दिखावा था जयपुर दूरदर्शन का स्ट्रिंगर-कैमरामैन भर्ती अभियान

 

मनोरंजन धारावाहिकों के मामले में अरसा पहले बुद्धु बक्से या इडियट बॉक्स का खिताब पा चुका दूरदर्शन समाचारों के मामले में अन्य टीवी चैनलों से क्यों लुट पिट रहा है, यह प्रसार भारती, जयपुर दूरदर्शन के झालाना संस्थानिक क्षेत्र स्थित परिसर में पिछले तीन दिनों में साबित हो गया। स्ट्रिंगर पैनल बनाने के नाम पर जो प्रक्रिया या खानापूर्ति की गई वह प्रहसन से अधिक कुछ नहीं था। समाचारों की आधुनिकतम विधा के रचनाकार इस सरकारी तंत्र की कमान बीस-पच्चीस साल पहले भर्ती हुए पदोन्नत लोगों के हाथ में हैं जो समाचार सेवा नहीं बल्कि नौकरी कर रहे हैं। 
 
जुलाई 2012 में अखबारों में छपे एक विज्ञापन के जरिए राजस्थान के नगरों/कस्बों में जहां आवश्यकता हो स्ट्रिंगर/कैमरामैन का पैनल बनाने के लिए अनुभवी व्यक्तियों/फर्मों/निकाय/संस्थाओं से 14 अगस्त 2012 तक आवेदन मांगे गए थे। चौपहिया वाहन और उच्च क्वालिटी के कैमरे का मालिक होना भी जरूरी था। अर्जी उसी की मंजूर की जानी थी जो एक हजार रूपए का डिमांड ड्राफट दे दे और उसे वापस पाने की उम्मीद ना करे। अर्जी जिनकी पहुंची उन्हें 20 से 22 नवंबर 2012 को साक्षात्कार के बुलावा पत्र भेज दिए गए। उन्हें अपने साथ कैमरा और कैमरा यूनिट भी लानी थी। दो टेस्ट कवरेज की शूटिंग टेप भी लानी थी और यह हिदायत भी ध्यान रखनी थी कि जयपुर आने-जाने का कोई टीए/डीए नहीं मिलेगा।
 
राजस्थान भर से सवा सौ से पांच छह सौ किलोमीटर तक की यात्रा कर जयपुर पहुंचे लोगों ने अपना और अपने साथ कैमरामैन का आने-जाने का किराया, ठहरने और खाने-पीने का खर्च भी भुगता। जयपुर के निर्जन स्थान पर बने दूरदर्शन केंद्र तक सौ सवा सौ रुपए ऑटो रिक्शा के खर्च किए बगैर पहुंचना नामुमकिन है।
 
पहले दिन का नजारा कुछ यूं था। समय दिया गया सुबह दस बजे का। ग्यारह बजे तक कुछ नहीं हुआ। कंधों पर बैग, कैमरा, कैमरा स्टैंड थामे सभी भावी स्ट्रिंगर रिसेप्शन से पोर्च, पोर्च से लॉबी और लॉबी से बरामदे तक भटकते रहे। फिर आए समाचार विभाग के एक कोआर्डिनेटरनुमा सज्जन। ‘चलो, चलो, सब रिहर्सल रूम में पहुंचो।’ पंद्रह मिनट तक यही हांक लगाते घूमते रहे। सभी जा पहुंचे केंद्र के पिछवाडे़ बनी कैंटीन के पास रिहर्सल रूम में। यह रिहर्सल रूम नहीं बल्कि एक मीटिंग रूम था। हॉल में अंडाकार मेज के चारों ओर सटाकर लगाई गई करीब साठ-सत्तर कुर्सियां। अगर किसी को निकलना हो तो दूसरे की टांगों से सटे या उसके पैर कुचले बगैर निकलना नामुमकिन था। फिर वही सज्जन अपने साथ तीन और लोगों को लेकर आ गए। ‘हां भई, सब अपने डाक्यूमेंट चैक कराओ, और हां कैमरा भी चैक कराओ। पहले जयपुर वाले आना भई। बाकी जालोर, धौलपुर, अजमेर वाले तो बाहर के हैं, इसलिए वे आराम से आना, जाओ जब तक आप लोग नाश्ता-पानी कर आओ, चाय-चूई पी आओ।’
 
डाक्यूमेंट खुद चैक कर रहे थे। ‘अरे, उम्र के सबूत वाला डाक्यूमेंट दिखावों, दसवीं की मार्कशीट तो लाए होंगे न, वो दिखाव, बाकी सब छोड़ो, अरे छोड़ो का मतलब यार हमें मत दिखाव, उपर दिखाना, वो चार जने बैठे हैं ने उन्हीं को दिखाना। जो भी दिखाना है, उनी को दिखाना। और हां भई कैमरा इधर चैक कराव, इधर मेरे पास जो ये बैठे हैं न इनको चैक कराव।‘ इतने में किसी ने आकर उनके कान में कुछ कहा। ’अरे, तो यार, अभी चैक का काम ही नई हुवा है, अभी किधर से भेज देवें पांच जने इंटरव्यू को। हां भई, सुनो सब लोग, जिन-जिनके चैक का काम हो गिया है वो पांच-पांच जने उपर चले जाव, इंटरव्यू के लिए।’ इतने में उनका मोबाइल बज उठा। ‘अरे तो तू किधर रह गई, जल्दी आ, तुम लोगों के चक्कर में तो मैं पैले जैपुर वाले निपटा रा हूं। और उसको भी बोल क्या नाम हैं उसका जो तेरे साथ ही आता है, कबी-कबी, वो भी नी आया अब तक, बाद में मुझे तंग करोगे।’ 
 
