लगातार फांसी और castration की मांग करने वालों से मेरे कुछ सवाल हैं : बलात्कार के दोषियों के लिए अगर फांसी जैसा एक कड़ा कानून बना भी दिया जाए तो क्या उसके बाद बंद दरवाजों के पीछे हुए वो मामले जिनकी लोक लाज की वजह से रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई जाती, जिसमे एक पति का अपनी पत्नी की इच्छा के विरूद्ध उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करना भी आता है, क्या इनकी संख्या में कमी आएगी?
आंकड़ों के हिसाब से भी भारतीय बच्चों के एक बहुत बड़े वर्ग को शारीरिक शोषण से गुज़रना पड़ता है, और ये करने वाले 90 प्रतिशत से भी ज्यादा मामलों में उनके सगे रिश्तेदार ही होते हैं, क्या कड़े कानून बन जाने से इन मामलों में कमी आएगी?
भारतीय पुरुष जो महिलाओं को देख सीटी बजाते हैं, अश्लील टिपण्णी करते हैं, जिनकी भाषा का अहम हिस्सा वो गालियाँ होती हैं जो माँ बहन से शुरू होती हैं, क्या इस प्रवृति में सुधार होगा?
हम अरब देशों में लागू किये कड़े कानूनों से सीख लेने को कहते हैं, क्या सचमुच हम अपने देश में एक तानाशाही रवैये को खुद प्रचारित करेंगे? वहां कड़े क़ानून होने के बावजूद भारत, बांग्लादेश जैसे देशों से मानव तस्करी में जिन लड़कियों को हरम में पहुंचा दिया जाता है, क्या आपको ये मालूम नहीं?
पुलिस, न्यायपालिका और सरकार को सवाल करने से पहले हम में से कितने लोगों ने खुद से सवाल किया है की क्या फांसी ही आखिरी रास्ता है?
क्या इसके बाद बालात्कार के मामले कम हो जायेंगे?
क्या ये एक न्याय पिछले और आगे होने वाले सारे ऐसे मामलों में तर्कसंगत है?
क्या आपके घर में गाली-गलौज करते वक़्त आपने सामने वाले को रोका?
क्या जब आपका कोई दोस्त किसी लड़की के लिए अश्लील टिपण्णी करता है तो आप उसे डांटते हैं?
क्या आप अपने पिता, भाई, जीजा, चाचा को घर की महिलाओं पर हिंसा करने से रोकते हैं?
हम जब सफाई की बात करते हैं, तब सबसे पहले अपनी सफाई करते हैं, तो कैसे आप एक ऐसी मानसिकता जिसे खुद शुद्धिकरण की ज़रूरत है, उस पर काम किये बिना, शासन और न्यायपालिका से देश की सफाई की मांग कर कर रहे हैं?
इला जोशी के फेसबुक वॉल से साभार.






