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सुख-दुख...

पक्षपाती भूमिका निभाते हैं न्‍यूज चैनल?

 

दो प्रमुख चुनावी राज्यों गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में हमने बड़ी रुचि से चुनाव प्रचार देखा और प्रेस कांफ्रेंसों में निजी हमलों पर आधारित भाषा के निम्न स्तर के इस्तेमाल को देख कर आघात पहुंचा। यह शर्मनाक है क्योंकि ये युवा ही हैं जो प्रमुख मतदाता हैं और इतना पढ़े-लिखे हैं कि अच्छे-बुरे के बीच अंतर कर सकें। खैर आज लोग यह महसूस करने लगे हैं कि तू-तू मैं-मैं की राजनीति तथा अनावश्यक मुद्दों पर चीख-चिल्लाहट साथ-साथ चलती रहेगी।

 

दो प्रमुख चुनावी राज्यों गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में हमने बड़ी रुचि से चुनाव प्रचार देखा और प्रेस कांफ्रेंसों में निजी हमलों पर आधारित भाषा के निम्न स्तर के इस्तेमाल को देख कर आघात पहुंचा। यह शर्मनाक है क्योंकि ये युवा ही हैं जो प्रमुख मतदाता हैं और इतना पढ़े-लिखे हैं कि अच्छे-बुरे के बीच अंतर कर सकें। खैर आज लोग यह महसूस करने लगे हैं कि तू-तू मैं-मैं की राजनीति तथा अनावश्यक मुद्दों पर चीख-चिल्लाहट साथ-साथ चलती रहेगी।
 
समाचार टैलीविजन चैनल्स राजनीति तथा राजनीतिज्ञों पर चर्चा के दौरान अधिक मनोरंजक बनने का प्रयास कर रहे हैं। ये चैनल प्रयास करते हैं और उनके पास हास्य, अपराध तथा स्कैंडल, सब कुछ होता है। कोई भी आसानी से भांप लेता है कि अमुक चैनल का झुकाव किसकी तरफ है। उम्मीदवार स्पष्ट तौर पर यह शिकायत करते आ रहे हैं कि किस तरह से ये समाचार चैनल पक्षपाती भूमिका निभाते हैं।
 
स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं से कुछ लाभ पर आधारित निजी नजदीकियां समाचारों की कवरेज पर असर डालती हैं। यह बहुत दुखद स्थिति है कि हमारा मीडिया आज एक ऐसे निचले स्तर तक पहुंच गया है जहां व्यवसायी मीडिया प्रमुखों पर सिंटग आप्रेशन कर रहे हैं। इससे अधिक शर्मनाक क्या होगा? जनता धीरे-धीरे समाचारों की बजाय मनोरंजन चैनलों की ओर मुड़ रही है क्योंकि लोगों के मन में यह भावना भर गई है कि इनमें देखने को कुछ नहीं रहा। इन दिनों एकमात्र असल समाचार चैनल जैसा कि बहुत से लोग महसूस करते हैं केवल हमारा अपना अच्छा पुराना दूरदर्शन है।
 
एक दिन एक डिनर पार्टी में लोग चर्चा कर रहे थे कि एक समय था जब एक ‘व्हिसल ब्लोअर’ ने प्रैस तथा जनता को सम्बोधित करना होता था तो लोग अपने टैलीविजन सैटों से चिपक जाते थे। आज वास्तव में हर कोई स्वयंभू हीरोज से तंग आ चुका है जो खुद को जमीर जीवित रखने वाला बताते हैं। नि:संदेह मैं ऐसे लोगों से बहुत प्रभावित हूं लेकिन मैं समझती हूं कि लोग निरर्थक बातों पर आधारित ताजा प्राप्तियों से कुछ ऊब चुके हैं जिनसे निर्दोष लोगों की प्रतिष्ठा खराब की जा रही है।
 
एक नाम बनाने के लिए वर्षों तथा पीढिय़ां लग जाती हैं। हर किसी से गलतियां होती हैं आखिरकार इंसान ही तो हैं। लोग अब तंग आ चुके हैं कि आम जनता से जब कोई चुनाव लड़ता है तथा जीतता है तो वह चुनाव आयोग की नजरों में आ जाता है। हमारी एक लोकतांत्रिक प्रणाली है जिसका सारी दुनिया सम्मान करती है। आधारहीन आरोप लगा कर किसी की छवि तथा ख्याति को तार-तार करना एक ऐसी बात है जो आज न केवल आम आदमी को गुस्सा दिलाती है बल्कि उस व्यक्ति की विश्वसनीयता को भी नष्ट कर देती है जो यह प्रश्र उठाता है।
 
मगर बड़े दुख की बात है कि जो हीरो बहुत बड़े भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, व्यवसासियों तथा अधिकारियों से पर्दा हटाते हैं, कभी भी खुद चुनाव नहीं जीत पाते। हिमाचल प्रदेश तथा गुजरात के चुनावों के दौरान एक-दूसरे पर निजी हमले किए गए तथा किए जा रहे हैं। एक राज्य के वरिष्ठ नेता का एक युवा सांसद द्वारा बार-बार यह कह कर अपमान किया गया कि बुजुर्ग राजनीतिज्ञ अपना मानसिक संतुलन खो चुका है और बंदर जैसा दिखाई देता है। कौन इसकी प्रशंसा करेगा?
 
यह केवल खराब पालन-पोषण, गलत शिक्षा को प्रदर्शित करता है तथा वोटर को पूरी तरह से पार्टी से अलग-थलग कर देता है जो इस तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करती है। आखिरकार एक व्यक्ति जो 50 वर्षों से राजनीति में है पहली बार संसद सदस्य बनकर मजा करने वाले के मुकाबले अधिक सम्मान की मांग करता है। लापरवाह होकर आरोप लगाए जाते हैं और फिर आरोपी को खुद को निर्दोष साबित करने के लिए छोड़ दिया जाता है।
 
यदि आरोप गलत साबित हों तो आरोप लगाने वाले को सजा मिलनी चाहिए तथा मीडिया को माफी मांगनी चाहिए। यह कैसे सम्भव होगा इस पर कार्य किया जाना चाहिए।यह दुख की बात है कि आम आदमी को लाभ पहुंचाने वाले मुद्दों तथा नीतियों पर चुनाव लडऩे की बजाय टैलीविजन चैनलों पर ‘नम्बर बनाने’ के लिए एक-दूसरे को बेइज्जत करने हेतु निजी हमले किए जा रहे हैं।
 
लेखिका देवी चेरियन वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. उनका यह लेख पंजाब केसरी में प्रकाशित हो चुका है. 
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