दबाव में है हाथी, उड़ान पर है साइकिल

: सत्ता की लड़ाई : उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनाव में बाजी किसके हाथ : ज्यों-ज्यों उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न राज्यों का पारा लुढ़क रहा है, वैसे-वैसे चुनावी राज्यों का सियासी पारा चढ़ता जा रहा है और ये राज्य अपनी सियासी तपिश से दिल्ली को भी गर्मा रहे हैं. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा तरजीह मिलती रही है क्योंकि यही वह प्रदेश है जहां से केन्द्रीय सत्ता की राह तय होती है. प्रदेश के चुनाव में अभी वक्त है लेकिन राजनीतिक दांव-पेंच और अनुमानों का दौर चल पड़ा है. जो दल और नेता कभी अपने विरोधियों से खार खाए थे, आज उनसे गलबाहियां करने में भी कोई गुरेज नहीं कर रहे हैं. जोड़- तोड़ से लेकर गठबंधन कर अपनी राजनीतिक गोटी सेट करने में लगे हैं.

इन राजनीतिक दलों की सत्ता चाह ने इनकी राजनीतिक मजबूरियां पैदा कर दी हैं कि आज कांग्रेस को न तो अजीत सिंह से गुरेज है और न ही कांग्रेस को अजीत सिंह से. समाजवादी पार्टी जहां एक के बाद एक क्रांतियात्रा कर रही है वहीं मायावती सिंहासन बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं. ऐसे में अब सारा भार जनता पर आ गया है कि वो किसे चुने किसे नहीं. इस पूरे सियासी उठा-पटक में कई सारे राजनीतिक समीकरण बनते बिगड़ते नजर आ रहे हैं. इसमें जातिगत समीकरण से लेकर विकासगत मुद्दे तक एक-दूसरे पर बारी-बारी से हावी होते नजर आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में सबसे ज्यादा साख कांग्रेस और बसपा की लगी है. कारण है कि कांग्रेस केंन्द्र में बैठी है और बीएसपी राज्य में. ऐसे में इन दोनों दलों पर बेहतर प्रदर्शन का अतिरिक्त दबाव होगा.

जहां तक दलों की बात है तो समाजवादी पार्टी भी बढ़-चढ़कर रैलियां कर रही है तो भाजपा भी अपनी जमीन तलाशती नजर आ रही है. हालांकि बाकि के दलों की तरह अभी तक कोई बड़ी रैली या व्यापक अभियान नहीं छेड़ा है पर फिर भी कहीं न कहीं भाजपा भी हाथ-पांव मार रही है. इसके अलावा कुछ छोटे दल जो इस बार के चुनाव में प्रबल संभावना के साथ केन्द्रीय भूमिका में नजर आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनाव 2012 जो लोकसभा 2014 के लिये सेमीफाइनल है और इसमें कोई शक नहीं कि सभी राजनीतिक दल विभिन्न मुद्दों के साथ चुनावी समर में एक-दूसरे से दो-दो हाथ करने को तैयार हैं. अब इसमें गौर करने वाली बात यह है कि कौन सा दल किस मुद्दे को भुनाता है.

दबाव में है माया का हाथी

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मुख्य रूप से चार राजनीतिक दल मैदान में है जो एक दूसरे पर हावी होने की फिराक में हैं. इसमें सबसे पहली बात प्रदेश की सत्ताधरी पार्टी और मुख्यमंत्री की, जो लगातार रैलियां कर और चुनावी लॅालीपॅाप की घोषणा कर चर्चा में हैं. लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस बार प्रदेश की जनता हाथी पर सवार होगी. क्योंकि अब तक के जो रूझान सामने आए हैं उससे तो यही स्पष्ट हो रहा है कि प्रदेश की जनता अब भी जातीय प्रपंचों से उबर नहीं पाई है और यही कारण है कि कभी मायावती तो कभी मुलायम सत्ता की कुर्सी को सपने में आते देख रहे हैं.

