क्या सारी कालिख एक बार में उतर सकती है?

कहीं पढ़ी हुई एक लाइन याद आती है “भूख हड़ताल से शरीर को तो कष्ट होता है लेकिन आत्मा एकदम झकाझक ड्राइक्लीन हो जाती है”. यह वाक्य विभिन्न धर्मों में मौजूद व्रत उपवासों के संदर्भ में कहीं गई थी. जिसमें सारे पाप या बुरे कर्मों को कोई उपरवाला केवल इसलिए माफ कर देता है, क्योंकि उसने एक दिन उसके नाम से “भूखा” रह लिया. यानी कुछ भी करने के बाद केवल एक बार हल्का सा प्रयास करने मात्र से ही सारे आरोपों से बरी हो जाते हैं. इस व्यवस्था पर सोचने के बाद मन में सवाल उठने ही लगता है क्या इस तरह के फलसफे को अच्छा और सच्चा तरीका माना जाए. जो भी हो मन और उसके तर्क इस तरीके को मानने से बगावत कर देते हैं.

इन्हीं तर्कों से ही पिछले  कुछ दिन से जो तारीफ़ एक न्यूज़ चैनल और उसके इंटरव्यू वाले संपादक की हो रही है, उन सबकों सवालों के घेरे में खड़ा करने का मन होता है. चैनल के प्राइम टाइम स्लाट पर दिल्ली बलात्कार कांड की पीड़ित “दामिनी” के पुरुष मित्र और उस घटना के वक्त उसके साथ बस में सवार लड़के का पहला साक्षात्कार दिखाया जाता है. जाहिर सी बात है कि जिसे मुद्दे को लेकर दिल्ली और देश के (खास तौर पर हिंदी पट्टी) गांवों कस्बों में प्रदर्शन हो रहे हों, उस पर लोगों की निगाहें लगेंगी ही और हुआ भी वही. लड़के द्वारा उस घटना के विवरण जिसमें उस सड़क पर चल रहे लोगों और पुलिस द्वारा मदद ना करने की बातें मुख्य रूप से शामिल थीं. जो आलीशान ड्राइंगरूम से लेकर कस्बे की चौपाल तक में बैठे लोगों की भावनाओं को हिला दे रही थी. लेकिन इन बातों ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके बारे में आम लोग रोज़ सामना ना करते हों. किसी भी दुर्घटना या हादसे में ऐसी ही बातों का अनुभव हर किसी को कभी ना कभी होता ही है.

इस एक इंटरव्यू ने जहाँ सोशल मीडिया और वेब जर्नलिज्म में लहर फैला दी कि यह पत्रकारिता का एक महान कर्म है. जिसमें एक चैनल और उसके संपादक ने पुलिस और समाज को उघाड़कर रख दिया. आज के टीआरपी की खातिर जिस्म से लेकर रूह तक परोसने को बेचैन रहती इलेक्ट्रानिक मीडिया के दौर में भी चलिए अगर इस एक इंटरव्यू को बहुत अच्छा भी मान लिया जाए तो क्या इससे जुड़े लोगों के स्याह पक्ष देखे जाने बंद कर देने चाहिए या उससे नज़रें फेर लेनी चाहिए.

अभी बहुत ज्यादा महीने नहीं बीते होंगे जब इसी दिल्ली में जहाँ महिला अधिकारों और यौन हिंसा को लेकर आजकल तूफ़ान मचा हुआ है वहीँ उसी दिल्ली की एक महिला अध्यापिका को एक चैनल द्वारा स्टिंग करके शिक्षण कार्य की आड़ में देह व्यापार चलाने वाला बताया गया था. और चैनल के ही उकसावे में जैसे इस समय इंटरव्यू को देखकर लोग भावुक हुए जा रहे हैं, ऐसे ही भावुक होकर उस महिला की बिना सच्चाई परखे बुरी तरह पिटाई और कपडे़ तक फाड़ देने वाली भींड जुट गई थी. बाद में जांच में पता चला कि यह सारा मामला झूठा था और उस चैनल के “पत्रकार” ने जानबूझकर फंसाने के लिए यह सारा ड्रामा रचा था. इलेक्ट्रानिक मीडिया में जहाँ हमेशा नेशनल का रोना रोया जाता है और जहाँ “स्लाट” कम होने का बहाना किया जाता है और जिसकी हर खबर पर संपादकीय जिम्मेदारी तय होती है. वहां के संपादक को कैसे इस पूरे कांड में बरी मान लिया जाए. इस चैनल के तत्कालीन संपादक वही रहे जो आज चर्चा में हैं. उक्त चैनल तो बंद हो गया लेकिन यह कई जगहों को पार करते हुए दूसरी जगह पहुँच गये.

अब उन्होंने एक इंटरव्यू लेकर अपने आप को महिला यौन उत्पीड़न की लड़ाई से जोड़ लिया और कुछ बतकहियों को माने तो इन्होंने हिम्मत वाली पत्रकारिता भी कर डाली है. यह भी एक अलग बात है कि जिस चैनल पर “पत्रकारिता” हुई उसी चैनल और इन संपादक का नाम एक बड़े नेता से वसूली करने के आरोप में फंसा हुआ है. इस मामलें में बकायदा वीडियो फुटेज बनी और पुलिस केस भी हो चुका है. इस मामलें को अगर एकबारगी के लिए अगर अपवाद भी मान लिया जाए तो दिल्ली में ही महिला शिक्षिका वाले मामले को तो महिला के साथ अपराध की श्रेणी में रखा ही जाना होगा. और इस मामले में असंवेदनशील व्यक्ति को कैसे पत्रकार और वह भी महिला उत्पीड़न के मामलें में बहादुरी वाली पत्रकारिता करने का तमगा दिया जा सकता है.

आज की पत्रकारिता को अगर पैमाना मापकर तौला मापा जाए तो यह सारी कवायद टीआरपी और स्वयं रक्षा से ज्यादा नहीं दिखती है. कई सारे आरोपों का सामना करने वाले चैनल व संपादक को यह मुद्दा टीआरपी और उनकी बदनामी के रक्षा कवच सरीखा लगा. जिसका पूरा उपयोग यह लोग करेंगे ही. शायद याद हो कि जब चैनल पर घूसकांड का मामला उछला था तब लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला वगैरह इनकी ओर से बताने की कोशिश की गई थी. जिसका कड़ा विरोध पत्रकारों की ओर से हुआ था. लेकिन अब इस एक इंटरव्यू के दौर में इन पर उठी एक ऊँगली भी बड़ी आसानी के साथ “हमला” सिद्ध की जा सकती है. इस पूरे मामले को जिस  तरह से चाहे देखने के लिए  हर कोई स्वतंत्र है.लेकिन  इससे एक सवाल तो उठता ही है कि क्या एक ही बार सारी कालिख  उतर सकती है.

लेखक हरिशंकर शाही युवा पत्रकार हैं. सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियां करते रहते हैं.

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