ना कानून बेबस है ना लाचार, लचर है तो ढीला और डरपोक सिस्टम

राजधानी की बस में सामूहिक दुराचार और उसकी प्रतिक्रया में उपजे युवा आंदोलन की एक परिणीति सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधिपति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में बने आयोग के रूप में सामने आई है। आयोग महिलाओं पर अत्याचार रोकने के लिए कानून में संशोधन के सुझावों के लिए गठित हुआ है। आयोग ने 5 जनवरी 2013 तक सुझाव मांगे हैं ताकि एक महीने की तय समयावधि में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर सके।

माफ कीजिएगा यह देश का ध्यान भटकाने और आंदोलनकारियों के प्रति अपनाई जाने वाली तुष्टिकरण की नीति से अधिक कुछ नहीं है। जस्टिस वर्मा और आयोग के अन्य सदस्यों की योग्यता, कर्मठता, ईमानदारी पर अपने को कोई शक नहीं है। इसमें भी संदेह नहीं कि सुझावों पर मनन और उनके आधार पर समुचित सिफारिशों के काम को वे बखूबी अंजाम देंगे। अपनी राय में देश के मौजूदा मूल कानूनों खासकर अपराधियों को सजा दिलाने से जुडे़ कानूनों में इतनी तो खामी नहीं है कि उन्हें हम पूरी तरह नकारा मान बैठें। भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान किसी भी अपराधी को सजा दिलाने और इस देश में अपराधों की रोकथाम के लिए पर्याप्त है। फिर दोष कहां हैं ? दोष हमारी व्यवस्था का है। अपन आंदोलनकारी युवाओं को दोष नहीं देते और ना ही उनकी मांग पर एतराज करते हैं।

दरअसल कानूनी समझ के लिहाज से वे मासूम हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि देश में पर्याप्त कानून नहीं है। हकीकत ठीक इसके उलट है। कानून इतने बेबस और लाचार नहीं है कि अपराधी को सजा नहीं दी जा सके। दोषी अगर कोई है तो वह है लचर व्यवस्था। ढीला और डरपोक सिस्टम। कौन बुराई ले या अपने को क्या की टालू प्रवृत्ति के हम लोग इस हद तक आदी हो चुके हैं कि उससे अपराध और अपराधियों के हौंसले बढ़ रहे हैं। लार्ड थॉमस बेबिंग्टन मैकाले और उनकी टीम ने करीब 29 साल की मशक्कत के बाद भारतीय दंड संहिता बनाई जो 1 जनवरी 1862 को देश में लागू हुई। इसे लागू होना था 1 मई 1861 को परंतु आठ महीने सिर्फ इसलिए टाला गया ताकि उस समय के न्यायाधीश और प्रशासनिक अफसरान इसको भलीभांति समझ सकें। रेल और वायुयान से जुडे़ अपराधों को छोड़कर भारतीय दंड संहिता में सभी अपराधों का जिक्र है। रेल और वायुयान उस समय थे नहीं वरना उनसे जुड़े अपराधों का भी जिक्र होता। हत्या, देश के खिलाफ युद्ध आदि अपराधों के लिए आज भी फांसी की सजा का प्रावधान है।

सवाल उठ सकता है। उठ सकता है क्यों बल्कि उठना भी चाहिए। अगर कानून पर्याप्त है, तो फिर देश में अपराध क्यों बढ़ रहे हैं? अपराधी अदालत से छूट क्यों जाते हैं? जवाब सवाल में ही खोजा जाना बेहतर रहेगा। अंग्रेजों के जमाने में भी तो यही कानून थे फिर उस समय कानून का डर क्यों था? कानून वही है, अफसर बदल गए। अफसरों की इच्छा शक्ति नहीं है। राजनीतिक हस्तक्षेप पुलिस और बहुत हद तक अदालतों पर भी हावी हो गया है। ब्रिटिश राज में पूरे देश में एक कानून था अब राज्यों ने अपनी-अपनी सुविधाओं से उनमें संशोधन कर लिए। भारतीय दंड संहिता में महिला से दुराचार के लिए सात साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है। गैंग रेप, नाबालिग या पागल से रेप यहां तक कि अपनी नाबालिग पत्नी से भी जबरन सहवास को रेप माना गया है। परंतु सजा कितनों को होती है? जो लोग अपने अधिकारों के लिए अदालत की शरण में जाते हैं, एक स्टेज पर उन्हें पछतावा होने लगता है। हमारा सिस्टम उन्हें ऐसे हालात में पहुंचा देता है कि उन्हें लगने लगता है, अदालत आकर उन्होंने कोई गलती कर दी है। लगता है उनसे खुद से कहीं अपराध हो गया है। मुकदमे के पक्षकारों को तो छोड़िए अगर आप किसी मुकदमे में गवाह हैं तो आपसे अदालत में ऐसा व्यवहार किया जाता है कि आप क्रोध और ग्लानि से भर उठते हैं। जबकि गवाह होने के नाते आप कानून की, न्याय व्यवस्था की और अदालत की मदद कर रहे होते हैं।

