, बेकारी भत्ता, कन्या धन आदि के संबंध में जनता के बीच जाकर बताएं कि समाजवादी सरकार ने उनके हित में क्या क्या कदम उठाए हैं। पार्टी अपने चुनाव घोषणापत्र के वायदे पूरे कर रही है। मुफ्त पढ़ाई और दवाई की सुविधा है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपने अपने क्षेत्रों में जाकर सन् 2014 की सफलता के लिए संकल्पित होकर जिम्मेदारी से कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने निष्ठा से काम करने के लिए ‘‘जो जहॉ जब’’ का मंत्र दिया।

बात बसपा की कि जाए तो बसपा कोटा विधेयक पर कांग्रेस की लटकाऊ नीति से दुखी है। सपा की नजर में कांग्रेस और भाजपा के बीच नूरा कुश्ती चल रही है तो बसपा की सोच और समझ कहती है कि भाजपा और समाजवादी पार्टी के नेता एक हैं। पार्टी सुप्रीमों हर हाल में विधेयक पास कराना चाहती हैं। इसके लिए वह सख्त कदम उठाने की बात भी करती हैं। उन्हें प्रोन्नति में आरक्षण के नाम पर सदन में जो कुछ होता है वह कतई अच्छा नहीं लगता है। बसपा को लगता है कि प्रोन्नति में आरक्षण के मसले को टालने के लिए ही भाजपा वालमार्ट का रोना रोती है। आरक्षण की आग कितनी जबर्दस्त है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब पिछले सत्र में यह विधयेक राज्यसभा में पेश किया जाने वाला था तो बसपा के सांसद अवतार सिंह और समाजवादी सांसद नरेश अग्रवाल के बीच हाथापाई की नौबत आ गई। भारत के संसदीय इतिहास में ऐसे मौके शायद ही कभी आए हों जब सम्मानित सदस्य हाथापाईं पर उतार आए हों।

इस हादसे के बाद बसपा सांसद अवतार सिंह ने आरोप लगाया था कि सपा सांसद नरेश अग्रवाल विधेयक की प्रति फाड़ने की कोशिश कर रहे थे, जबकि नरेश अग्रवाल का कहना था कि वह बिल का विरोध करने के लिए वेल की तरफ जा रहे थे। उनका कहना था कि बसपा सांसद ने अपनी सुप्रीमो के ईशारे पर यह सब तमाशा किया जो असंसदीय था। मायावती तो बार-बार एक ही बात दोहराती है कि कि संसद में मौजूद स्थिति को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि यह विधेयक इतनी आसानी से पास हो जाएगा। यदि अन्य दलों के नेता हमारी मांग पर ध्यान नहीं देते हैं औेर संप्रग इसे पारित नहीं करा पाता है तो हम समझेंगे कि वे नहीं चाहते कि अनुसूचित जाति जनजाति के लोग अपने पैरों पर खड़े हों या पदोन्नति का लाभ हासिल करें। मायावती कहती हैं कि इस मुद्दे पर पिछले सत्र में पहले ही बहस हो चुकी है। ऐसे में विधेयक को पारित कराने में केवल कुछ समय की ही चर्चा काफी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी दोहराया कि उनकी पार्टी पदोन्नतियों में अन्य पिछड़ा वर्ग या धार्मिक अल्पसंख्यकों को आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। इसका स्वागत करने वाली बसपा पहली पार्टी होगी।

सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण की आग ने सरकारी कार्यालयों से लेकर गांव-चौपालों तक में हलचल पैदा कर दी है। पिछड़ी जातियां अपने हिसाब से तो दलित समुदाय अपने तरीके से आरक्षण चाहता है। गौरतलब हो पिछड़ी जातियों को उत्तर भारत में पिछले दो दशकों से सत्ता हासिल है। सत्ता के सहारे पिछड़ी जातियों के लोगों ने खूब फायदा उठाया है। सत्ता के साथ उन्होंने खेती की जमीन पर भी वर्चस्व बना लिया। पिछड़े के चलते दलित जाति के लोग छोटे किसान या खेतिहर मजदूर बन कर रह गए। यही वजह है वर्षों से दलित और पिछड़े अपने हित साधने के लिए आमने-सामने आते रहते हैं। इसी लिए सरकारी नौकरियों में दलितों को आरक्षण का सवाल एक आग की तरह फैलता जा रहा है। पिछड़ी जातियों के नेता या तो दलितों को आरक्षण का विरोध कर रहे हैं या फिर अपने लिए भी आरक्षण की मांग पर जोर दे रहे हैं। मनमोहन सरकार अदालत से बचने के लिए संविधान में संशोधन करके दलितों के लिए प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था करना चाहती है, लेकिन इसके पीछे की उसकी मंशा को समझा जा सकता है। हमारे देश में आरक्षण इतना आसान राजनैतिक हथियार बन गया है कि हर पार्टी इसे चुनाव दर चुनाव विस्तार देती जा रही है, जबकि बाबा अंबेडकर जैसे लोग कभी भी आरक्षण को जातीय-बिरादरी में फैली दुर्भावनाओं का स्थायी समाधान नहीं मानते थे।  

बहरहाल, प्रमोशन में आरक्षण का जो जिन्न बाहर आ गया है, वह जल्द बोतल में जाने वाला नहीं है। यह जिन्न तब कुछ माह पूर्व तब बाहर आया था, जब सरकारी नौकरियों की पदोन्नति में अनुसूचित जाति जनजाति को आरक्षण उपलब्ध कराते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को अपनी मंजूरी दे दी। यहां इस बात को भी अनेदखा नहीं किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की पिछली मायावती सरकार द्वारा लागू किए गये ऐसे ही एक फैसले को उच्चतम न्यायालय ने अप्रैल 2012 में अवैध कर देते हुए उसे रद्द कर दिया था। तब केन्द्र सरकार द्वारा प्रमोशन में आरक्षण विधेयक को शीघ्र अदालत के फैसले की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा था। यह विधेयक कानून तो बाद में बनेगा लेकिन इसके आते ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में तूफान आ गया है। समाजवादी पार्टी तो इस पर अपना विरोध जता ही रही है अलिखेश सरकार भी इस मुद्दे पर पीछे नहीं है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को प्रोन्नति में आरक्षण देने की चर्चा छिड़ते ही अन्य वर्ग के 18 लाख कर्मचारी नाराज हो गये हैं। कुछ माह पूर्व पहले भी प्रमोशन में रिजर्वेशन देने के विरोध में आपातकालीन सेवाओं को दोड़कर अन्य विभागों के लगभग 18 लाख कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे और अब फिर ऐसे हालात बनने लगे हैं। प्रमोशन में रिजर्वेशन के विरोध में गठित सर्वजन हिताय संघर्ष समिति के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि केन्द्र सरकार के निर्णय के विरोध में राज्य सरकार के लगभग 18 लाख कर्मचारी हड़ताल के अलावा भी विरोध के अन्य तरीके अपनाएंगे ताकि उनका हक नहीं मारा जाये।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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