जहां तक बात मुद्दों की है तो मायावती को खुद अपने द्वारा किए गए कार्यों को ही चुनावी मुद्दा बनाना पड़ रहा है. हां बीच-बीच में वो केन्द्रजनित भ्रष्टाचार की बात जरूर करती हैं. बसपा के बारे में देखा जा रहा है कि यहां मुख्य रूप से मायावती ही प्रदेश का दौरा कर रही हैं और अपने विकासकार्यों का मुआयना कर रही हैं. लेकिन यह राज्य की कुर्सी पर दुबारा सत्तासीन होने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि प्रदेश का विकासकार्य कुछेक शहरों में ही दिखता है, जबकि सत्ता की चाबी छोटे शहरों और गांवों के पास होती है. नोएडा या लखनऊ में जो पार्क बनाए गए हैं उससे किसी गरीब या किसान को लाभ नहीं होने वाला. ऐसे में सरकार के द्वारा किया गया यह स्वकथित विकासकार्य उन हजारों किसानों या फिर गरीबों के लिए मजाक है जो बमुश्किल दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं.

प्रदेश में एक भी ऐसा शहर नहीं है जहां कुशल या अकुशल मजदूरों को उनकी योग्यता के अनुसार कार्य मिलता हो. यही कारण है कि प्रदेश से पलायन नहीं रूक रहा है. इसके अलावा प्रदेश में अभी तक कोई निवेश कार्य भी नहीं हुआ जिससे यह माना जा सके कि प्रदेश ने राजस्व के मामले में भी तरक्की कर ली हो. ज्ञात हो कि मायावती आज भी प्रदेश के ही राजस्व और आम लोगों के पैसों को ही खर्च कर रही हैं. इन परिस्थितियों में मायावती के लिए विकासकार्य कितना कारगर मुद्दा बनेगा, आंका नहीं जा सकता. दूसरी तरफ मायावती जहां बार-बार भ्रष्टाचार की बात कर रही हैं तो शायद उन्हें अपने प्रदेश में होने वाले भ्रष्टाचार का भान नहीं है और अगर है भी तो केन्द्र जनित भ्रष्टाचार की आड़ में उसे छुपाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि आंख बंद करने से रात नहीं हो जाती. राज्य का भ्रष्टाचार भी केन्द्र से कम नहीं है. राज्य में मनरेगा का जो हश्र हो रहा है वो जगजाहिर है.

पिछले कुछ महीनों में बलात्कार और अपराध का जो ग्राफ बढ़ा है उसे राज्य सरकार बखूबी जान रही है. ऐसे में भ्रष्टाचार के मामले में भी मायावती को राहत नहीं मिलने वाली. इसके अलावा इसमें जातिगत फैक्टर भी पीछे नहीं है. मायावती कभी दलितों की राजनीति करती हैं तो कभी ब्राम्हणों की. अभी हाल ही में उन्होंने मुस्लिम आरक्षण का भी दांव खेला है जो कितना प्रभावी होगा वो भविष्य के गर्भ में है. इसके अलावा अन्ना फैक्टर भी कहीं न कहीं काम करेगा, क्योंकि लोकपाल पर मायावती ने बार-बार अपना पाला बदला है और लोकपाल की सच्चाई यह है कि केवल राज्य की जनता ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता भी अन्ना के लोकपाल के मसौदे को ही उचित मान रही है. ऐसे में किसी भी पार्टी के द्वारा लोकपाल का विरोध् करना महंगा पड़ सकता है वो भी तब जब उसे विधनसभा चुनाव का सामना करना हो. बहरहाल आगे जो भी हो लेकिन इतना तो तय है कि आने वाले विधनसभा चुनाव में सरकार को कई महत्वपूर्ण प्रश्नों का जवाब देना होगा.

जमीन तलाशने की जद्दोजहद में कांग्रेस

कांग्रेस की विडम्बना है कि वो केन्द्र से लेकर राज्यों में अलग-थलग पड़ा हुआ है. मामला भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई तक से जुड़ा है. जहां तक राज्य में कांग्रेस की स्थिति का सवाल है तो अभी तक के रूझान कांग्रेस के लिए अच्छे साबित नहीं हो रहे हैं. कांग्रेस की समस्या यह है कि प्रदेश में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके प्रभावी नेतृत्व में वो कुछ बेहतर कर सके. दूसरी तरफ राहुल गांधी का दौरा भी मृतप्राय कांग्रेस को संजीवनी नहीं दे पा रहा है. इन परिस्थितियों में कांग्रेस चाहकर भी चारकोणीय लड़ाई के मुकाबले में खुलकर सामने नहीं आ पा रही है. नतीजतन उसे मजबूर होकर अजीत सिंह से भी राजनीतिक समझौता करना पड़ा.

