”पता नहीं उस लड़की के मन में मुझसे कौन सा बैर था”

भूलना आदमी की व्यक्तिगत समस्या है। लेकिन नजर पड़ते ही आदमी याद आ जाता है। अभी-अभी सोशल नेटवर्किंग साइट के साथ ही एक न्यूज़ वेब पोर्टल पर द हिन्द समाचार लिमिटेड, जालंधर के तात्कालीन प्रबंध संपादक अविनाश चोपड़ा जी का एक कार्टून देखा। यह कार्टून क्या दर्शाता है और इसकी रचना के पीछे कार्टूनिस्ट की क्या मंशा है? इस जिरह में नहीं पड़ना चाहता।

बात करीब डेढ़ दशक पुरानी है। मैं नई दिल्ली के एक फीचर एजेंसी के लिये "राजनीति की गलियों से" एवं "सत्ता के गलियारे से" नामक स्तंभ लिखा करता था। यह स्तंभ देश के दर्जनों समाचार पत्र-पत्रिकाओं के साथ द हिन्द समाचार लिमिटेड के दैनिक पंजाब केसरी मे भी प्रकाशित हुआ करता था। एजेंसी के मार्फत से डाक द्वारा दैनिक पंजाब केसरी में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित रंगीन कतरने जब हाथ में आती थी तो मन मस्तिष्क में गजब का उत्साह संचरित हो उठता था। मैं जो भी लिखता था, ऐसे तो वह राजनेताओं और व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक लहजे में चोट होती थी, लेकिन उस चोट को एक तरह से संपादकीय नीति के तहत प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित करना दैनिक पंजाब केसरी के ही बूते की बात थी।

उस समय मैं पटना के एक प्रतिष्ठित संस्थान से कंप्यूटर प्लस क्वलिटी मैनेजमेंट कोर्स कर रहा था। एक दिन क्या मन में आया कि प्राइवेट बूथ (उस समय मोबाइल एकाध बाबुओं के ही हाथ की शोभा थी) से दैनिक पंजाब केसरी के संपादकीय कार्यालय जालंधर फोन घुमा दिया। तब फोन घुमाने का एकमात्र लक्ष्य संपादक जी को धन्यवाद देना और लेखन के नये-नये मुद्दे पर मार्गदर्शन लेना था। जब मैंने दैनिक पंजाब केसरी के जालंधर कार्यालय में फोन पर संपादक जी से थोड़ी सी बात करने की इच्छा प्रकट की तो जबाव मिला कि बाबू जी (संपादक विजय कुमार चोपड़ा) तो नहीं हैं, आप अविनाश जी से बात करनी हो तो कर लो। उन्होंने मेरी लेखनी की प्रसंशा की और कहा कि बस यूं ही आगे लिखते रहिये। कुछ सप्ताह बाद फिर मैंने फिर फोन किया और अविनाश जी से पटना से संवाद संकलन, लेखन एवं संप्रेषण करने की इच्छा जताई। इस पर उन्होंने समाचार भेजने को कहा। तब पढ़ाई से वक्त चुराते हुये पटना से कई ऐसी खबरें मैंने भेजी, जो प्रमुखता से प्रकाशित हुई। इसके पूर्व मैंने पटना से प्रकाशित एक लोकप्रिय हिन्दी दैनिक समेत कई पत्र-पत्रिकाओं के लिये मुजफ्फरपुर से समाचार संकलन, लेखन व संप्रेषण के कार्य कर चुका था।  

