तुम मर क्यों नहीं जाती अनामिका!

तुम मर क्यों नहीं जाती अनामिका! इस देश का कानून कहता है कि बलात्कार का शिकार जो हुई उसका नाम नहीं लिया जाए। उसकी पहचान नहीं होने पाए। उसकी शिनाख्त पर परदा पड़ा रहे। कोई तुम्हारा चेहरा न देख पाए। तो तुम्हें अनाम कहने से अच्छा है तुम्हें एक नाम दे देना अनामिका। अब तो तुम्हीं को संबोधन है, अब तो तुम्हीं से आह्वान है, अब तो तुम्हीं से उम्मीद है अनामिका। तुमने भींगे हुए गिलगिलाते देश को गर्मी दे दी है अनामिका। …कि राजपथ पर सत्तासेवकों की तरफ से जब शासनिक उपेक्षा की ठंडी-नपुंसक बौछारें गुस्साए लोगों पर बरसाई जा रही थीं तब भी तन-बदन में लगी आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी।

आम आदमी के न्याय मांगने का समवेत स्वर नक्कारखाने के सत्ता-राक्षसों को कितना बेचैन करता है, यह बरसती लाठियां बता रही थीं और आंसू गैस के गोले बता रहे थे। तुम्हें जिस काम के लिए ईश्वर ने भारतवर्ष में भेजा था, वह पूरा हुआ… अब तो मर जाओ अनामिका! लोग तुम्हारे जीवन की दुआएं मांग रहे हैं, लेकिन मैं तुम्हारी मौत की तुमसे ही अपील कर रहा हूं। अनामिका जब तुम भारतवर्ष में पैदा हुई थी, उसी दिन तुम्हारी मौत हो गई थी। निर्लज्ज नेतृत्व के देश में मां-बेटियों की जो इज्जत रास्तों पर बिखरती है तो बिखर जाता है आजादी, लोकतंत्र और जन गण मन का सपना। यहां कोई नहीं है अपना। मौत बेहतर है, बेहया शासन में जिंदा रहने से। सचमुच अनामिका जब केंद्रीय सत्ता-पीठ के पास ही तुम्हारे देह-संविधान के विशेषाधिकार का हनन हो रहा था, तुम्हारे पवित्र मन और शरीर की मर्यादा के जब चीथड़े उड़ाए जा रहे थे तब तुम्हारी चीख देश-संविधान के सामूहिक बलात्कार की हर दिन की जाने कितनी चीखों के साथ मिल कर तुम्हारी नसें फाड़ रही होंगी। इसके बारे में सोचना भी दिमाग की नसों में पीड़ा का तेजाब भर देता है।

तब तुम्हें तो लगा ही होगा न अनामिका कि किन बदतमीजों ने मिल कर बनाई थी ऐसे रद्दी कानून की किताब और कौन-कौन हर दिन उसमें जोड़ता है जुगुप्सा भरे नए-नए अध्याय! इसी में तो लिखा है न जीने का अधिकार, प्रतिष्ठा का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार वगैरह, वगैरह। ऐसी गारंटी तो किसी फर्जी कम्पनी के घटिया उत्पाद के पैकेट्स पर भी लिखी होती हैं न! जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता! नेताओं ने इस देश को उन्हीं फर्जी कम्पनियों जैसा बना कर रख दिया है। तुम्हें न जाने किस कसूर की इतनी भयावह सजा मिली, लेकिन देखना तुम्हारे साथ इतना आपत्ति और विपत्तिजनक अपराध करने वाले कसूरवारों को कैसी सजा मिलती है। अभी केस चलेगा, अभियोग 'फ्रेम' करने की कानूनी औपचारिकताएं होंगी, पहचान परेडें होंगी, गवाहियां गुजरेंगी, बयानात होंगे, बलात्कारियों को बचाने के लिए भारी फीस लेकर वकील उनके बचाव में अदालतों में जूझेंगे। फिर निचली अदालत से ऊंची अदालतें और सर्वोच्च अदालत होते हुए मामला फैसले तक आएगा। इस बीच जाने कितनी नीच राजनीति होगी, कितने घटिया मानवाधिकारी खड़े होंगे। और यह सब देखने के लिए तुम जिंदा क्यों रहोगी अनामिका?

तुम्हें जिंदा रखने के लिए डॉक्टरों ने तुम्हारी आंतें काट डाली हैं, तुम्हें पता है न! तुम्हारा जीना कितना दुश्वार हो गया है, इसका तुम्हें जरा सा भी एहसास है? कल कौन होगा तुम्हारे साथ? जब राजधानी दिल्ली की चाक-चौबंद-चकाचौंध सड़कों पर रात भर भेडि़ए तुम्हें नोचते रहे तो कौन आया था तुम्हारी हिफाजत के लिए? इस देश में कौन पूछता है देश के लिए समाज के लिए बम गोलियां खा कर विकलांग और लाचार होकर जिंदगी घिसट रहे राष्ट्रभक्तों को, समाजसेवियों को, भुक्तभोगियों को…? कि कोई तुम्हें पूछेगा! हम ऐसे ही मुल्क के हैं जो कहते जरूर हैं कि… बेटियां शुभकामनाएं हैं, बेटियां दुआएं हैं, बेटियां वैदिक ऋचाएं हैं, बेटियां गौरव कथाएं हैं, बेटियां ईश्वर की वन्दनाएं हैं, बेटियां हैं जीनत हदीसों की… लेकिन असलियत यही है न कि भारतवर्ष की बेटियां हादसों की बेटियां हैं! बेटियां हमें शब्द देती हैं, बिम्ब देती हैं और बदले में हम उसका प्रतिबिम्ब नोचते-खसोटते हैं। हम झूठ की गौरव-गाथाओं से भरे पड़े हैं… तुम जी कर क्या करोगी अनामिका!

वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन के फेसबुक वॉल से साभार.

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