जनसंदेश टाइम्‍स, इलाहाबाद से एडिटोरियल हेड रवि प्रकाश मौर्य का इस्तीफा

इलाहाबाद से खबर है कि जनसंदेश टाइम्स में एडिटोरियल हेड के रूप में कार्य कर रहे रवि प्रकाश मौर्य ने यहां के जीएम रंजीत कुमार मौर्य से विवाद होने के बाद इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने रवि मौर्या से विज्ञापन की एक खबर लगाने को कहा था जिसे उन्होंने लगाने से मना कर दिया था। यह बात सीईओ व डायरेक्टर तक पहुंची तो रवि मौर्या ने सीईओ को इस्तीफा भेज दिया। बता दें कि करीब दो माह पूर्व सीईओ आरपी सिंह से विवाद के होने बाद यहां के सम्पादकीय प्रभारी आनंद नारायण शुक्ल ने भी इस्तीफा दे दिया था और अपनी टीम लेकर सिटी टाइम्स चले गये।

विकट परिस्थितियों में रवि मौर्या ने जनसंदेश को संकट से उबारा और गिने-चुने कर्मचारियों के सहारे अपने दम पर अखबार निकाला। बनारस के मैनेजमेंट ने भी इसके लिये रवि मौर्या की जमकर तारीफ की क्योंकि इससे पूर्व जनसंदेश के लिये ऐसा किसी ने नहीं किया था। गोरखपुर में शैलेन्द्र मणि की टीम के विद्रोह के बाद वहां छह दिन अखबार नहीं निकला था। जनसंदेश के कर्मचारी अभी भी नहीं समझ पा रहे हैं कि जिस रवि ने जनसंदेश को डूबने से बचाया और जो जनसंदेश के चक्कर में आनंद शुक्ला से मुकदमा लड़ रहा है, उसका एहसान मानने के बजाय उसका इस्तीफा कैसे स्वीकार कर लिया गया। कहीं यह सुनियोजित तो नहीं था।

बता दें कि रवि प्रकाश मौर्य की गिनती एक तेज-तर्रार पत्रकार और लेखक के रूप में होती है। रवि मौर्या इससे पूर्व दैनिक जागरण, हरिभूमि, हर शनिवार साप्ताहिक पत्रिका में काम करने के साथ कई पत्रिकाओं का संपादन कर चुके हैं। 2005 में उनकी एक किताब ‘सप्त शिखरों से साक्षात्कार’ प्रकाशित हो चुकी है। जल्द ही पाठकों के हाथों में उनकी चार किताबें- मच्छरों की मीटिंग (व्यंग्य संग्रह), साढ़े सात चरित्र (कहानी संग्रह) व दो उपन्यास ‘जीवन युद्ध’ व ‘पापा’ भी होंगी। इसके अलावा अभी हाल ही में आई चर्चित नई पत्रिका ‘प्रयाग’ (अर्धवार्षिक) के वह सह संपादक है।

इस्तीफे की खबर की पुष्टि के लिये जब रवि मौर्या को फोन किया गया तो उन्होंने बताया कि कुछ समय पूर्व पायनियर से आये विज्ञापन प्रबंधक प्रमोद यादव का हस्तक्षेप सम्पादकीय विभाग में इतना बढ़ गया था कि काम करना मुश्किल हो गया था। ऑफिस के कर्मचारी तक उन्हें मिनी जीएम कहते हैं। जीएम रंजीत मौर्या के पास अखबार का कोई अनुभव न होने से प्रमोद जितना कहते हैं, वह उतना ही करते हैं। प्रमोद की बात मानने की दूसरी वजह यह है कि प्रमोद को रंजीत के भाई व लखनऊ के जीएम विनीत मौर्या ने ज्वाइन करवाया है, तीसरा इनके सबसे बड़े भाई व डायरेक्टर रवीन्द्र मौर्या भी प्रमोद की ही सुनते हैं। प्रमोद के बेलगाम होने की यही वजह है। दूसरी ओर बनारस से डिमोट कर इलाहाबाद भेजे गये आशीष बागची भी अपने अस्तित्व के चक्कर में प्रमोद की ही बात मानने को मजबूर हैं। ऐसी परिस्थिति में मेरे लिये काम करना असंभव हो गया था इसलिये इस्तीफा दे दिया।
 

रवि मौर्या ने कुरेदने पर कुछ और भी खुलासे किये। आशीष बागची ने आने के बाद से ही रवि मौर्या के ऊपर दबाव बनाना शुरू किया कि वह आनंद शुक्ला के खिलाफ दर्ज कराये गये मुकदमे को वापस ले लें और उनसे समझौता कर लें। यही नहीं, अन्य लोगों से भी यह कहते रहे कि वे रवि को समझाएं। खिसियाये रवि मौर्या ने इसकी शिकायत सीईओ आरपी सिंह से कर दी। हतप्रभ सीईओ ने इस हिमाकत की चर्चा मालिक अनुराग कुशवाहा से की। नतीजतन रंजीत व बागची को जमकर डांट पड़ी। इससे वे रवि मौर्या से खुन्नस रखने लगे। इसके बाद बागची ने जागरण की वेबसाइट से खबर उड़ाकर जनसंदेश में छपवाने का कुचक्र रचा।

रवि मौर्या ने इसकी शिकायत तत्काल रंजीत मौर्या से की तो उन्होंने कोई सुनवाई नहीं की क्योंकि वह पहले से ही रवि से भिन्नाये थे। इसके बाद रवि मौर्या ने इसकी शिकायत सीईओ आरपी सिंह से कर दी तो उन्होंने इसे बेहद संगीन अपराध मानते हुये रंजीत मौर्या व बागची को दुबारा सख्त हिदायत दी कि अब आइंदा ऐसा नहीं होना चाहिये। जागरण ने मुकदमा ठोंका तो कंपनी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। ये लोग तभी से रवि मौर्या से खुन्नस खाये थे, वहीं प्रमोद की राह में भी रवि मौर्या ही सबसे बड़े रोड़ा थे। फिर एक षडयंत्र के तहत रवि मौर्या को इस्तीफे के लिये मजबूर कर दिया गया। रवि मौर्या ने बताया कि इस्तीफे के बाद वह कहीं और ज्वाइन करने के बजाय अपना पूरा समय साहित्य सेवा में लगायेंगे।

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