राजस्थान में महिलाओं से जुड़े अपराधों के लिए महिला पुलिस थाने गठित किए गए हैं। वहां महिला थानेदारों और महिला सिपाहियों की नियुक्ति को वरीयता दी जाती है। दहेज प्रताड़ना से जुड़े मामलों में लड़की का पीहर पक्ष हो या ससुराल वाले, एक को दहेज का सामान दिलाने और दूसरे को जेल और इज्जत का डर दिखाने की ऐसी-ऐसी भयावह तस्वीरें खींची जाती है और इतनी ब्लैकमेलिंग की जाती है कि दोनों ओर से सौदा हजारों नहीं बल्कि लाखों रुपए में पटता है। महिला थानेदार करोड़पति हैसियत रखती हैं। गोद में बच्चे लटकाए, पीहर वालों के दुखी परेशान चेहरे और अंधे भविष्य की दहलीज पर खड़ी महिलाओं के साथ जो हालात होते हैं वह उनके साथ हो रहा बौद्धिक बलात्कार नहीं तो और क्या है?

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-309 कहती है, जज चाहे तो कारण लिखते हुए मुकदमे की सुनवाई टाल कर अगली तारीख दे सकते हैं। इसी की आड़ लेते हुए पूरे देश की आपराधिक अदालतों का ढांचा चरमरा गया है। इसी धारा में आगे कहा गया है कि मुकदमे में एक बार गवाही शुरू हो जाए तो फिर वह दिन-प्रतिदिन तब तक चलनी चाहिए जब तक सभी गवाहों के बयान पूरे ना हो जाए परंतु हम ना तो इसे पढ़ने में रूचि रखते हैं और ना ही इसके पालन में। धारा-309 का एक हिस्सा हम जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं और बाकी हिस्से को जानबूझकर भुला चुके हैं।

अपराधी की कोशिश होती है कि किसी भी तरह से एक बार जमानत पर छूट जाए फिर किसी ना किसी बहाने मुकदमे में तारीख पेशियां लेकर मुकदमा लम्बा खींचा जाता है। गवाहों की खरीद फरोख्त से लेकर उन्हें डराने, धमकाने यहां तक की जान से मार देने तक को अंजाम दिया जाता है। कई दफा तो मुकदमा इतना पुराना हो जाता है कि गवाह को ठीक से याद तक नहीं रहता कि वारदात क्या थी। दिन, तारीख, साल, मौसम, समय, कपड़ों के रंग आदि ऐसे-ऐसे उल्टे-पुल्टे सवाल पूछे जाते हैं कि उसे झूठा साबित कर दिया जाता है। सिस्टम सुधारना है तो गंभीर मामलों के अपराधियों को जमानत पर रिहा करने और उनकी अग्रिम जमानत मंजूर करने जैसी धाराएं 437, 438, 439 दंड प्रक्रिया संहिता से हटा क्यों नहीं दी जाती? अगर हटाई नहीं जा सकती तो इन्हें इतना लचीला क्यों बना दिया गया है कि पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगने लग गए?

