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जिंदल के पैंतरे से परेशान जी समूह ने लिखा पत्रकारिता का इतिहास

नवीन जिंदल के खिलाफ कोर्ट में मात दर मात खा रहा जी समूह और उसके संपादक परेशान हैं. सुधीर चौधरी द्वारा नवीन जिंदल और ग्रुप के कई लोगों पर किए गए मानहानि समेत कई मुकदमों को विभिन्‍न अदालतों ने खारिज कर दिया है. इससे परेशान समूह अब अपनी वेबसाइट पर पत्रकारिता के इतिहास से लेकर भूगोल तक की चर्चा कर रहा है. आप भी पढ़े जी की वेबसाइट पर प्रकाशित कहानी नुमा दर्द….

नवीन जिंदल के खिलाफ कोर्ट में मात दर मात खा रहा जी समूह और उसके संपादक परेशान हैं. सुधीर चौधरी द्वारा नवीन जिंदल और ग्रुप के कई लोगों पर किए गए मानहानि समेत कई मुकदमों को विभिन्‍न अदालतों ने खारिज कर दिया है. इससे परेशान समूह अब अपनी वेबसाइट पर पत्रकारिता के इतिहास से लेकर भूगोल तक की चर्चा कर रहा है. आप भी पढ़े जी की वेबसाइट पर प्रकाशित कहानी नुमा दर्द….

भ्रष्‍टतंत्र और मीडिया : लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ पर ही निशाना क्‍यों?

आजादी मिलने से लेकर अभी तक मीडिया को लेकर सोच में काफी बदलाव आया है। मीडिया पहले समाज सेवा के तौर पर देखा जाता था धीरे-धीरे बिजनेस बन गया और बिजनेस होते हुए भी लोकतंत्र के चौथे पिलर के तौर पर मीडिया अहम भूमिका निभाता रहा। हालांकि कई मौके ऐसे भी आए हैं जब मीडिया पर निष्पक्ष नहीं होने के आरोप लगे हैं औऱ क्रेडिबिलिटी सवालों के घेरे में आई है लेकिन क्या ऐसा अचानक हुआ है और क्या इसके लिए सिर्फ मीडिया ज़िम्मेदार है? मीडिया की निष्‍पक्षता पर गैरजरूरी सवाल उठाए जा रहे हैं। सच्‍चाई से बौखलाया भ्रष्‍टतंत्र हमेशा मीडिया को ही निशाना क्‍यों बनता है? मौजूदा हालात में ऐसे सवाल उठाना जरूरी हो गया है।

ये माना जाता है कि मीडिया को निष्पक्ष होना चाहिए ऐसे में किसी मीडिया हाउस के मालिक का किसी पार्टी विशेष के पक्ष में आने पर सवाल खड़े होना लाजिमी है लेकिन इसके साथ कुछ और सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए। ये सवाल उठने चाहिए कि आखिर इसकी वजह क्या है? आखिर क्या वजह है जिसने ऐसे हालात बनाए और ऐसा करने के लिए किन ताकतों ने मजबूर किया।

किसी आम आदमी से भी पूछकर देख लीजिए आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि देश में करप्‍शन और कुशासन (पुअर गवर्नेंस) ने संवैधानिक संस्थानों तक की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया है। ऐसा लगता है कि मीडिया भी प्रतिष्‍ठानों (एस्‍टेब्लिशमेंट) के दबाव में घुटने टेक चुका है और ऐसे में जब एस्‍सेल ग्रुप के चेयरमैन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी तब उन्हें तरह तरह से परेशान करने की कोशिश की गई। अक्टूबर 2012 को एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और उनके चैनल के दो संपादकों के खिलाफ दिल्ली के एक थाने में FIR दर्ज करा दी गई और इसके बाद भी उन्हें और उनके ग्रुप को परेशान करने की कोशिशें जारी रहीं।