इतने में एक हाथ में कैमरा स्टैंड, दूसरे में कैमरा और कंधे पर बैग लटकाए एक सज्जन आए। उन पर निगाह पड़ते ही वे फिर शुरू हो गए, ‘आ गए आप, यार कमाल के आदमी हो, तीन साल में सिर्फ तीन खबरें भेजी हैं, आपने अब बताव कैसे काम चलेगा, चलो फिर भी करवाते हैं आपका, पर अबकी टैम पे खबरें भेजना यार।’ ‘अरे भइया यार, आप आगे से फर्म के नाम के बिल मत भेजना, पास नी हो पाएंगे। हमें बोत दिक्कत आती है। हमें भी पता है आप मना करने के बाद भी दूसरे चैनलों के लिए काम कर रिए हो। मोटर साइकिल के आगे आज तक और पीछे डीडी का लोगो लगा रखा है, तो ध्यान रखना यार, बिल फर्म के मत भेजना आगे से, करते हैं आपका भी।’   
 
करीब दो बजे तक यही चलता रहा। इससे एक बात साफ हो गई कि राजस्थान विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के डॉ. संजीव भानावत और जयपुर दूरदर्शन की निदेशक प्रज्ञा पालीवाल गौड़ और उनके साथ दो तकनीकी अधिकारियों का साक्षात्कार मंडल शाम सात बजे तक चाहे जो कर रहा था वह शायद एक दिखावा भर था, सब कुछ पहले से तय हो चुका था कि किसका क्या करना है।
 
यह भी साफ हो गया था कि राजस्थान के जनसंपर्क निदेशालय से जुड़े कैमरामैन और फोटोग्राफर और पहले से चले आ रहे स्ट्रिंगर/कैमरामैन ही वापस रखे जाने थे। यहां तक कि जयपुर में बैठे कुछ फर्म मालिक ही दूरदराज के कई जिलों का ठेका शायद अपने नाम करवा चुके थे क्योंकि वे वहां के कैमरामैन के जरिए पहले की तरह काम कराने का इरादा जता चुके थे। यही क्यों कई ऐसे स्ट्रिंगर थे जो ऐलान करते फिर रहे थे कि जयपुर में सिर्फ दो नए लोग लिए जाएंगे बाकी चार जो पहले से काम कर रहे हैं, उनकी रिपोर्ट अच्छी है। अजमेर वाला रिपीट होगा, जालोर से तो आया ही एक है, उसका तो करना मजबूरी है आदि-आदि सब कुछ खुले में चल रहा था।
 
आश्चर्य यह था कि समाचार कवरेज के लिए बनाए जा रहे इस पैनल में समाचारों के ज्ञान पर कोई जोर नहीं दिया जा रहा था। जोर था महंगे से महंगे कैमरे पर। संदेश साफ था दसवीं पास होना जरूरी है, कैमरे चला लेना, न्यूज एंगल की परवाह मत करना, टेप भेज देना, बाकी हम हैं ना। जिस चौपहिया वाहन का होना जरूरी था, वह शर्त साक्षात्कार के दौरान नदारद थी। दो मिनट में साक्षात्कार कर लौटे जब एक सज्जन से बाहर बैठे लोगों ने उत्सुकतावश पूछा, इतनी जल्दी आ गए, क्या आप से कुछ नहीं पूछा? उन्होंने गर्व से छाती फुलाई, अपने से क्या पूछना था, पहले से डीपीआर के लिए काम करते हैं और फिर अपन ने तो रसीद दिखा दी 4सीसीडी कैमरे की। अंदर वालों ने अभी तक 4सीसीडी का नाम ही सुना है, देखा तक नहीं है।
 
इन सबसे महत्वपूर्ण बात। सुबह दस बजे से शाम सात बजे तक चले साक्षात्कार के दौरान चाय-नाश्ता या लंच तो बहुत दूर की बात है, कोई एक गिलास पानी पिलाने वाला तक नहीं था। जिसकी जेब में पैसे हैं कैंटीन से चाय और बिना हैंडल के जग से पानी पी ले। खाने के लिए कैंटीन में बिस्किट के अलावा कुछ नहीं था। केंद्र चूंकि एक निर्जन स्थान पर है, इसलिए बाहर भी दूर-दूर तक खाना तो छोड़िए चाय तक नसीब नहीं थी। पहले दिन बुलाए गए थे करीब चालीस लोग और इंटरव्यू रूम के बाहर बमुश्किल सात-आठ लोगों के बैठने का इंतजाम भी नहीं था। सारा दिन लोगों ने सीढ़ियों, चबूतरों पर बैठकर गुजारा। सोचा जा सकता है, रात भर के उनींदे, भूखे-प्यासे, थके-मांदे प्रत्याशियों पर क्या बीती होगी खासकर उस हालत में जब साक्षात्कार बोर्ड हर आधे-पौन घंटें में चाय पीने के लिए इंटरव्यू रोक रहा था और एक घंटे के लिए लंच पर जा बैठा था। एक हजार रुपए देने, अपना किराया भुगतने, पानी तक के लिए तरस जाने की स्थिति से साफ हो गया कि प्रसार भारती के अधिकारियों में सहृदयता और मानवता नाम की कोई चीज नहीं है। सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी क्या कभी इस ओर ध्यान देंगे।

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