लेकिन कांग्रेस के लिए बड़ा सवाल यह है कि केन्द्र में रहते हुए भी उत्तर प्रदेश में वो हाशिए पर है. इसके लिए दो बड़े मुद्दे सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं. पहला तो यह है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार से लेकर मंहगाई तक की मकड़जाल में पूरी तरह घिरा हुआ है. आज जहां भी कांग्रेस की बात आती है तो माना जाता है कि भ्रष्टाचार उसकी अनुषंगी है. खैर बात भ्रष्टाचार की हो रही है तो इसमें कोई शक नहीं कि पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहा है ऐसे में प्रदेश में कोई भी कांग्रेसी नेता जब विकास और भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आम जनमानस उनसे जानना चाहते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है. केन्द्रीय सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को छुआ है. चाहे वो राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ा हो, टूजी स्पेक्ट्रम मामला हो या फिर राज्यों में आदर्श सोसाइटी मामला हो, सबने भ्रष्टाचार का नया अध्याय लिखते हुए कांग्रेस की विश्वसनीयता और साख पर प्रश्न चिन्ह लगाया है. इसके अलावा महंगाई ने भी कांग्रेस की साख पर बट्टा लगाया है.

कांग्रेस के लिए जो दूसरा मुद्दा है प्रदेश में प्रभावी नेता का अभाव. वर्तमान में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस प्रभाव की अंतर्कलह से जूझ रही है और लगभग सभी नेता एक-दूसरे से आगे आकर या तो अपनी महत्ता साबित करने में लगे हैं या फिर राहुल गांधी का सबसे करीबी होने का स्वांग भर रहा है जिसके कारण यहां के कांग्रेस कार्यकर्ता हतोत्साहित तो हो ही रहे हैं साथ ही कांग्रेस का कोई भी नेता चाहे वो रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, पी एल पुनिया या फिर सलमान खुर्शीद ही क्यों न हो सब आपसी द्वंद्व में फंसे हुए हैं. ऐसे में कांग्रेस की लड़ाई सिर्फ राहुल गांधी की सक्रियता पर आकर टिक जाती है वो भी एक सीमित दायरे में. राहुल गांधी की सक्रियता दूसरे दलों पर आरोप मढ़ने के साथ गरीबों के घर रोटी खाने तक सीमित रह गई है.

यही कारण है कि अब तक प्रदेश में राहुल गांधी के अलावा कोई दौरा भी नहीं कर रहा है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अजीत सिंह से जो सांठ-गांठ की है वो कितना फायदेमंद साबित होगा वो आने वाला समय ही बताएगा. कुल मिलाकर देखें तो अभी तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि वो केन्द्रीय भूमिका में नजर आये और अन्य विपक्षियों के लिए कड़ी चुनौती पेश कर सके. क्योंकि प्रदेश की जनता देख रही है कि केन्द्रीय सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने कोई उपलब्ध् हासिल नहीं की है. इसके अलावा प्रदेश में अब तक राहुल के अलावा कांग्रेस का कोई और नेता न तो दौरा कर रहा है और न ही सामने आ रहा है. ऐसे में कांग्रेस वन मैन आर्मी बनकर रह गई है.

उड़ान पर है साइकिल

अभी उत्तर प्रदेश में हालात ऐसे बने हुए हैं कि यहां की जनता चारों तरफ बेहतर विकल्प ढूंढ रही है और इसमें उसकी निगाह समाजवादी पार्टी पर जाकर टिकती है. इसके पीछे कारण यह है कि लोगों ने मायावती को पिछले पांच सालों में कोई खास उपलब्धि  हासिल करते हुए नहीं देखा है. दूसरी ओर न तो कांग्रेस और न ही भाजपा की तरफ से अब तक कोई विश्वसनीयता पेश की गई है. ऐसे में प्रदेश की जनता के पास सपा और मुलायम सिंह के अलावा कोई खास विश्वसनीय चेहरा सामने नहीं आ रहा है. अब यह बात समाजवादी पार्टी पर निर्भर करता है कि सपा प्रदेश के चुनाव के मानक पर कितना तैयार है. सपा जहां मुलायम सिंह के अनुभव से लबरेज है वहीं अखिलेश यादव का युवा जोश भी कार्यकर्ताओं को उत्साहित कर रहा है और जहां तक जनता की बात है तो ये पहले तय हो चुका है कि प्रदेश की जनता चेहरा बदलने की फिराक में है.

