क्‍या भास्‍कर, चंडीगढ़ ने अखबार की जगह पत्रकारिता को ही बेचने की कसम खा ली है!

मीडिया घराने किस कदर बिक चुके हैं इसका जीता जागता उदाहरण बना है दैनिक भास्‍कर, चंडीगढ़. दैनिक जागरण की तरह यह अखबार भी सही तथ्‍य को लिखने की बजाय अपने फायदे और नुकसान के हिसाब से लिखता है. रेलमंत्री पवन बंसल के भांजे के घूस कांड में छापे की खबर लीक करने का आरोप सीबीआई के ही डीआईजी महेश अग्रवाल पर लग रहा है. सीबीआई के ही एक इंस्‍पेक्‍टर बलबीर सिंह ने भी महेश अग्रवाल पर आरोप लगाया है कि उन्‍होंने जानबूझ कर लेट किया ताकि आरोपी सबूत खुद-बुर्द कर सकें.

डीआईजी महेश अग्रवाल पर बंसल को पूरी तरह बचाने का आरोप लग रहा है. महेश अग्रवाल की भूमिका सामने आने के बाद भाजपाइयों ने डीआजी के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर चंडीगढ़ में सीबीआई कार्यालय के सामने जोरदार प्रदर्शन किया. यह प्रदर्शन सभी चैनलों पर प्रसारित हुआ तथा चंडीगढ़ से प्रकाशित अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित भी गई, लेकिन दैनिक भास्‍कर में पूरी खबर ही उलट दी गई. इस खबर में कहीं पर भी सी‍बीआई के डीआईजी का नाम नहीं लिखा गया, जबकि पूरा प्रदर्शन उन्‍हीं के खिलाफ था. 

बताया जा रहा है कि लोगों को गुमराह करने के लिए इस विरोध की खबर को भी बीजेपी की गुटबाजी से जोड़ दिया गया है. जबकि खबर यह थी कि भाजपाई सीबीआई के डीआईजी महेश अग्रवाल की भूमिका का विरोध करते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थे. लेकिन भास्‍कर ने खबर में कहीं पर भी महेश अग्रवाल के नाम का जिक्र नहीं किया. यहां तक की पूरा मामले में सीबीआई की भूमिका पर सवाल उठाया जबकि सवाल केवल और केवल महेश अग्रवाल की भूमिका पर था.

लेकिन दैनिक भास्‍कर पत्रकारिता की हत्‍या करते हुए सही तथ्‍य को छुपा ले गया और भाजपा के विरोध प्रदर्शन को कवर करने की बजाय जान बूझकर और सोची समझी साजिश के तहत गुटबाजी करार दे दिया. अगर यह गुटबाजी थी भी तो विरोध प्रदर्शन जिसके खिलाफ हुआ, उसका नाम तो आना चाहिए था, लेकिन धीमान एंड कंपनी ने पत्रकारिता को ही खुर्द बुर्द कर दिया. कमलेश सिंह के दौर भास्‍कर ने नार्थ रीजन में पाठकों से जो इज्‍जत और सम्‍मान पाया था, धीमान उसे धीरे धीरे बरबाद करते जा रहे हैं.

सच का आईना दिखाने का दावा करने वाला भास्‍कर समूह सच तो दूर की बात है, आईने पर ही पर्दा डालता नजर आ रहा है. पाठकों के बीच इस अखबार की खबर को लेकर थू-थू हो रही है. वैसे सूत्रों का कहना है कि रिपोर्टरों ने सही खबर लिखने की कोशिश की परन्‍तु उनको फरमान सुना दिया गया कि अगर नौकरी बचानी है तो महेश अग्रवाल का नाम मत छापो. बताया जा रहा है कि इसके बाद पूरी खबर ही पलट दी गई. सच्‍चाई को खुद बुर्द और पत्रकारिता को बदनाम कर दिया गया. पाठक वर्ग भी अखबार को कोसता नजर आया.

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