जागरण और हिंदुस्तान के क्राइम रिपोर्टर पुष्‍प सवेरा के डाइरेक्‍टर को छोड़ देने के पक्ष में थे

: जागरण, हिंदुस्तान जैसे अखबार जो महज विज्ञापन के लिए नीतियां बदल लेते हैं वो मैनेज क्यों नहीं हुए : मीडिया में सवाल उठ रहे हैं कि अरबों-खरबों रुपये की सम्पत्ति, अखबार संचालक और प्रतिवर्ष सात करोड़ रुपये के देशभर के अखबारों को विज्ञापन देने वाला आगरा का पुष्पांजलि समूह मामूली से आरोप में फंसे अपने निदेशक की बदनामी क्यों नहीं रोक पाया। जागरण, हिंदुस्तान जैसे अखबार जो महज विज्ञापन के लिए नीतियां बदल लेते हैं वो मैनेज क्यों नहीं हुए।

विज्ञापन एजेंसी के कार्यालय में अपनी सहकर्मी के साथ जाना अपराध तो नहीं, जो कई घंटे का हाईप्रोफाइल ड्रामा बना दिया गया। चंद रुपयों पर ईमान बेचने वाली पुलिस क्यों अड़ी रही, जब निदेशक की रिहाई की स्थिति बनी तो एक फोटोग्राफर ने क्यों हड़बड़ी दिखाई। अखबार के एक अंक की उम्र ज्यादा से ज्यादा एक दिन होती है तो क्यों पाठकों को बार-बार ग्रुप का अखबार याद दिला रहा है।

पुष्प सवेरा, आगरा का अकेला सिंगल एडीशन अखबार है जो लोगों को पसंद आ रहा है और आज 15000 का सर्कुलेशन पा चुका है। इसीलिये यह बड़े अखबारों की गले की फांस है। नामचीन बिल्डर का यह अखबार संपादकीय विभाग की स्वतंत्रता के लिए भी ख्याति पा रहा है, मतलब कि कोई हस्तक्षेप नहीं है। समूह के निदेशक बीडी अग्रवाल की पारिवारिक प्रतिष्ठा है और वह तमाम सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करते हैं। आरोपित निदेशक और उनके भाई का बिजनेस कौशल बेहतरीन है। पिछले दिनों इसी अखबार के निदेशक को आरोपों में फंसा दिया गया कि जब वह एक विज्ञापन एजेंसी के दफ्तर में थे। यहीं ग्रुप के कर्ताधर्ताओं से चूक हो गई। अखबार का फोटोग्राफर शिवहरे जब थाने पहुंचा तो अपने साथ अन्य अखबारों के 4 फोटोग्राफरों को लेकर। यहीं से खबर पूरे शहर में फैल गई। फोटोग्राफर ने अपने बास को सूचना दी तो वह अपने बास को लेकर थाने पहुंच गया।

सवाल यह है कि क्या उन्हें आईजी, डीआईजी या एसएसपी के बजाए थाने जाना चाहिये था क्या। फिर कई दिनों से खंडपीठ आंदोलन पर बेहतरीन कवरेज देकर वकीलों की सराहना पा रहे अखबार ने अपने निदेशक की जमानत के लिए वकीलों की भीड़ क्यों नहीं जुटा ली, जबकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, सात साल से कम सजा वाले अपराधों में थाने से ही जमानत दी जानी चाहिये। इस बात पर पत्रकार पुलिस पर दबाव क्यों नहीं बना पाए। इसके बजाए इन्होंने दूसरे अखबारों पर दोषारोपण शुरू कर दिया जबकि विज्ञापन पार्टी होने की वजह से दैनिक जागरण और हिंदुस्तान के क्राइम रिपोर्टर निदेशक को छोड़ देने के पक्ष में थे और इसी वजह से उनक सीओ सौरभ से नोक-झोंक भी हुई, जिसकी रिकार्डिंग लोकल न्यूज चैनलों ने दिखाई भी थी। निदेशक को पुलिस छोड़ने को तैयार हुई तो पुष्प सवेरा के फोटोग्राफर ने ही मामला बिगाड़ दिया और निदेशक को कार तक इस तरह लेकर आया कि लोगों का ध्यान उनकी तरफ आ गया।

मामला बिगड़ा यूं भी क्योंकि पुष्प सवेरा पक्ष का एक भी चेहरा ऐसा वहां मौजूद नहीं था जिसे शहर का मीडिया जानता हो। इसलिये जरा सी भी निदेशक के पक्ष में पहल होती तो हंगामा मच जाता। अनजाने चेहरों की वजह से ही पत्रकारों से मारपीट का मामला हो गया। पत्रकार सबको बाहरी समझते रहे। इसके साथ ही कल्पतरू एक्सप्रेस के जिस फोटोग्राफर से मारपीट हुई, उसे हाल ही में पुष्प सवेरा से निकाला गया है और फोटोग्राफर इंचार्ज डीके शर्मा ने सबसे पहले हाथापाई की थी। जंग कैसी भी छिड़े, ठीकरा किसी के भी सिर फूटे लेकिन दोषी वह लोग भी कम नहीं जो मामले की गंभीरता को नहीं समझ पाए। प्रतीत तो यह भी हो रहा है कि तोपों को मुंह दूसरी तरफ मोड़ देने के पीछे भी अपनी नाकामी छिपाने का मकसद है।

सूत्रों के अनुसार जागरण के समाचार सपादक आनद शर्मा ने ग्रुप को असलियत से अवगत कराया है। कहा है कि खबर ज्यादा इसलिये छापी गई क्योंकि ऐसी खबरों की रीडरशिप होती है। जागरण ने उलट वार नहीं किया है। अंदरूनी स्तर पर अपने निदेशकों तक सारा मामला पहुंचा दिया गया है। जागरण में बेचैनी इसलिये है कि यह ग्रुप उसका बड़ा विज्ञापनदाता है और अमर उजाला ने प्रकरण पर चुप्पी साध रखी है।

सौरभ शर्मा दैनिक जागरण, मेरठ के पूर्व पत्रकार हैं और संप्रति लिबर्टी शूज़ लिमिटेड में जनसंपर्क अधिकारी हैं, उनकी फेसबुक प्रोफाइल से.

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