जेल में पत्रकारों की संख्‍या रिकार्ड स्‍तर पर पहुंच गई

पत्रकारों के लिए साल 2012 हमलों का रहा। जेल में पत्रकारों की संख्या रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई। 132 संवाददाता अपने कर्तव्य निबाहने के दौरान मारे गए। हममें से अधिकांश ने साल 2012 में एक नई तरह की संधि को देखा- लगभग 89 देशों ने इंटरनेट पर सरकारी प्रतिबंध का समर्थन किया। चीन से सीरिया तक की दमनकारी सत्ताओं ने महूसस किया कि कैसे डिजिटल मीडिया सरकारी झूठ, अत्याचार व भ्रष्टाचार को उजागर करता है।

दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र समर्थित इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन्स यूनियन की बैठक हुई, जिसमें सरकारें इंटरनेट का गला घोंटने में कामयाब रहीं। हर सरकार अपने लिए अलग इंटरनेट प्रणाली की वकालत कर रही है, जहां उनके ‘डिजिटल वाल’ पर तमाम शर्ते हों। हम यह कहकर संतुष्ट रह सकते हैं कि पत्रकारों पर हमला भोर से पहले का घना अंधेरा है, क्योंकि डिजिटल टेक्नोलॉजी में सरकारी नियंत्रण को पार पाने की क्षमता है।

दूसरी तरफ, ये सत्ताएं सूचना, सच्चई व पारदर्शिता की जनता की भूख के खिलाफ हैं। वे नेता, जो स्वतंत्रता को नकारते हैं, अपनी ही गलतियों के उजागर हो जाने से धाराशायी हो जाते हैं। मसलन, सीरिया में सिटीजन जर्नलिस्ट ने असद हुकूमत की ज्यादतियों की तस्वीरें यू-ट्यूब पर डाउनलोड कीं, जिनसे हुकूमत को घरेलू व अंतरराष्ट्रीय मदद मिलनी लगभग बंद हो गई। पश्चिम के पत्रकारों ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष सत्ताधारकों के भ्रष्टाचार को उजागर किया (इसके बाद से चीन में पश्चिमी न्यूज साइट बंद कर दिए गए)। इंटरनेट ने खोजी पत्रकारिता के असर को तेज किया है।

1980 के दौर में वाशिंगटन पोस्ट  को डिक्टेटर फर्दीनांद मार्कोस के भ्रष्टाचार को उजागर करने में वर्षों लगे, तब जाकर जन-विद्रोह हुआ। पर आज चीन या रूस में ‘नेटिजन’ (इंटरनेट व नागरिक) कुछ घंटों के अंदर भ्रष्टों को बेनकाब कर देते हैं व जन-ज्वार की चिनगारी भड़क उठती है। बेशक 2012 मीडिया के लिए बुरा रहा, पर उम्मीद जगी है कि 2013 में सरकारी सेंसरशिप का अंधेरा खत्म होगा।   ''द क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर, अमेरिका'' (हिंदुस्‍तान)

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