इसके बाद कोर्स के खत्म होते ही मुझे राजधानी पटना से करीब 70 किलोमीटर पूरब-दक्षिण नालंदा जिला अवस्थित गांव लौटना पड़ा। क्योंकि मुझ जैसे आर्थिक वर्ग के युवक को पटना में किराये पर रहना संभव नहीं था। गांव लौटने पर मजदूरों संग खेती-बारी का काम भी देखना पड़ता था। एक दिन की बात है। मैं भीषण गर्मी (लू भरी हवा के बीच) में खेत में लगे प्याज की क्यारी पानी से पटा रहा था कि खेत किनारे रास्ते से गुजरते गांव के ही एक भले चाचा ने मुझे सुनाते हुये कहा- "पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो रे कुदरत का खेल" चाचा की यह बात मुझे लग गई। काम खत्म होते ही मैं घर आया और सादे कागज पर 3-4 आवेदन-बायोडाटा लिखा और उसके दूसरे दिन उसे संभावित कंपनियों को भेज दिया। उसमें एक द हिंद समाचार लिमिटेड, जालंधर भी एक था।

संयोग देखिये कि करीब एक सप्ताह बाद श्री अविनाश चोपड़ा, प्रबंध संपादक, द हिंद समाचार लिमिटेड की ओर से एक पत्र आया। इस पत्र को मैंने अपनी मां (सरकारी स्कूल में शिक्षिका, अब सेवानिवृत) को दिखाया और कुछ पैसे की मांग की। पहले तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि इतनी कम उम्र में बिहार से बाहर इतनी दूर नहीं जाना है। शायद उनकी ममता मुझे रोक रही थी। मैं समझता हूं कि मां के मना करने का एक बड़ा कारण यह था कि तब मेरे जिले के प्रायः बेरोजगार युवक पंजाब और हरियाणा की राह अधिक पकड़ते थे। क्योंकि मां ने तब यह भी कहा था- "गांव वाला सब यही कहेगा कि देखअ न, अध्यापिका जी ने अपन बेटबो को कमाय ला पंजाब औ हरियाणा भेज दिये हैं"।

इस पर मेरी जिद ने मेरी मां को समझाया कि मां, मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अब तक प्रेस के बाहर ही काम किया है। प्रेस के अंदर काम करने का कोई अनुभव नहीं है। मैं सिर्फ काम सीखने जा रहा हूं। फिर वापस लौट आउंगा। इसके बाद मां ने जालंधर आने-जाने के लिये किसी तरह जुगाड़ कर 2000 रुपये दे दिये। जुगाड़ शब्द का जिक्र मुझे इसलिये करना पड़ रहा है कि तब सरकारी स्कूल की एक शिक्षिका की सैलरी किसी तरह घर चलाने में भी कम पड़ती थी। वह तो खेती-बारी से बहुत कुछ आय हो जाती थी। इस संदर्भ में बाद में पता चला कि मां ने एक प्याज व्यापारी से कर्ज लेकर मुझे पैसे दिये थे।

मां से पैसे मिलते ही एक ब्रीफकेस में जरुरी कागजात और कुछ कपड़े लेकर ट्रेन से पहले नई दिल्ली और फिर नई दिल्ली से बस पकड़ कर जालंधर बस स्टैंड पहुंचा। फिर वहां से रिक्शा पकड़ कर द हिन्द समाचार लेन। दैनिक पंजाब केसरी का प्रधान कार्यालय इसी लेन में है। इस लेन की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था देख मैं चकित था। चप्पे-चप्पे पर सेना की कड़ी पूछताछ। चाहे कोई हो। बिना मेटल डिडेक्टर के संपादकीय-प्रेस दफ्तर में प्रवेश नहीं कर सकता था। अंदर प्रवेश करते ही मुझे अविनाश जी से मिलाया गया। मुझ पर नजर पड़ते ही उन्होंने मुस्कुराते हुये कहा- "आप आ गये। चेतन शर्मा जी से मिल लीजिये"। फिर चेतन जी से मिला। उन्होंने मुझे दैनिक पंजाब केसरी के हिमाचल केसरी संस्करण के प्रभारी शक्ति सुमन के साथ लगा दिया। हिमाचल केसरी संस्करण के टेबुल पर एक और युवती सीना गांधी कार्य करती थी। कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक-ठाक चला। मेरे काम से किसी को कोई शिकायत नहीं थी। मैं रिपोर्टरों द्वारा भेजे गये समाचारों को कड़ी मेहनत से पुनर्लेखन-संपादन करता था। फ्रूफ रीडर तक संतोष प्रकट करते थे। लेकिन, जैसे-जैसे समय गुजरने लगा, कुछ लोगों की आंखों में खटकने लगा। संपादकीय प्रभारी द्वारा मुझ पर कार्य में लापरवाही के आरोप लगने लगे।

