फिर किस तरह और क्यों ये शहर महिलाओं के लिए महफ़ूज़ नहीं रहा?

देर रात, इंडिया गेट से आया हूं. कल वहां दिल्ली के उन छह दरिंदों के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन था, जिनके वहशीपन की वजह से एक मासूम अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जूझ रही है. हम इंडिया गेट पर अपनी और अपने चैनल की मौजूदगी दर्ज करा रहे थे. आवाज़ लगा रहे थे और वहां से उठने वाली एक-एक आवाज़ को घर-घर तक पहुंचा रहे थे. इस भरोसे के साथ कि तब नहीं तो अब, हालात बदलेंगे. अब सब जागेंगे. शाम से देर रात तक इंडिया गेट एक दर्द का गवाह बनता रहा. विरोध के स्वर उठते रहे और एक आश्वस्ति बनती रही, कि सड़क से उठने वाली ये गूंज संसद तक ज़रूर पहुंचेगी. अंधेरे के ख़िलाफ़ कुछ ही सही मगर चिराग़ टिमटिमाएंगे. रौशनी जगाएंगे.

देर रात, इंडिया गेट से घर आते हुए, सारे रास्ते मैं यही सोचता रहा कि कैसी विडंबना है.? इस देश की सत्ताधारी पार्टी की मुखिया महिला है.! देश की सर्वमान्य सर्वोच्च संसद की गद्दी पर जो आसीन है वह भी एक महिला ही है.! देश की नेता-प्रतिपक्ष, महिला ही है.! और तो और.!! एक दशक से इस शहर के मुखिया की गद्दी पर भी एक महिला ही क़ाबिज़ है.!! फिर किस तरह और क्यों ये शहर महिलाओं के लिए महफ़ूज़ नहीं रहा.? क्या ये इनकी लापरवाही है या इन्हें चुनना हमारी चूक.?

आजतक के वरिष्‍ठ पत्रकार आलोक श्रीवास्‍तव के एफबी वॉल से साभार.

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