हाईकोर्ट्स में मुकदमों की सुनवाई खासकर जमानत और दीवानी मामलों में स्टे के लिए न्यायाधीशों का रोस्टर होता है जो पहले से तय नहीं होता। इसे बेंच बदलना कहते हैं। जब भी पहला सवाल जमानत या स्टे का आता है तो दूसरा सवाल आता है किस जज की बेंच चल रही है? न्यायपालिका के प्रति अपन पूर्ण सम्मान रखते हैं और किसी की अवमानना का कोई इरादा भी नहीं है फिर भी यह कड़वी हकीकत बताने की मजबूरी है कि हाईकोर्ट में वकील खुद यह कहते नजर आते हैं अभी जमानत की अर्जी नहीं लगाएंगे या स्टे पिटीशन दाखिल नहीं करेंगे क्योंकि बेंच उनके मतलब की नहीं है। अपने मतलब की बेंच का मतलब क्या है? क्यों जरा सी हैसियत वाला अपराधी अपराध करने के बाद छाती ठोंक कर दो दिन में जमानत पर छूट आने या नाकारा, भ्रष्ट सरकारी अधिकारी अपने सस्पेंशन पर स्टे ले आने का दावा करता है और वे ऐसा कर भी दिखाता है। ऐसी बातें क्यों कर अब फिल्मों के डॉयलाग बन चुकी हैं।   

पुलिस, सीआईडी, सीबीआई वगैरह-वगैरह ठोक बजाकर और हर पहलू, नजरिए, बारीकी से अपराध की जांच कर, अपराधी को गिरफ्तार कर अदालत के सामने मुकदमा पेश कर देती है, बाद में वही अपराधी जांच की खामियों की आड़ लेकर बरी, सॉरी बरी नहीं, ‘बाइज्जत बरी’ कैसे हो जाता है? जांच करने वाली एजेंसी और उसके काबिल जांच अफसरों की जवाबदेही क्यों नहीं तय की जाती? इस सवाल का जवाब क्यों नहीं ढूंढा जाता है कि अगर अपराध हुआ है तो फिर अपराधी कहां हैं। जो बाइज्जत बरी हो गया, जाहिर है उसे अदालत ने अपराधी नहीं माना तो फिर अपराधी है कौन? उसे ढूंढा क्यों नहीं जाता? उन काबिल पुलिस अफसरों से यह सवाल क्यों नहीं किया जाता कि हत्या, मारपीट, बलात्कार के जिस अपराधी को वे पकड़कर लाए थे उसे अपराधी साबित नहीं किया जा सका तो फिर असली अपराधी कौन है? ब्रिटिश जज ऐसे मामलों में उस जांच अधिकारी को दोषी ठहराते थे, उसकी जिम्मेदारी तय करते थे, अपराधी के छूटने को जांच अधिकारी की नौकरी से जोड़ा जाता था? अब ऐसा क्यों नहीं होता?

दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन के पहले सन् 1972 तक जो अफसर मुकदमे की जांच करता था, उसे ही अदालत में उस मुकदमे को साबित करना होता था। बाद में यह स्थिति बदल दी गई। अब जांच अधिकारी लीपापोती कर मुकदमे का चालान पेश कर देता है, उसे पता है मुकदमा पिटेगा परंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। सरकारी वकील यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से हट जाता है कि जांच में खामी रही इसलिए अपराधी बरी हो गया। भुगतना पीड़ित को पड़ता है जो पहले से ही भुगत रहा होता है। अंग्रेजों के जमाने में पुलिस का गवाह अगर अपने बयानों से अदालत में मुकर जाता था, कानूनी भाषा में होस्टाइल हो जाता था तो जज उसके खिलाफ झूठी गवाही का मुकदमा दर्ज करने में चूकते नहीं थे। ऐसे मुकदमों में जज को खुद परिवादी बनना पड़ता है और दूसरी अदालत में गवाह के कटघरे में खड़े़ होकर बयान देने पड़ते हैं। आज आए दिन झूठी गवाहियों के कारण अपराधी बरी हो रहे हैं। यहां तक कि सरकारी कर्मचारी और पुलिस कर्मचारी तक बयान से पलट जाते हैं परंतु सिस्टम को अपराधियों का बरी होना मंजूर है झूठे गवाहों के खिलाफ कार्रवाई मंजूर नहीं है।