मौजूदा सरकार की कारगुजारी ने एक बार फिर राजीव गांधी और इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के बीच चले संघर्ष की याद ताजा करा दी है। रामनाथ गोयनका ने शुरुआती दौर में राजीव गांधी को एक इमानदार व्यक्ति होने के नाते खुले तौर पर समर्थन किया था लेकिन बाद में राजीव गांधी कुछ गलत लोगों के चंगुल में फंस गए और कुछ ऐसे काम शुरु कर दिए जो उन्हें नहीं करने चाहिए थे जिसके बाद राम नाथ गोयनका ने राजीव गांधी की आलोचना शुरू कर दी। बताया जाता है कि रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद पैदा होने के केंद्र में रिलायंस ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन स्वर्गीय धीरु भाई अंबानी की अहम भूमिका रही। धीरु भाई अंबानी की गलत सलाहों की वजह से रामनाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच मतभेद इतने गहरे हो गए कि राजीव गांधी ने रामनाथ गोयनका द्वारा संचालित इंडियन एक्सप्रेस की दिल्ली और मुंबई में स्थित टावर्स को टेकओवर करने की भी विफल कोशिश की थी।

इसके खिलाफ प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, रामनाथ गोयनका ने भी खुले तौर पर राजीव गांधी और उनके प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और सभी गैर कांग्रेसी दलों को लामबंद करके कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई। ये भी सच है कि जिस समय रामनाथ गोयनका, राजीव गांधी, उनकी पार्टी और उनकी सरकार से लड़ रहे थे उस समय भी देश की मीडिया बिरादरी (मीडिया फ्रेटरनिटी) या तो चुप थी या फिर तटस्थ थी। रामनाथ गोयनका इस लड़ाई में कई बार अलग-थलग भी पड़ते नज़र आए लेकिन उन्होंने अपने उस संघर्ष को निर्णायक अंत (लॉजिकल इण्‍ड) तक पहुंचाया। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एस्‍सेल ग्रुप के चेयरमैन और भारत में निजी क्षेत्र में टीवी चैनल शुरू करने के जनक सुभाष चंद्रा का दिया गया वक्तव्य एक बार फिर राम नाथ गोयनका और राजीव गांधी के बीच चले लंबे संघर्ष की याद को ताजा करता है।

स्वभावत: सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए अपने व्यावसायिक कारोबार को आगे बढाने के हिमायती सुभाष चंद्रा की बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की जनसभा में जाकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की अपील तमाम सवालों को जन्म देती है। यहां ये विचार करना जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि अराजनैतिक व्यक्तित्व वाले सुभाष चंद्रा एक राजनेता की तरह सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल करने की अपील कर रहे हैं और इससे भी ज्यादा जरूरी सवाल ये है कि देश की मीडिया बिरादरी क्यों मूकदर्शक बनकर महाभारत के द्रौपदी के चीरहरण की स्थिति को आत्मसात किए हुए है।

अक्टूबर 2012 से लेकर अब तक जेडएमसीएल ग्रुप को किसी ना किसी बहाने मौजूदा सरकार क्या इसीलिए टार्गेट करती रही कि इस ग्रुप के चैनलों ने राष्ट्रीय और प्राकृतिक संपदा की लूट को प्रमुखता और प्रभावी तरीके से देश की जनता के सामने उजागर किया? क्या मीडिया का रोल सिर्फ और सिर्फ सरकार और सत्ता में बैठे लोगों के लिए भोंपू का रह गया है। सच उजागर करना क्या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है और सच उजागर करने की मुहिम में शामिल मीडिया घराने के साथ मीडिया बिराददी को लामबंद नहीं हो जाना चाहिए। ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब खोजना एक स्वस्थ लोकतंत्र और मीडिया की विश्वसनीयता
के लिए भी बेहद जरूरी है।

