आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी हम कैसी सत्ता व्यवस्था में जी रहे हैं, इस पर और कुछ बोलने की क्या जरूरत रह गई है? राजनीति का धंधा करने वालों ने इस देश को दोजख बना डाला है। 'अनामिका' ने मृत्यु का वरण करने का हमारा आह्वान सुन लिया। लेकिन सच है कि 'अनामिका' मरी तो जैसे पूरे देश की आत्मा मर गई। घोर शोक और उद्वेलन के इस समय में हमने तय किया कि देश को नरक में धकेलने के दोषी नेताओं का नाम और उनकी तस्वीर हम एक दिन अपने समाचार पत्र में नहीं छापेंगे, चाहे वह नेता राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री या कोई और।
…जब राजपथ पर आम आदमी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से न्याय का भरोसा चाह रहा था तो लाठियां बोल रही थीं… और जब 'अनामिका' मर गई तो सब जुट पड़े और कांव-कांव करने लगे! जब आम आदमी रोए तो उनको यह गाना लगता है, हर नेता मानवता पर अब ताना लगता है… 'अनामिका' के साथ हुई बर्बरता और सत्ता की आपराधिक उपेक्षा के खिलाफहै यह संपादकीय-प्रतिरोध… स्याह, नि:शब्द, मौन…!
वरिष्ठ पत्रकार तथा कैनविज टाइम्स के प्रधान संपादक प्रभात रंजन दीन के फेसबुक वॉल से साभार.