कानून में हर अपराध की सजा का प्रावधान है। उदाहरण के लिए पहले षड़्यंत्र यानि साजिश, फिर अपराध की तैयारी, फिर अपराध करना आदि-आदि। ऐसे में साजिश के लिए अलग सजा होगी, तैयारी के लिए अलग और अपराध के लिए अलग। हमारे यहां सजा देने के बाद फैसले में एक लाइन और लिख दी जाती है ‘सभी सजाएं एक साथ चलेंगी’ यानि अगर साजिश के लिए सात साल, तैयारी के लिए दो साल और अपराध के लिए दस साल सजा दी गई है तो अपराधी अधिकतम दस साल की ही सजा भुगतेगा। अमेरिका जैसे कई देशों में ऐसा नहीं है। वहां सजाएं एक के बाद एक चलेगी यानि ऐसे मामले में अपराधी को उन्नीस साल की सजा भुगतनी पड़ती है। क्या वक्त नहीं आ गया जब हमारे यहां भी सजाएं साथ चलने की परिपाटी को तिलांजलि देनी चाहिए और सजाएं एक के बाद एक भुगतने की व्यवस्था करनी चाहिए। किसी भी शब्दकोश में उम्रकैद का मतलब आजीवन कैद से अलग कुछ नहीं होगा। अंग्रेजी में लाइफ इम्प्रिसनमेंट, इसके बावजूद ना जाने कैसे हमारे यहां उम्र कैद का मतलब 14 साल से निकाल लिया गया और उसी आधार पर उम्र कैद की सजा पाए अपराधी को 14 साल बाद रिहा करने की परिपाटी बन गई।

आजकल हर बड़ा अपराधी पैसा और प्रभाव रखता है। अव्वल तो वह अपने द्वारा किए या करवाए गए अपराध में फंसता नहीं। फंस जाता है तो बहुत जल्द जमानत पर बाहर आ जाता है। जमानत पर आने के बाद वह ऐसा चक्कर चलाता है कि उसके खिलाफ जो चालान पेश होता है, वह इतना कमजोर होता है कि अदालत उसे डिस्चार्ज यानि सुनवाई से पहले ही छोड़ देती है। अगर उसे डिस्चार्ज नहीं किया जाता तो वह गवाहों को तोड़ मरोड़कर, सबूतों को नष्ट करवाकर बरी हो जाता है। अगर बरी होने में कामयाब नहीं होता तो वह सजा की अपील कर जल्द से जल्द जेल ये बाहर आ जाता है। अगर अपील में नही छूट पाता तो पैसे, प्रभाव और रसूखात के दम पर वह पैरोल पर छूट जाता है और अपने मुकदमे की समीक्षा करवाकर उसे राज्यपाल या राष्ट्रपति के समक्ष फांसी है तो उम्र कैद में बदलवाने में, उम्र कैद है तो उसे पांच-दस साल करवाने में और पांच-दस साल की सजा है तो उसे जितना समय रह चुका है, यानि भुगती हुई सजा के आधार पर ही रहम के नाम पर रिहा होने में कामयाब हो जाता है।

देश में फास्ट ट्रैक अदालतों की बड़ी तारीफ हो रही है। कानून में फेरबदल के नारेबाजी में एक नारा फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन का भी है। नारा लगाते समय हम भूल जाते हैं कि फास्ट ट्रैक अदालतों के लिए कोई नहीं भारतीय दंड संहिता, नई दंड प्रक्रिया संहिता या नया साक्ष्य अधिनियम नहीं लाया गया था। वही कानून थे जो पहले थे और आज भी हैं। सिर्फ अदालतों की सोच बदली गई थी। अनावश्यक तारीखपेशी देने पर रोक लगा दी गई थी और हर महीने चौदह मुकदमे अनिवार्य रूप से तय करने की बाध्यता लागू कर दी गई थी। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए, अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए और अंग्रेजों द्वारा इन्हीं कानूनों के आधार पर मुकदमे निपटाकर अपराधों पर अंकुश लगाने की बात को एकबारगी छोड़ दीजिए तो फिर याद कीजिए पिछले दस सालों में फास्ट ट्रैक अदालतों के कामकाज को। इन्हीं कानूनों के जरिए आपराधिक मुकदमे निपटाने और बहुत कम ही सही किसी हद तक तो अपराधों पर काबू करने में भी सफलता के उदाहरण हमारे सामने हैं। ऐसे में क्यों नहीं हम सोच और सिस्टम बदलने की बात करें, कानून में संशोधन की मांग करेंगे तो सरकारें आयोग बनाएंगी। सरकारों को पता है, जनता की याददाश्त काफी कमजोर होती है। रिपोर्ट आते-आते आएगी और आएगी तब आएगी और लागू की जाएगी तब की जाएगी फिलहाल तो उनका पीछा छूट जाता है। 

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

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