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मीडिया को लोकतंत्र के चौथे पिलर के तौर पर देखा जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती है और देश की आज़ादी के बाद से अब तक मीडिया ये भूमिका निभाता भी रहा है। मीडिया के इतिहास में इमरजेंसी के काले अध्याय की बावजूद मीडिया ने अपनी मजबूती कभी नहीं खोई और कई मामलों मे देश और समाज के लिए अहम भूमिका भी निभाई है। देश को आजादी मिलने के बाद मीडिया के स्वरूप और इसके दायरे में एक बड़ा बदलाव आया। मीडिया के लिए हालात अब उतने मुश्किल नहीं थे जितने आज़ादी से पहले थे। समाचार-पत्रों को आजादी तो मिली ही थी साथ ही साथ साक्षरता दर भी बढ़ रही थी।

इसका नतीजा ये हुआ कि बड़ी संख्या में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। साथ ही रेडियो और टेलीविजन के विकास के लिए भी कदम उठाए गए जिनकी वजह से मीडिया जगत में बड़ा बदलाव देखा गया। अब मीडिया सच को ज्यादा ताकत और जिम्मेदारी के साथ लोगों के सामने ला रहा था। 1947 से लेकर 1975 तक का दौर मीडिया के लिए विकास का दौर था लेकिन 1975 में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बेड़ियां डाल दी गईं। इंदिरा गांधी उस वक्त प्रधानमंत्री थीं और विपक्ष भ्रष्टाचार और कमजोर आर्थिक नीतियों को लेकर उनके खिलाफ सवाल उठा रहा था। अपने खिलाफ बढ़ रहे विरोध को दबाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का एलान करके मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी। मीडिया की आजादी छीनी जा चुकी थी।
करीब 19 महीनों तक चले आपातकाल के दौरान भारतीय मीडिया को घुटने टेकने पर मजबूर किया गया। उस समय जिन अखबारों ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उनकी वित्तीय सहायता रोक दी गई।

ये ऐसा दौर था जब पत्रकार चाहकर भी खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहे थे। इमरजेंसी के दौरान अखबारों में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां ही ज्यादा नजर आती थी। सेंसरशिप के विरोध के तौर पर सम्पादक अखबारों में सम्पादकीय खाली छोड़ दिया करते थे। 1977 में जब चुनाव हुए तो मोरारजी देसाई की सरकार आई और उन्होंने प्रेस पर लगी सेंसरशिप को हटा दिया। इसके बाद अखबारों में आपातकाल के दौरान छिपाई गई बातों को छापा गया। बात चाहे आजादी से पहले की हो या आजादी के बाद की मीडिया अपना काम पूरी ताकत से करता रहा है। 1977 के बाद भी मीडिया लगातार चुनोतियों के बावजूद अपना काम बखूबी करता रहा है। जेसिका लाल का मामला हो या नीतीश कटारा का केस या फिर हाल में देश को झकझोर देने वाला निर्भया गैंगरेप केस इन मामलों में मीडिया ने अपनी भूमिका जिस तरीके से निभाई है वो सबके सामने है।

इसके अलावा प्रियदर्शिनी मट्टू, रिजवानुर रहमान, शिवानी भटनागर, रुचिरा गिरहोत्रा जैसे मामले या सुकना भूमि घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, आईपीएल में भ्रष्टाचार, ये सारे खुलासे मीडिया की वजह से ही संभव हो सके. ये सारे ऐसे मामले हैं, जिनमें मीडिया ने जनता की आवाज़ कार्यपालिका और न्यायपालिका तक पहुंचाई और सफलतापूर्वक कई निर्णयों को बदलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज़ादी के बाद ही क्यों, मीडिया ने आज़ादी की लड़ाई में भी अहम भूमिका निभाई। इतने साल पहले टीवी के बारे में सोचा नहीं जा सकता लेकिन उस वक्त जो अखबार निकलते थे आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारी पैंफलेट, पोस्टर्स, हैंडबिल्स के जरिए सूचना फैलाने का काम किया करते थे। शायद इसके बिना इतनी बड़ी लड़ाई कामयाब ही नहीं हो पाती।

