तो व्‍यवस्‍था ही उखाड़ फेंकते हैं प्रदर्शनकारी (राणा यशवंत की कविता)

राणा यशवंत वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. वे आजतक न्‍यूज चैनल में लम्‍बे समय तक वरिष्‍ठ पद पर रहे हैं. इन दिनों महुआ समूह में ग्रुप एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. समय समय वे कविताएं गीत, गजल के माध्‍यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहते हैं. दिल्‍ली गैंगरेप को लेकर पूरा देश गुस्‍से में है, सरकार सकते में हैं और पुलिस निहायत बेचारगी और लाचारगी में, क्‍योंकि शासन-प्रशासन, सत्‍ता-सरकारों से उब चुके आम लोग, युवा वर्ग अब प्रदर्शनकारी की शक्‍ल में सड़कों पर उतर गया है. बिना किसी बात की परवाह किए. राणा यशवंत ने भी ऐसे ही प्रदर्शनकारियों पर एक कविता लिखी है, जिसका शीर्षक है 'प्रदर्शनकारी'. आप भी पढिए यह कविता.  

प्रदर्शनकारी

आज विजयचौक पर फिर जमा हुए थे प्रदर्शनकारी   
हमेशा की तरह डंडे-डुंडे खाकर, हाथ-पैर तोड़-फोड़कर लौट गये
उनको पता होता है कि होना क्या है
पीठ मजबूत करके आते हैं, खाना-दवा ज़रुरी है तो लेकर आते हैं
हाथ में हाथ डाल एक दूसरे को हिम्मत देते हैं, आगे बढ़ते हैं

एक दूसरे की आंखों का डर, एक-दूसरे को भागने से रोकता है
फिर ताकत भर चिल्लाकर डर भगाते हैं
नारे लगाते हैं, बैनर-पोस्टर लहराते हैं, हक मांगते हैं प्रदर्शनकारी
हिम्मत भर डंटे रहते हैं, बर्दाश्त भर जूझते हैं
भागते समय सबसे पीछे रह गये साथियों की तरफ मुड़-मुड़कर देखते हैं
पिटते, चीखते, दोहरे होते, उठते-भागते फिर गिरते साथियों के लिये
ठिठकते हैं, हिम्मत बटोरते हैं लौटने की, घायल साथियों को लेकर भागते हैं
प्रदर्शनकारी.

प्रदर्शनकारियों के चेहरे नहीं होते, नाम-पता भी नहीं
वो झुंड के झुंड आते हैं तय जगह पर, जाने अनजाने रास्तों से
उनकी कोई निश्चित संख्या नहीं होती
इतिहास में वो हमेशा अनुमान के हवाले से दर्ज होते हैं
आंकड़े सिर्फ मरनेवालों और घायलों के होते हैं
प्रदर्शनकारी भी डरते हैं हमारी आपकी तरह
उनके घावों से लाल खून ही निकलता है
वे रोते-चीखते हैं ठीक वैसे ही जैसे हम और आप
वे भी सपने देखते हैं
उन्हें भी पसंद है – ज़ायकेदार खाना, मुलायम बिस्तर और सुकून की नींद  
फिर भी जब हम और आप बैठे होते हैं घरों में
रोटी, इज़्जत, आज़ादी और इंसानियत की खातिर लड़ते हैं, मरते हैं प्रदर्शनकारी
दुनिया के सबसे बड़े संत और सबसे बड़े योद्धा हैं
प्रदर्शनकारी.

दुनियाभर में प्रदर्शनकारियों की अपनी एक जाति है
वो हर जगह होते हैं, हमारे आपके आसपास इस वक्त भी
दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, सूरत, भोपाल कहीं भी
उनकी कोई यूनिफॉर्म नहीं होती, उनके पसीने में कोई अलग गंध भी नहीं होती
महकमा, मुहल्ला, मुखिया, मज़हब – कुछ भी उनका अपना नहीं होता
सड़क पर, बाज़ार में, खेत में वो खड़े होंगे और आप चिन्ह भी नहीं पायेंगे
अस्पताल और श्मशान में ही पहचाने जाते हैं
प्रदर्शनकारी.

बुद्दिजीवियों को बहुत भाते हैं प्रदर्शनकारी
तरक्कीपसंदों के प्रिय पात्र हैं प्रदर्शनकारी
वो कहते हैं कि प्रदर्शनकारी में बजर का सबर और समंदर की शक्ति होती है
प्रदर्शनकारी ज़रुरी हैं ताकि जिंदा रहे लोकतंत्र
ज़ुल्म-ज़्यादती, लूट-खसोट, गूंगी-बहरी व्यवस्था के खिलाफ
खड़ा होने के लिये ज़रुरी हैं प्रदर्शनकारी
सांस का खुली हवा से रिश्ता बना रहे, आबरु का अंधेरे में भी इत्मिनान बना रहे
भूख का रोटी पर हक बचा रहे, आज की कल पर उम्मीद बची रहे
जरुरी हैं
प्रर्दशनकारी.

प्रदर्शनकारी, क्रांति के अग्रदूत होते हैं
वे नायक नहीं होते इसलिए उन्हें कोई नहीं जानता
जो झंडा लेकर सबसे पहले दौड़ा था और गोली खायी थी
जो रातभर हवालात में पिटा और सुबह मर गया लेकिन गलत गवाही नहीं दी
जो किसानों के अधिकार के लिये अनशन पर बैठा और उसकी मौत की खबर तक नहीं लगी
जो खाप पंचायतों के तालिबानी फरमान के खिलाफ खड़ा हुआ और सुबह पेड़ पर लटकता पाया गया
जो बड़े सरकारी घोटाले का पर्दाफाश करने से पहले ही अगवा हो गया
वे सब प्रदर्शनकारी ही थे
उनकी कोई प्रतिमा आपने कहीं नहीं देखी होगी  
उनके नाम के चौराहे, सड़कें, गलियां भी नहीं होते
कहते हैं प्रदर्शनकारियों की रगों में जबतक ख़ून है
तो व्‍यवस्‍था ही उखाड़ फेंकते हैं प्रदर्शनकारी
लेकिन जब ख़ून उनकी आंखों में उतर आता है
फिर वे व्यवस्था ही उखाड़ फेंकते हैं
गद्दाफियों और मुबारकों जैसों के अंत के लिए
चाहिए ही चाहिए
प्रदर्शनकारी.

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