क्या ऐसे महिला विरोधी अधिकारी को सस्पैंड नहीं होना चाहिए?

और जैसे कि दिल्ली पुलिस की अभी तक की बर्बरता काफ़ी नहीं थी…गुरुवार शाम एक नया मामला सामने आया…इंडिया गेट की ओर जाना चाह रहे कुछ युवक युवती जिनकी उम्र 18-25 साल के बीच थी को पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने पर रोक लिया गया…लेकिन जब वे लौट कर रीगल सिनेमा के पीछे से इंडिया गेट की ओर जाने लगे तो वहीं पर पुलिस ने उनको रोका…एक निकलते जुलूस के निकल जाने के बाद बेहद शांति से फुटपाथ पर खड़े इन युवक युवतियों को दिल्ली पुलिस ने बेदर्दी से मारा पीटा…बात यहीं नहीं थमी, लड़कियों को ग़ैरक़ानूनी ढंग से सूरज ढल जाने के बाद भी डीटेन किया गया…लेकिन बात इतनी भी नहीं रही…इन लोगों को बस के अंदर भी मारा पीटा गया…यहां तक कि बस में लड़कियों के होने के बाद भी बस की लाइट बुझा कर इनके साथ मारपीट की गई…गालियां बकी गईं…पुलिस ने इनको पार्लियामेंट स्ट्रीट या बाराखंभा थाने जो कि उस इलाके में पड़ते हैं न ले जाकर मंदिर मार्ग थाने ले जाकर बिठाया.

लौट कर आए ये बच्चे बेहद सहमे हुए थे…कुछ लड़कियां रो रहीं थी…लड़कियों को भी पुरुष पुलिसकर्मियों ने पीटा था…महिला कांस्टेबल मारपीट के बाद रास्ते में बस में सवार हुई…बताया जा रहा है कि ये कारनामा और बहादुरी भी दिल्ली पुलिस के महान वीर क्रांतिकारी पुलिस इंस्पेक्टर पार्लियामेंट मार्ग थाने के एसएचओ श्री श्री श्री दिनेश कुमार के नेतृत्व में अंजाम दिया गया…दिनेश कुमार का ये चौथा कारनामा है…उन पर आंच न आए इसलिए न केवल बच्चों को धमकाया गया…बल्कि उन्हें पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के कर्मियों के रोकने और मारपीट करने के बाद भी ले जाया गया मंदिर मार्ग थाने…
देखिए कि पुलिस और एसएचओ साहब ने किस कदर क़ानून तोड़ा…

1. महिलाओं को सूर्यास्त के बाद डीटेन किया गया, जो कि ग़ैरक़ानूनी है।
2. हिरासत में लिए गए बच्चों से मारपीट भी ग़ैरकानूनी है।
3. पुरुष पुलिसकर्मियों ने महिलाओं से मारपीट की जो कि ग़ैरक़ानूनी है।
4. बस में महिलाओं के होने के बावजूद लाइट्स बंद की गई, जो कि अमूमन बलात्कारी भी करते हैं।
5. बाराखंभा पुलिस स्टेशन बगल में होने के बावजूद 30 बच्चों को मंदिर मार्ग ले जाया गया।

क्या अब भी…इतने मामलों के बाद भी इस एसएचओ पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए…इसके खिलाफ़ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए…यही नहीं, एसएचओ दिनेश कुमार ने हमारे साथी Alok Dixit को झूठे केस में फंसाने की धमकी भी दे रखी है…क्या इस एसएचओ को क़ानून का पालन न करने…लगातार दुर्व्यवहार करने के बाद भी वर्दी पहनने की आज़ादी होनी चाहिए…? जो पुलिस अधिकारी ख़ुद ही ऐसा करें, वो क्या आपकी हमारी मदद कर पाएंगे…क्या ऐसे थाने में कोई महिला अपनी व्यथा लेकर जा सकती है…क्या ऐसे महिला विरोधी अधिकारी को सस्पैंड नहीं होना चाहिए?

युवा पत्रकार मयंक सक्‍सेना के फेसबुक वॉल से साभार.

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