देश को नहीं बल्कि खुद को बदलिए सुभाष चंद्रा जी!

: टैगलाइन बदलकर पाप छुपाने की कोशिश : नवीन जिंदल की कंपनी के खिलाफ खबरें दिखाने के नाम पर ब्‍लैकमेल करने का आरोपी जी समूह खुद की रीब्रांडिंग कर रहा है. खुद ब्‍लैकमेंलिंग के आरोपी लोग अब 'सोच बदलो देश बदलो' टैगलाइन के बहाने दूसरों की सोच बदलने और देश बदलने की बात कर रहे हैं. क्‍या सोच बदलकर आम लोग भी ब्‍लैकमेलिंग करने में जुट जाएं. सबसे बड़ी बात है कि जी न्‍यूज खुद ब्‍लैकमेलिंग करने की अपनी सोच में बदलाव लाए. टैग लाइन बदल जाने से जी के मालिकान की सोच बदल जाएगी, ऐसा लगता तो नहीं है. या फिर किसी डील के बाद जी के 'जज्‍बा सोच का' खतम हो गया है.

पिछले दिनों जिस तरह जी न्‍यूज की बनी बनाई या फिर कहें ढंकी छुपी साख सरे बाजार नीलाम हुई उस स्थिति में जी न्‍यूज को अपनी टीम को ही बदलने की जरूरत है. पर यह शायद संभव नहीं है क्‍योंकि जिस तरह के रिकार्ड पुलिस के पास हैं, उसमें लगता है कि पूरी ब्‍लैकमेलिंग की योजना सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका के जानकारी में हुई. सबसे बड़ा सवाल है कि एफआईआर में सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका का नाम दर्ज होने के बाद भी इन लोगों की गिरफ्तारी क्‍यों नहीं हुई. क्‍यों दोनों संपादकों को ही गिरफ्तार किया गया. सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका को इतना मौका दिया गया कि वे कानून के सहारे अपने बचाव का मौका तलाश लें.  

आखिर पुलिस ने उन्‍हें इसलिए अरेस्‍ट नहीं किया कि वे बड़े लोग हैं, मालिक हैं, पैसा वाले लोग हैं, सत्‍ता में इनकी सीधी पकड़ है? यह तो बहुत बड़ा अन्‍याय है. जब दोनों संपादक अपने मालिकों की सह‍मति से ही नवीन जिंदल को ब्‍लैकमेल कर रहे थे तो फिर इन्‍हें गिरफ्तार क्‍यों नहीं किया गया, क्‍यों इन्‍हें बख्‍श दिया गया? क्‍यों इन्‍हें बचने का भरपूर मौका दिया गया? शायद यही अपने देश का कानून और न्‍याय है? आप कमजोर हैं तो आपके साथ ये कानून कुछ भी कर सकता है? और आप पैसे वाले, रसूख वाले हैं तो कानून को अपने तरीके से इस्‍तेमाल कर सकते हैं. जिन लोगों को सलाखों के पीछे जाना चाहिए था वे लोग अब देश बदल रहे हैं.

जी के ब्‍लैकमेलिंग के किस्‍से अब भारत के ज्‍यादातर घरों में पहुंच चुके हैं. अब कितना भी सोच बदले जी न्‍यूज देश उसके प्रति अपना नजरिया नहीं बदल सकता. सोच बदलने की सबसे ज्‍यादा जरूरत तो खुद जी न्यूज के प्रबधंन और बड़े पत्रकारों को है. जेल-अदालत का चक्‍कर काटने के बाद शायद जी न्‍यूज का सोच बदल गया है. पर टैगलाइन बदलने से चरित्र नहीं बदला करता. गधे को कितना भी रंग पोत दें वो रेंकना नहीं छोड़ सकता है. भाई अब और क्‍या क्‍या बदलोगे? 

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