तो क्‍या आजतक की एंकरों को रोते हुए फोटो खिंचवाना चाहिए था?

दिल्‍ली गैंगरेप मामले में आजतक की महिला रिपोर्टरों ने रात में रिपोर्टिंग करके पुलिस की तत्‍परता की पोल खोला, जिसके लिए इन लोगों को सराहना भी मिली. चैनल पर भी इन लोगों ने इंसानियत और संवेदनशीलता की भी दुहाई दी. इसके देखते हुए एक पाठक ने इनलोगों की एक तस्‍वीर भेजते हुए लिखा है, ''यशवंत जी, आज तक ने बड़े जोर शोर से दिल्ली गैंग रेप मामला उठाया. इंसानियत और संवेदनशीलता जैसे बड़े बड़े शब्दों का इस्तेमाल किया, लेकिन जरा देखिए उनके खुद के रिपोर्टर और एंकर कितने संवेदनशील है. ये फोटो आज तक की ही एक रिपोर्टर गीता जोशी के फेसबुक वॉल से ली गई है. जब दुनिया के सामने ये रिपोर्टर छाती पीट पीटकर इंसानियत की दुहाइयां दे रही थीं उसी रात जेएनयू कैंटीन में किस तरह मौज मस्ती कर रही थीं और दांत निपोर कर फोटो खिंचवा रही थीं. जरा देखिए और समझिए कि आज तक के लिए ये पूरा कवरेज किसी तमाशे से कम नहीं था. टीआरपी बटोरने के लिए इंसानियत झूठी और नकली दुहाईयां दी जा रही थी.''

दिल्‍ली गैंगरेप मामला निश्चित रूप से संवेदनशील है. इस मामले में सरकार पर इस हद तक दबाव बनाने तथा लोगों को जगाने में मीडिया का भी अहम रोल रहा है. मीडिया तमाम लोगों के आचरण पर सवाल भी उठाता रहा है. जैसे इस मामले में राज्‍यसभा में राजीव शुक्‍ला के मुस्‍कराने-हंसने पर भी मीडिया ने सवाल खड़ा किया. ये सही था कि कम से कम इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान राजीव शुक्‍ला को नहीं हंसना चाहिए था, क्‍योंकि ये बहस संसद में चल रही थी. अगर ये राजीव शुक्‍ला कैंटीन में किसी के साथ हंसते तो शायद किसी को आपत्ति नहीं होती. क्‍योंकि वो उनका व्‍यक्तिगत मामला होता. इसी तरह आजतक की महिला एंकरों के हंसने-बोलने पर उनकी संवेदनशीलता और गंभीरता पर सवाल उठाने के मामले से भी पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता है.

अव्‍वल तो यह कि आजतक या मीडिया से जुड़ा कोई भी व्‍यक्ति किसी संवैधानिक पद पर नहीं है. ना ही मीडिया के नाम पर उसे अलग से कोई अतिरिक्‍त अधिकार मिला हुआ है. देश के आम नागरिक को जिस धारा के तहत अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की आजादी मिली है, उतनी ही आजादी मीडिया को भी है. हां, यह जरूर है कि मीडिया का घोषित उद्देश्‍य संवेदनशील होना तथा सही तथ्‍यों को आम लोगों पहुंचाना है. पर कभी कभी मीडिया अतिरेक में इससे आगे चला जाता है, फैसलाकुन हो जाता है. पर उनका बेसिक काम सिर्फ मामले को उसके सच रूप में सामने रखने का होता है. इससे ज्‍यादा कुछ नहीं. आजतक की महिला एंकरों ने भी वही किया. उन्‍होंने सच को सबके सामने रखा और इस काम में कम से कम ईमानदारी बरती.

पर हम लोग मानसिक रूप से भेड़चाल में चलने वाले होते हैं. जैसे अब हम किसी मातम में जा रहे हों तो हमें अपनी रोनी सी सूरत बनाकर ही जाना है. अगर बारात में जा रहे हैं तो वहां हंसते हुए ही जाना है, भले ही हंसने का माहौल या मन ना हो. मेरा व्‍यक्तिगत रूप से मानना है कि टीआरपी-चरम व्‍यवसायिकता के इस दौर में मीडिया या मीडियाकर्मियों से इससे ज्‍यादा संवेदनशीलता की उम्‍मीद नहीं की जा सकती कि वो बस सही खबर दिखा दें. जिस दौर में सब कुछ बिका हुआ है, जिसमें सच को जगह नहीं मिल रही हो, वहां इस तरह की उम्‍मीद करना बेमानी ही है. वैसे भी जिन एंकरों को रिपोर्टिंग करने के लिए भेजा गया था, वे किसी संवेदनशीलता के वशीभूत होकर रिपोर्टिंग करने नहीं गई थीं. वे अपना काम करने गई थीं, नौकरी करने गई थीं.     

इन एंकरों-रिपोर्टरों ने अपने काम में किसी प्रकार की असंवेदनशीलता तो कम से कम नहीं बरती. जिस जगह की यह तस्‍वीर है, य‍ह निश्चित रूप से उन लोगों का व्‍यक्तिगत टाइम है, जहां वे एक दूसरे हंसी-ठिठोली कर रही हैं. ये उनके काम से फुर्सत का पल है. जहां वे एक दूसरे से बातचीत कर रही हैं. तो क्‍या हम लोगों को ये मानना चाहिए कि गैंगरेप मामले में रिपोर्टिंग करने वाली महिला एंकर जहां जाएं उनके चेहरे पर बनावटी रुलाई बरकारार रहे. चेहरे पर मातम दिखता रहे. आखिर वे क्‍यों ना खुश हों कि उन्‍होंने दिल्‍ली पुलिस की गड़बड़ी की पोल खोल दी. वो क्‍यों ना खुश हों कि उन्‍होंने खुद आंशिक रूप से ही जोखिम में डालकर अपना काम अच्‍छे से पूरा कर लिया. जी हां, 'काम' यानी 'नौकरी'. इनका काम रिपोर्टिंग करना था..ये किसी जनाजे में मातमपुर्सी करने नहीं गई थीं, जो रोनी सूरत बनाकर सभी जगह घूमें.  

भूत-प्रेत, धरती उजाड़ने, स्‍वर्ग खोजने के दौर में मीडिया से किसी सरोकार या संवदेना की उम्‍मीद करना भी कोरी मूर्खता है. आज कितने मीडियाकर्मी हैं, जो निष्‍पक्ष तरीके से काम कर रहे हैं. अगर दिल्‍ली, मुंबई या इनके आसपास घटनाएं होती हैं तो चैनल और अखबार रोना-पीटना, छाती कूटना शुरू कर देते हैं, लेकिन इससे भी वीभत्‍स घटनाएं जब ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं तो क्‍यों नहीं ये मीडिया संस्‍थान अपनी छाती कूटते हैं। जाहिर है कि ये मानते हैं कि रूरल से इन्‍हें कोई टीआरपी नहीं मिलने वाली, इनके अखबारों की बिक्री नहीं बढ़ने वाली. यहां से इन्‍हें पैसा नहीं मिलने वाला. फिर ऐसे बाजारू दौर में संवेदना की उम्‍मीद काम करने वाले लोगों से कैसे की जा सकती है, जो संवैधानिक रूप से किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं हैं. 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *