फैजाबाद दंगा में मीडिया की भूमिका की जांच : पीसीआई की टीम को जाना था जापान, पहुंच गई चीन

: तीन महीना बीतने के बावजूद चिडि़या की पूंछ नदारद : समिति के बजाय शिकायतकर्ता कर रहे हैं गवाहों से पूछताछ : फैजाबाद : तीन महीना बीत जाने के बावजूद फैजाबाद दंगे में मीडिया की भूमिका जांचने के लिए बनी भारतीय प्रेस परिषद की एक सदस्‍यीय कमेटी का कामधाम अब तक सिफर है। हालांकि शनिवार 5 जनवरी को इस कमेटी का कार्यकाल खत्‍म होना जाना है, लेकिन पूरी आशंका है कि इसकी दुर्गति लिब्राहन-आयोग की ही तरह होगी। इतना ही नहीं, 3 महीने में ही यह कमेटी खुद ही विवादों में आ गयी है। ज्‍यादातर गवाहों ने तो कमेटी के औचित्‍य पर ही प्रश्‍न लगा दिये हैं।

दशहरे के मौके पर शहर में भड़के दंगे के बाद एक समाजसेवी शीतल गायकवाड़ ने प्रेस काउंसिल को शिकायत भेजी थी कि शहर के एक अखबार को फूंक दिया गया था और एक दैनिक अखबार को छोड़कर सारे अखबारों ने इस दंगे पर अपनी भूमिका आपत्तिजनक रखी है। इस शिकायत पर जस्टिस काटजू ने फैजाबाद के एक वरिष्‍ठ पत्रकार शीतला सिंह की एक सदस्‍यीय कमेटी गठित कर दी थी। राज्‍य सरकार ने इस कमेटी के आफिस के लिए सर्किट हाउस में एक सुईट अलाट कर दिया और कामधाम के लिए नीली बत्‍ती लगी एक कार भी थमा दी। इतना ही नहीं, सूचना विभाग ने कमेटी के कामकाज के लिए एक लाख रुपयों की ग्रांट भी दे दी थी। बताते चलें कि इस दंगे के बाद से ही सरकार ने प्रदेश के एडीजी-पुलिस, जिलाधिकारी, एसएसपी समेत छोटे-मोटे दर्जन भर अफसरों को अपने से पदों से हटा दिया था।

इस बात को तीन महीना हो चुके हैं। आज करीब सौ सवा गवाहों को बुलाया जा चुका है, जिनमें से 95 फीसदी लोग एक ही समुदाय से जुड़े हैं। कई प्रशासनिक और पुलिस अफसरों को भी इस कमेटी ने बयान के लिए बुला रखा है। लेकिन हैरत की बात है कि जिन लोगों को गवाही के लिए बुलवाया गया है, उन्‍हें उस पत्र की प्रतिलिपि भी नहीं दी है, जिसे शिकायतकर्ताओं ने परिषद को भेजा था। जाहिर है कि पत्रकारों, अधिकारियों और समाज के दीगर इलाकों के लोगों में नाराजगी है। सबसे ज्‍यादा दिक्‍कत तो प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को हो रही है। कारण यह कि इस कमेटी को इन लोगों को इस मामले में बुलाने की जरूरत तक समझ नहीं पायी है।

दरअसल, परिषद या उसकी कोई कमेटी केवल आरोप के आधार पर ही किसी को गवाही के लिए बुला सकती है, ना कि आरोप से अलग। कमेटी मीडिया के प्रति अथवा उसके विरुद्ध किसी मामले की ही शिकायत कर रही है और ताजा मामले में केवल मीडिया के अलावा किसी और पुलिस या प्रशासनिक क्षेत्र के किसी अंग-प्रत्‍यंग के खिलाफ कोई मामला ही नहीं बनता है। इन हालातों में कई अधिकारियों का आरोप है कि यह कमेटी अपने अधिकार-क्षेत्र का उल्‍लंघन कर रही है। यही कारण है कि गुरुवार 3 जनवरी को जब तत्‍कालीन डीएम दीपक अग्रवाल जब कमेटी के सामने प्रस्‍तुत हुए तो उन्‍होंने खुद को बुलाने के औचित्‍य पर ही सवाल कर दिया। बताते हैं कि इस सवाल के उछलते ही यह एक सदस्‍यीय कमेटी बगलें झांकने लगी। तब तो और भी माखौल बन गया जब कमेटी के सामने एक गवाह ने यहां तक कह दिया कि बेहतर है कि कमेटी अपना दायित्‍व छोड़ कर मद्रास नगर निगम के नाला-सफाई या रेल-टिकटों पर लगने वाली लम्‍बी लाइनों पर क्‍यों सवाल कर रही है।

कमेटी के तौर-तरीकों को लेकर भी सख्‍त ऐतराज जाहिर किया जा रहा है। मसलन, गवाह के तौर पर जिस भी शख्‍स को बुलाया जाता है, उससे जिरह केवल कमेटी या उसका वकील ही सवाल कर सकता है। लेकिन अब तक जितने भी लोगों को गवाही के लिए बुलाया गया है, उनके साथ सवाल-जवाब लल्‍लू–पंजू टाइप लोगों ने शुरू किया। इतना ही नहीं, ऐतराज तो यह भी है कि कमेटी ने ऐसी पूछताछ पर भी अपना मुंह बंद रखा। गवाही देने के बाद एक गवाह ने ऐतराज किया कि अगर कमेटी अपने निजी खुन्‍नस निकालना चाहती है, तो दीगर बात है, लेकिन इससे प्रेस परिषद की विश्‍वसनीयता जरूर कलंकित जा जाएगी।

कमेटी की कार्यशैली और विश्‍वसनीयता को लेकर यहां खूब चर्चाएं चल रही हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि जब पक्षपातपूर्ण खबरों वाले अखबारों में जनमोर्चा का भी नाम है, जिसके कार्यकारी मालिक शीतला सिंह ही हैं, फिर शीतला सिंह इस जांच

कुमार सौवीर
कमेटी की विश्‍वसनीयता कैसे बनाये रखेंगे। दिलचस्‍प मोड़ तो तब आया जब जनमोर्चा की शिकायत पर सफाई देने के लिए शीतला सिंह ने खुद के बजाय अपने एक कर्मचारी को ही कमेटी में पेश करा दिया।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के जाने माने और वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com या kumarsauvir@gmail.com या 09415302520 के जरिए किया जा सकता हैं.

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