इधर बाप-बेटों के चुनावी दौरे की बात है तो एक ओर जहां अखिलेश यादव अपने पिता के अनुभवी साइकिल पर सवार होकर 250 किलोमीटर की लम्बी यात्रा कर चुके हैं वहीं उन्होंने अब तक 132 चुनाव क्षेत्रों का दौरा कर क्रांति रथ यात्रा के सात चरण चरण पूरे कर लिए हैं. इसमें दिलचस्प बात तो यह है कि इन रैलियों में हर बार लोगों का हुजूम सामने आया है, जो मायावती के लिए खतरे की घंटी तो है ही साथ ही राहुल गांधी के लिए भी जोरदार झटका है. इसका कारण भी यही है कि जहां अखिलेश यादव ने हर बार राहुल गांधी से ज्यादा भीड़ इकट्ठा किया है और बिना किसी विवादास्पद बयान के मुद्दे की बात की है. जहां तक सपा की बसपा से तुलना की बात है तो लोगों की नजर में दोनों के लिए अलग-अलग राय है. एक वर्ग जहां सपा और मुलायम सिंह को प्रदेश में विकास का वाहक समझते हैं वहीं एक वर्ग इन्हें आपराधिक शक्तियों को बढ़ावा देने का कारण भी मानता है. हालांकि कुछ का यह भी मानना है कि मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री रहते जो विकासकार्य हुए हैं वो सैफई तक ही सिमट कर रह गया है. जहां तक मायावती के बारे में आम जनता की सोच की है तो इनके बारे में यही कहा जा रहा है कि इनके मुख्यमंत्री रहते न तो कोई विकासकार्य हुआ है और न ही कोई बड़ा निवेश. ऐसे में जो थोड़े विकासकार्य हुए हैं वो लखनऊ तक ही सीमित रह गए हैं.

अब सवाल यह खड़ा होता है कि इन दोनों में बेहतर कौन है. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी एक लंबे समय से केन्द्र और राज्य की सत्ता से बाहर रही है इसलिए इसपर कोई खास दबाव भी नहीं बन पा रहा है कि इन्होंने कोई प्रमुख कार्य नहीं किया है. जहां तक इस पार्टी पर आपराधिक तत्वों को बढ़ावा देने का आरोप वाली बात है तो अखिलेश यादव ने अपने हर चुनाव क्षेत्र में इसका जिक्र किया है और बड़ी सफाईगोशी से इस बात को स्वीकार किया है कि सत्ता में आने के बाद इस पर पूरी तरह अंकुश लगाई जाएगी. अब पूरे सियासी उठा-पटक में सपा लाभ की स्थिति में नजर आ रही है. हालांकि इसके लिए समाजवादी पार्टी को किसी भी प्रकार की मशक्कत नहीं करनी पड़ रही है, इसके लिए मात्रा विपक्षी दलों की नीतियां ही इसे आगे ला रही हैं ऐसे में सपा इस अवसर को कैसे भुनाता है देखना दिलचस्प होगा।

अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है भाजपा

एक ओर जहां कांग्रेस प्रभावी नेताओं की कमी से जूझ रही है वहीं भाजपा नेताओं की बहुलता से. याद हो कि जब उमा भारती को उत्तर प्रदेश में भाजपा की कमान सौंपी गई थी तो वो किसी भी नेताओं के गले नहीं उतर रही थीं. और लगभग सभी ने दबी जुबान उनका विरोध किया था. भारतीय जनता पार्टी के साथ विडम्बना यह है कि यहां कई नेता कतार में खड़े हैं, हालांकि भाजपा ने आधिकारिक तौर पर किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया है. अब तक चुनावी सफर में देखा गया है कि राजनाथ सिंह चर्चा में हैं और उनकी किसानी छवि को राहुल की युवा अपील पर तरजीह दी जा रही है. हालांकि पिछले महीने कलराज मिश्र और राजनाथ सिंह दोनों ने जो जनचेतना रैली निकाली थी वो मात्रा एक दूसरे पर वर्चस्व साबित करने के अलावा कुछ नहीं था. जहां तक मुद्दों की बात है तो भाजपा के पास सपा से इत्तर कोई अन्य मुद्दा नहीं है. लेकिन सपा में जहां स्पष्ट नेता है वहीं भाजपा में नहीं है. यहां आकर भाजपा की रेटिंग सपा से कम हो जाती है.

