जागरण, बनारस : चीफ सब एडिटर करेंगे जिले में नौकरी, राजाराम का हस्‍ताक्षर से इनकार

दैनिक जागरण, वाराणसी से दो खबरें हैं. शुरुआत करते हैं चीफ सब एडिटर श्‍याम बिहारी श्‍यामल के तबादले की खबर से. श्‍यामल को बनारस से सोनभद्र भेज दिया गया है. यह सजा दी गई है वेबसाइट पर हुई एक गलती के चलते. हालांकि सूत्रों का कहना है कि यह गलती से ज्‍यादा आंतरिक राजनीति का परिणाम है. इसी कारण चीफ सब एडिटर श्‍यामल को सोनभद्र भेजा गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि उन्‍हें प्रभारी बनाकर नहीं बल्कि सोनभद्र के ब्‍यूरोचीफ राकेश पाण्‍डेय का सहयोगी बनाकर भेजा गया है, जो पद में उनसे जूनियर हैं. लिखने-पढ़ने में माहिर श्‍यामल यहां की लॉबी को काफी समय से खटक रहे थे. पहले उन्‍हें सिटी चीफ से डाक पर लाया गया. अब सजा का बहाना बनाकर जंगल-पहाड़ पर लिखा-पढ़ी करने के लिए भेज दिया गया है. गलती तो एक बहाना है.

दूसरी खबर है जागरण के हस्‍ताक्षर अभियान की. यहां पर मशीन विभाग में कार्यरत हेल्‍पर राजाराम ने मजीठिया वेज बोर्ड के चलते चलाए जा रहे प्रबंधन के हस्‍ताक्षर अभियान पर साइन करने से इनकार कर दिया है. यह घटना शनिवार की है. राजाराम इसके पहले भी दैनिक जागरण प्रबंधन को नाको चने चबवा चुके हैं. वे पिछले बीस सालों से जागरण से जुड़े हुए हैं. वे इसके पहले भी लेबर कोर्ट में केस कर चुके हैं. बाद में प्रबंधन ने इस मामले में समझौता कर लिया था. तब से प्रबंधन की मजबूरी बने हुए हैं राजाराम. कुछ समय पहले उन्‍होंने बनारस के मैनेजर अंकुर चड्ढा तथा मशीन इंचार्ज साहू के गाली ग्‍लौज करने के बाद मुकदमा दर्ज करा दिया था, जिसमें काफी बवाल हुआ था. इस बार भी राजाराम ने हस्‍ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया है. उन्‍होंने इसके खिलाफ अपर श्रमायुक्‍त कार्यालय एवं डीआईजी के पास शिकायत भी की है. अब देखना है कि प्रबंधन राजाराम से निपटता है या राजाराम प्रबंधन से निपटते हैं.

वैसे भी दैनिक जागरण के डरपोक-नपुंसक पत्रकारों के बीच में राजाराम के हिम्‍मत की जबर्दस्‍त चर्चा है. बड़े तथा पढ़े-लिखे पत्रकारों ने चुपचाप हस्‍ताक्षर कर दिया वहीं राजाराम ने प्रबंधन से सीधा पंगा ले लिया है. इसके पहले भी जागरण के पत्रकार तीस प्रतिशत अं‍तरिम वाले मामले में चुपचाप साइन कर चुके हैं. इस मामले में तो जागरण के वरिष्‍ठों से लेकर कनिष्‍ठों तक ने प्रबंधन के दबाव में प्रेस क्‍लब की सदस्‍यता से भी इस्‍तीफा दे दिया था, जबकि प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष योगेश कुमार गुप्‍ता पप्‍पू एवं कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी दादा इन पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहे थे. बनारस के डरपोक पत्रकारों के बीच एक सकून देने वाली बात यह है कि पिछले ढाई साल से नौकरी विहीन रहते हुए योगेश गुप्‍ता पप्‍पू एवं मुखर्जी दादा इन लोगों की हर लड़ाई लड़ रहे हैं. बिना अपने वर्तमान एवं भविष्‍य की परवाह किए. फिर भी यहां के पत्रकार न तो खुलकर न ही अंदर से इनके सहयोग के लिए आगे आ रहे हैं.   

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