गाजीपुर स्थित दूसरा ताजमहल देता है पवित्र प्रेम की प्रेरणा

प्रेम का इतिहास लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, हीर-रांझा जैसे बेशुमार प्रमियों की अनूठी प्रेम दास्तां से भरा पड़ा है। इन अनूठी प्रेम कहानियों में मुमताज और शाहजहां की प्रेम दास्तां आज भी ताजमहल के रूप में दुनिया के सामने है। अपनी प्रेमिका मुमताज की याद में मुगल बादशाह शाहजहां ने ताजमहल की तामिर कराकर जहां अपने अनूठे प्रेम को अमर कर दिया वहीं गाजीपुर के एक मामूली किसान ने अपनी पत्नी की याद में भव्य मंदिर बना डाला है। जी हां, गाजीपुर के इस शाहजहां ने अपनी पत्नी की मौत के बाद उसकी स्मृति को अमर रखने के लिए न सिर्फ पत्नी मंदिर बनवा रखा डाला बल्कि बकायदा मंदिर में पत्नी की मूर्ति स्थापित कर अपने पवित्र प्रेम की मिशाल कायम की है।गाजीपुर का ये पत्नी मंदिर दूर दूर तक लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। ‘‘न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बन्धन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन’’ गाजीपुर के करण्डा क्षेत्र के एक मामूली किसान रामनाथ यादव की जिन्दगी में ये बात पूरी तरह खरी साबित हुई। जीवन के अन्तिम पड़ाव के करीब होने के बावजूद उनके जेहन में अपनी पत्नी की याद बनी रहीं और ये स्मृतियां हमेशा अमर रहें इसी ख्वाहिश के चलते उन्होनें अनूठा कदम उठा डाला। आज से करीब 17साल पहले रामनाथ की शरीकेहयात उनका साथ छोड़ भगवान को प्यारी हो गई। पत्नी सनजाफी देवी की मौत के बाद जिन्दगी की डगर पर अकेले खड़े रामनाथ ने प्रिय पत्नी की स्मृतियों को सहेजने का मन बना लिया। ऐसे में उनका प्रेम अमर रहे की बुनियाद पर उन्होने पत्नी मंदिर का निर्माण करवा डाला। मंदिर में तमाम देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ मुख्य भवन में सनजाफी देवी की प्रतिमा भी स्थापित कर डाली तब से आज तक रामनाथ के परिवार वाले इस मंदिर में पूजा अर्चना करते आ रहे है। शाहजहां की तर्ज पर अपने गांव में पत्नी की याद में मंदिर का निर्माण कराने वाले रामनाथ के फैसले को पहले तो क्षेत्र के लोगों ने अजीब नजरों से देखा लेकिन उनके इस कदम में उनके तीनों लड़के उनके साथ खड़े रहे। 3मई1995 को पत्नी सनजाफी देवी के निधन के बाद अक्टूबर 1995 से शुरू हुआ मंदिर का निर्माण कार्य सितम्बर 1997 को खत्म हआ। मंदिर में बकायदा पत्नी की प्रतिमा स्थापित कर रामनाथ सनजाफी देवी की पूजा भी करते रहे। लेकिन लम्बी बिमारी के चलते लखनउ में उन्हे अपना स्थायी आशियाना बनाना पड़ा जहां सालभर भर पहले उनकी मृत्यु हो गई। बावजूद इसके उनकी गैर मौजूदगी में भी ये सिलसिला नही टूटा। अब गांव में रह रहे उनके पुत्र अपनी मां को देवी मानकर पूजा कर रहे है। प्रेम में एक दूसरे के लिए सबकुछ न्यौछावर कर देने की मिशाल नई नही है और एक दूजे के लिए अपना सबकुछ समर्पित करदेने की परम्परा भी न जाने कब से चली आ रही है। शायद रामनाथ भी प्रेम के उसी डगर के राही थे और पत्नी के निधन के बाद उनकी याद में मंदिर बनाकर उन्होने इस बात को सच साबित किया । ऐसे में रामनाथ का पवित्र प्रेम न जाने कितने ही प्रेमियों को पवित्रता और समर्पण की प्रेरणा देता रहेगा। फिलहाल शाहजहां की तर्ज पर अपनी प्रेयसी की स्मृतियों को अमर रखने की ख्वाहिश के साथ बनवाया गया यह पत्नी मंदिर सचमुच गाजीपुर के लोगों के बीच आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है और यही वजह है कि लोग रामनाथ के अमर प्रेम के कायल बनते जा रहे है।

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