दरअसल, मुझमें अच्छी कहिये या बुरी, वो आदत आज तक नहीं छूटी है और वह है सामने वाले पर आत्मा से विश्वास कर लेना। आज करीब 22 वर्षीय अपनी पत्रकारिता के पड़ाव में जब भी मुझे नुकसान हुआ, मुझे थमना पड़ा तो वह सामने वाले पर अति विश्वास करने के कारण ही। शक्ति सुमन जी की अनुपस्थिति में फ्रूफ रीडिंग सेक्शन में संपादित कॉपी साथी सीना गांधी को दे देता था। उस लड़की के मन में मुझसे कौन सा बप्पा वैर था कि वह संपादित कॉपी में रास्ते में छेड़छाड़ करने लगी। अशुद्धियां वे डालती और फ्रूफ रीडर महोदय क्लास मेरा लेते। हर जगह देखा कि कुछ दिनों के बाद मुझे दूसरे नजर से देखा जा रहा है। लेकिन कोई मुझसे खुल कर नहीं बोलता तो मेरी समझ में सिर्फ इसलिये कि मुझे सीधे अविनाश जी के कहने पर रखा गया था और जालंधर जैसे शहर में मेरे रहने-सहने, खाने-पीने आदि सारा का प्रबंध उन्हीं के द्वारा किया गया था। क्योंकि अविनाश जी को पहली मुलाकात में मैंने स्पष्ट कर दिया था कि सर, मैं गांव से जालंधर आने और वापस लौटने का खर्च लेकर ही आया हूं।

दूसरी बात, मुझे यह लगता है कि मैं लोगों के सामने कुछ ज्यादा ही स्मार्ट बनने लगा था। चूंकि मेरे पास खाली वक्त रहता था, इसलिये मैं सबसे एक घंटा पहले ही संपादकीय विभाग में प्रवेश कर जाता था और इस दौरान दैनिक पंजाब केसरी के सभी संस्करणों को गौर से अध्ययन करता था। अध्ययन के बाद प्रायः संस्करणों में कई बड़ी भूलें सामने आती थी। उससे मैं कभी समाचार संपादक चेतन शर्मा जी तो कभी उस संस्करण के प्रभारी को अवगत कराता था। शीर्षकों में भूलें आम दिखती थी। एक ही समाचार अलग-अगल शीर्षकों से एक से अधिक पन्नों पर नजर आते थे। संपादकीय विभाग के कुछ लोगों के बीच उत्पन्न खिन्नता का एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है।

बात कुछ भी हो। आज जीवन के इस मुश्किल दौर में प्रिंट मीडिया का जो भी गहन अनुभव मेरे अंदर है, उसकी मजबूत नींव श्री अविनाश कुमार चोपड़ा जी की कृपा से दैनिक पंजाब केसरी ने ही डाली है। आज जब भी दैनिक पंजाब केसरी की याद आती है तो वे सारे चेहरे मेरे सामने मुस्कुराने लगते हैं। अब कौन कहां हैं, मुझे कुछ मालूम नहीं। आखिर विछोह के डेढ़ दशक मायने रखते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि कार्य करने के दौरान एक बार मुझे संपादक विजय कुमार चोपड़ा जी के आमने-सामने होने का मौका मिला। तब उन्होंने मुझसे पूछा कि सब ठीक है ना बेटा। सचमुच उनके मुंह से बेटा शब्द सुनना एक बड़ा आत्मीय पुरस्कार से कम न था। अब ईश्वर जाने कि इस जीवन में ऐसे प्रतिभा-तराशी लोगों से पुनः आशीर्वाद लेने का शुभ अवसर प्राप्त होगा कि नहीं।

लेखक मुकेश भारतीय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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