1816 में गंगाधर भट्टाचार्य ने बंगाल गजट का प्रकाशन किया। इसके बाद कई दैनिक, साप्ताहिक व मासिक पत्रों का प्रकाशन शुरु हुआ जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों की जमकर आलोचना की। राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता के जरिये सोशल ऱिफॉर्म को बढ़ावा दिया। ब्राह्मैनिकल मैगजीन के माध्यम से उन्होंने ईसाई मिशनरियों के साम्प्रदायिक षड्यंत्र का विरोध किया तो संवाद कौमुदी के जरिये उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। जेम्स बकिंघम ने वर्ष 1818 में कलकत्ता क्रोनिकल का संपादन करते हुए अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें देश निकाला दे दिया।

हिन्दी में पहला अखबार लाने का क्रेडिट पंडित जुगल किशोर शुक्ला को जाता है। इन्होंने 1826 में उदन्त मार्तण्ड पत्र निकाला और अंग्रेजों की नीतियों की जमकर आलोचना की। अंग्रेजों ने इस अखबार के खिलाफ साम दाम दंड भेद सभी अपना लिए लेकिन जुगल किशोर शुक्ला ने आर्थिक परेशानियों से जूझते हुए भी पत्रकारिता के जरिए देश के लिए काम करते रहे। इसके बाद अंग्रेज़ों प्रेस पर पाबंदी लगाने के लिए तमाम तरह के कानून बनाने शुरू कर दिए।

1857 की क्रांति के बाद गैगिंग एक्ट लाया गया जिसके तहत प्रेस पर ऐसा कोई भी न्यूज़ मैटीरियल छापने पर पाबंदी लगा दी गई जो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हो। पूरी कोशिश की गई कि 1857 की क्रांति की खबरें ना फैलें। उस दौरान स्वतंत्रता आंदोलन के नेता अजीमुल्ला खां ने दिल्ली से पयामे आजादी पत्र निकाला जिसमें ब्रिटिश कुशासन की जमकर आलोचना की गई। ब्रिटिश सरकार ने ना सिर्फ इस पत्र को बंद करने की कोशिश की बल्कि इस अखबार की प्रति रखने वाले को भी टॉर्चर किया।

अंग्रेज सरकार ने इसके बाद वर्नाकुलर एक्ट लाकर प्रेस की आज़ादी को छीनने की कोशिश की जिसके तहत प्रेस को सरकार के खिलाफ कुछ भी छापने की आज़ादी नहीं थी कुछ भी छापने से पहले अखबारों को ना सिर्फ सारी स्टोरीज़ दिखानी होती थीं बल्कि एक बॉन्ड भी साइन करना होता था। हालांकि इस एक्ट के खिलाफ पूरे देश की मीडिया एकजुट हो गई और तब तक इसका विरोध करती रही जब तक सरकार ने एक्ट वापस नहीं लिया। फिर धीरे धीरे दी हिन्दू, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका, द ट्रिब्यून जैसे कई समाचार पत्र सामने आए… लोकमान्य तिलक ने समाचार पत्र मराठा और केसरी के जरिए राष्ट्रवाद की भावना को और भड़काने का काम किया।

गांधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से पूरे समाज को एकजुट किया और आज़ादी की लड़ाई को एक नई दिशा दी। नवभारत, नवजीवन, हरिजन, हरिजन सेवक, हरिजन बंधु, यंग इंडिया जैसे कई अखबार गांधी के विचारों को आम लोगों तक पहुंचाने का काम करते थे। आजादी की लड़ाई के दौर में अकबर इलाहाबादी ने कहा था, “खींचों ना कमानो को, ना तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।“

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ये वो वक्त था जब प्रेस की कलम की ताकत अंग्रेजों के तोप और तलवार पर भारी पड़ती थी। आज़ादी की लड़ाई में ये ताकत बहुत काम आई। आज भी मीडिया के पास उतनी ताकत है जो देश को और ताकतवर बना सके, कमी सिर्फ एकजुटता और जज्बे की है। साभार : जी न्‍यूज

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