जी न्यूज़ की इतनी बड़ी कर्तव्यनिष्ठा भी दिल्‍ली पुलिस को गैरकानूनी दिखी!

:   संकीर्ण कानून और बदलती सोच के बीच मीडिया की समस्या : कानून और सामाजिक समझ या आकांक्षा में अक्सर सामंजस्य नहीं होता. कई बार कानून काफी आगे की सोच लेकर बनते हैं लिहाजा समाज की तात्कालिक समझ से दूर हो जाते हैं जब कि अनेक ऐसे भी वक़्त आते हैं जब कानून पुरानी दिकियानूसी सोच से बंधा रहता है जबकि समाज की समझ काफी आगे बढ़ चुकी होती है. चूँकि भारतीय समाज संबंधों पर आधारित समाज है ना कि पश्चिमी समाज की तरह संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर आधारित इसलिए लोगों का आचार-विचार या नैतिकता, मूल्य बनाने वाली संस्थाओं से तय होते हैं ना कि औपचारिक कानूनों से, खासकर उन कानूनों से जो पश्चिमी व्यवस्था की नक़ल होते हैं.

लेकिन वर्तमान मामले में ठीक उल्टा हुआ है. कानून समाज की एक कु-परम्परा को ध्यान में रख कर भारतीय दंड संहिता में धारा २२८ अ रखा गया था. अवधारणा यह थी कि अगर बलात्कार पीडिता का नाम उजागर हो गया तो भारतीय कु-परम्परा के तहत उसे और उसके परिवार को ताउम्र बदनामी का दंश झेलना पडे़गा यानी ना तो उस परिवार में शादियाँ होंगी ना हीं उन्हें सामान्य जीवन में अच्छी नज़रों से देखा जाएगा. केरला की एक महिला द्वारा विगत सप्ताह दिया गया इंटरव्यू इस बात की तस्दीक करता है. इस महिला से दस साल पहले सन २००२ में एक अस्पताल कर्मी ने बलात्कार किया था. तब से आज तक उसका कोई भी रिश्तेदार या पड़ोसी उससे मिलने नहीं आते. उसका और उसके परिवार का एक तरह से सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है. लिहाज़ा यह कानून अपने आप में बिलकुल ठीक है और भारतीय कुरीति से बचाने का अच्छा हथियार है.

लेकिन अचानक भारतीय समाज का एक पक्ष –जो उदारवादी है, संकीर्णता से उबार ना चाहता है और जो अपेक्षाकृत पढ़ा-लिखा है—खड़ा होता है और इस बलात्कार पीडिता की छवि को “कलंक” से निकाल कर “वीरांगना” के रूप में प्रतिष्ठापित करता है. लगभग हर वर्ग का शहरी व्यक्ति इसमें शामिल होता है. पीडिता देश की बेटी बनती है और उसे दैवीय-स्वरूप देने के लिये फ्लाईओवर का नाम, स्कूल का नाम या नए कानून का नाम उसके नाम पर होने की मांग भी ना केवल उद्वेलित लोगों द्वारा बल्कि भारत सरकार के एक मंत्री द्वारा भी की जाती है. कहना ना होगा देश की मीडिया की और खासकर २४७ खबरिया चैनलों की अप्रतिम भूमिका रही है. लगभग वैसी ही जैसी की भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन के दौरान थी.

मीडिया या सभ्य-समाज के एक बड़े वर्ग की यह एक सार्थक पहल थी कि समाज उन कुरीतियों से निजात पाए जिनसे वह दो हज़ार साल से अपने उनीदेपन के कारण जूझ रहा है. भ्रष्टाचार और स्त्रियों के प्रति उपभोग का भाव दोनों ही सभी व तार्किक समाज के किये अभिशाप बने हुए हैं और यह अलख जगाये रखना ज़रूरी है. मुद्दा कानूनी सुधार से ज्यादा नैतिक परिवर्तन का है, जिसे कानून देने वाली संस्थाओं द्वारा नहीं बल्कि मूल्य, नैतिकता और आचरण बदलने वाली संस्थाओं के ज़रिये ही बदला जा सकता है और ऐसे बदलाव रातो –रात नहीं होते.

जब पीडिता के निधन की घोषणा आई और पता लगा कि सिंगापुर से पार्थिव शरीर भारत लाया जा रहा है तो भारतीय चैनलों के लिए एक अजीब संकट की घड़ी पैदा हो गयी. एक तरफ मृतक पीडिता को समाज महिमामंडित कर रहा था और सार्थक प्रयास में लगा था कि इस जन-भावना के दबाव को सामाजिक सोच में परिवर्तन, कानून में बदलाव और सरकारी अभिकरणों की संवेदनशीलता बढ़ाने का सबब बने. दूसरी तरफ भारतीय दंड संहिता की धारा २२८ अ आड़े आ रही थी. इस धारा के तहत केवल तीन व्यक्तियों को बलात्कार की चार धाराओं में नाम जाहिर करने या अधिकृत करने का अधिकार है. पहला पीडिता स्वयं, दूसरा थानेदार या जांच अधिकारी वह भी तब जब ऐसा करना उसकी सदाशयता के तहत जांच के लिए ज़रूरी हो और तीसरा पीडिता का सबसे नजदीकी रिश्तेदार –वह भी लिखित रूप से अधिकृत करता हो और केवल उन कल्याणकारी संस्थाओं को जो केंद्र या राज्य की सरकारों द्वारा मान्यता –प्राप्त हों. याने मीडिया या किसी अन्य को किसी भी कीमत पर नाम उजागर करने का अधिकार नहीं है.   

इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनलों के संपादकों की सर्वोच्च संस्था, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के लिए एक बड़े असमंजस की स्थिति थी. पर सभी मेम्बर एडिटरों से व्यापक चर्चा के बाद यह फैसला किया गया कि कानून के अनुरूप ही चलना होगा. लिहाज़ा बीईए ने सामूहिक बलात्कार की शिकार युवती शव –यात्रा ना दिखाने, घर पर ओबी वैन ना लगाने या किसी भी स्थिति में ऐसा कोई इंटरव्यू ना करने, जिससे मृतक पीडिता की पहचान सुनिश्चित होती हो, सम्बन्धी एडवाइजरी जारी की. स्व-नियमन की दिशा में यह एक अच्छा कदम माना गया. यह अलग बात है कि लाल –बुझक्कड़ मीडिया- निंदक (क्र्टिक) को इसमें भी टीआरपी का खेल नज़र आता है जैसा उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरे जनांदोलन के दौराम मीडिया कवरेज को लेकर आया था.

समाज के एक वर्ग तथा अखबारों के कुछ संपादकों की तरफ से इस्नारा फैसले पर नाराजगी दिखाई गयी यह कहते हुए कि मीडिया को कोई अधिकार नहीं है किसी की अभिव्यक्ति को बाधित करने का. यह भी आरोप लगाया गया कि सरकारी दबाव में किया गया फैसला है. कुछ लोगों का मानना था कि जहां सोनिया गाँधी और प्राइममिनिस्टर को शव की अगवानी करने की खबर दिन भर चैनलों पर चलती रही वहीँ अंतिम संस्कार की कवरेज का ब्लैकआउट किया गया.

यहीं यह सोचने की बात है जो मीडिया भरष्टाचार पर इतनी तन कर कड़ी हो जाती है सरकार के लिए जीने-मरने का सवाल बन जाता है, जो मीडिया राहुल गाँधी हो या सलमान, गडकरी हों या अम्बानी किसी को नहीं बख्सती वह सरकार की इतनी पिट्ठू कैसे हो जाएगी. दूसरा जो मीडिया लगातार इंडिया गेट प्रदर्शन को एक क्षण के लिए कैमरे की जद से नहीं निकले दे रही है वह क्या इतनी कमजोर हो सकती है? हमारा खतरा एक अन्य आधार पर था और है. आज जन-भावनाएं पीडिता को महिमामंडित कर देती है लेकिन कल यह भाव ख़त्म हो जाता है और समाज फिर से अपनी दकियानूसी  सोच पर वापस आ जाता है, ऐसे में क्या उस परिवार को कलंकित होने का खतरा नहीं बढ़ जायेगा? दूसरा आज चूँकि वह पीडिता ज़िंदा नहीं है और जनाक्रोश का समाज पर प्रभाव है इसलिए उसके महिमामंडित होने पर खतरे उतने नहीं हैं लेकिन क्या पूरे देश भर की अन्य बलात्कार-पीड़ितों के प्रति भी समाज यही भाव रखता रहेगा अगर नहीं तो क्या यह खतरा नहीं है कि पहचान उजागर होने के बाद उनका भी जीवन वैसा ही हो जाये जैसा केरला की युवती का हो गया है?  

एक अन्य समस्या. अगर किसी एक मात्र हिंसा के शिकार और इस बलात्कार के अकेले गवाह के टीवी इंटरव्यू से यह बात निकल कर आती हो कि बलात्कार पीडिता की जान बचायी जा सकती थी, अगर तीन पीसीआर वैन इस बात पर २९ मिनट ना झगड़ते कि घटना किस थाने की सीमा में है तो क्या कानून के डर से सिस्टम के इस सड़ांध को व्यापक जनहित में ना दिखाया

एनके सिंह
जाये? क्या यह भी ना दिखाया जाये कि कानून के पचड़े में ना पड़ने के लिए राहगीर भी इन दोनों पीड़ितों को भगवान भरोसे छोड़ कर चल देते थे? क्या दिल्ली पुलिस को जी न्यूज़ चैनल की इतनी बड़ी कर्तव्यनिष्ठा भी गैरकानूनी दिखी कि मुक़दमा ठोंक दिया?

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं.

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