जब अन्य मुद्दों की बात करते हैं तो भाजपा भी लम्बे समय से सत्ता से दूर रही है ऐसे में उसके पास केन्द्र की कांग्रेस की और राज्य की बसपा की नीतियों को गलत साबित कर अपनी नीतियों और योजनाओं से रूबरू कराने के अलावा कोई अन्य मुद्दा भी नहीं है. हालांकि इस पूरे प्रकरन में जातिगत समीकरण को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि प्रदेश में विकास की चाहे जितनी भी बात कर ले जातीय समीकरण एक बड़े उत्प्रेरक के रूप में काम करने वाला है. गौरतलब है कि जब उमा भारती की भाजपा में वापसी हुई थी तब भी यह बात सामने आई थी कि उमा उस लोध् जाति की वोट को आकर्षित करेंगी जो कल्याण सिंह के पार्टी से हट जाने के कारण कट गए थे. इसके अलावा उमा को उत्तर प्रदेश में लाकर भाजपा ने उन मतदाताओं को भी लुभाने का कार्य किया है जिनके मन में अब भी कहीं न कहीं हिन्दूवादी विचारधरा और अयोध्या का राग है. अब विकास बनाम जाति की लड़ाई में बाजी कौन मारेगा यह कहना जल्दबाजी होगी. जब अन्य मुद्दों की बात करते हैं तो वो भी भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध जैसे मुद्दों पर ही अपने पत्ते बिछा रही है, जिसके बारे में जनता पहले से ही वाकिफ है. ऐसे में भाजपा किसी खास मुद्दे के साथ लोगों तक नहीं जाने वाली. हां अगर प्रभावी चेहरे की आड़ में चुनाव लड़ती तो माना जा सकता था कि इसका लाभ उसे मिलता लेकिन हाल की परिस्थितियों वो इनसे काफी दूर है.

इन पर भी रहेगी नजर 

ज्ञात हो कि 2007 के विधनसभा चुनाव में करीब 112 छोटे दल चुनाव में थे, ये अलग बात है कि इनमें से कुछ दलों को ही सदन तक पहुंचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. इनमें से सबसे प्रमुख पार्टी थी पूर्व प्रधनमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और राजबब्बर की अगुवाई वाली जनमोर्चा, जिसने 118 सीटों पर चुनाव लड़ा था ये अलग बात है कि उनमें से 116 सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी. लेकिन आज सबकुछ बदल चुका है. आज प्रदेश की जनता किसी नए चेहरे की तलाश में है. हालांकि आज भी उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में ऐसा कोई छोटा दल नहीं है जो अपने बूते सत्ता बदल दे. लेकिन इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि ये छोटे दल ऐसा नहीं कर सकते हैं.

आज के बदले परिदृश्य में कई सारे छोटे दल हाथ अजमा रहे हैं जो या तो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं या फिर अपनी जातीय संकट को बचाने के लिए या फिर यूं कहें अपने पुराने साथियों से बदला लेने के लिए. खैर जो भी हो यहां लड़ाई आसान नहीं होने वाली क्योंकि इस बार नौ राजनीतिक दल ऐसे हैं जो बाकि के चार बड़े दलों के चेहरे पर शिकन ला सकते हैं. इनमें से पीस पार्टी, अपना दल और बुंदेलखंड कांग्रेस ने गठजोड़ कर जो नया मोर्च खड़ा किया है वो बाकि के दलों के लिए वाकई खतरे की घंटी है. पीस पार्टी के अध्यक्ष जहां कांग्रेस और बसपा के भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रहे हैं, सपा को गुंडागर्दी और आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने का दोषी मान रहे हैं वहीं भाजपा को साम्प्रदायिक ताकतों का बढ़वा देने का भी बड़ा कारण मान रहे हैं ऐसे में उनका तीन दलों का यह नया मोर्चा पांचवें विकल्प के रूप में तेजी से उभर रहा है और शोषितों, पीड़ितों और मुख्य धरा से कटे लोगों को उभारने के लिए भी बेहतर विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं. इतना ही नहीं इस मोर्चे ने अन्य छोटे दलों के लिए भी दरवाजे खोल रखे हैं जो आने वाले समय में बड़े दलों को कड़ी चुनौती देंगे.

दिल्ली से प्रकाशित हिंदी दैनिक अमर भारती में उप संपादक पद पर कार्यरत अजय पांडेय की रिपोर्ट.

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